Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 409 of 639

Read in context
Page 409

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६१

त्रिंशत्तमोऽध्यायः
➔➔
अथातोऽर्थे दशमहामूलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'अर्थे दशमहामूलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अर्थे दश महामूलाः समासक्ता महाफलाः ।
महच्चार्थश्च हृदयं पर्यायैरुच्यते बुधैः ॥ ३ ॥
हृदय जिनका मूलस्थान है ऐसी महान् कार्य करने वाली दस धमनियां
हृदय में आश्रित हैं। 'महत्' और 'अर्थ' ये हृदय के ही नामान्तर हैं ॥ ३ ॥
षडङ्गमङ्गं विज्ञानमिन्द्रियाण्यथपञ्चकम् ।
आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम् ॥ ४ ॥
प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते ।
गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थचिन्तकैः ॥ ५ ॥
तस्योपघातान्मूर्च्छायं भेदान्मरणमृच्छति ।
यद्धि तत्स्पर्शविज्ञानं धारि तत्तत्र संश्रितम् ॥ ६ ॥
तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंग्रहः ।
हृदयं महदर्थश्चत स्मादुक्तं चिकित्सकैः ॥ ७ ॥
छः अंगोंवाला शरीर ( दो हाथ, दो पांव, शिर और ग्रीवा एवं
कटि का मध्य भाग ), विज्ञान ( निश्चयात्मक बुद्धि ), पांच ज्ञानेन्द्रियां
तथा इन इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श आदि विषय, आत्मा, गुणयुक्त मन, चिन्त्य
( मन के विषय ) ये सब हृदय में आश्रित हैं। यहां पर यह संशय हो सकता है
कि हृदय तो दो अंगुल मात्र है, इसमें छ अंगों वाला शरीर किस प्रकार समा
सकता है। इन्द्रियां अपने आश्रितों में स्थित हैं, विषय बाह्य द्रव्यों में आश्रित
हैं। आत्मा व्यापक होने से अनाश्रित है, गुणयुक्त मन भी अनाश्रित है, ध्येय
आदि हृदय में नहीं रहते। इस सन्देह का उत्तर देते हैं कि हृदय में ये भाव
( पदार्थ ) कार्य-कारण सम्बन्ध से अविरोध रूप में रहते हैं। इनमें आधार-
आधेय-सम्बन्ध नहीं, परन्तु आश्रय-आश्रयि, अथवा अन्वय-व्यतिरेक सम्बन्ध है।
आगारकर्णिका अर्थात् घर को ढांपने के बीचमें एक बड़ी बल्ली होती है और
उसके दोनों ओर दूसरी शहतीरियां पड़ी रहती हैं, उसी प्रकार हृदय के चारों
ओर ये वस्तुयें पड़ी हैं। इस हृदय को उपघात ( चोट ) लगाने से मूर्च्छा हो