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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 424 of 639

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Page 424

४०६ चरकसंहिता [ अ० ३०
परन्तु जो अपने तत्त्वज्ञान को दिखाने के लिये अहंकार के कारण आये
हों, जो थोड़े पढ़े हों, उन मूर्ख आत्मप्रशंसकों की कभी उपेक्षा नहीं करनी
चाहिये। जिनकी प्राणीमात्र पर कृपा और तत्त्वज्ञान में दया है उनकी असद्-
वाद के रोकने में सदा मति रहती है। क्योकि इस प्रकार न करने से असद्
वैद्यों को उत्तेजन मिलकर संसार का अपकार होता है। इसलिये इनको
निग्रह करने में सदा तत्पर रहना चाहिये ॥ ७६-८० ॥
असत्पक्षाश्रितवार्तिर्दम्भपारुष्यसाधनाः ।
भवन्त्यनाप्ताः स्वे तन्त्रे प्रायः परविकत्थकाः ॥ ८१ ॥
तान् कालपाशसदृशान्वर्जयेच्छास्त्रदूषकान् ।
प्रशम-ज्ञान-विज्ञान-पूर्णाः सेव्या भिषक्तमाः ॥ ८२ ॥
खोटे ( असत् ) पक्ष को लेकर विवाद करना, मुझको समय नहीं है,
फिर पूछना ऐसा बहाना करने वाले, पूछने पर शिर दुखता है, दाम्भिक, पूछने
पर गुस्से या जोर से उत्तर दे और दूसरों की व्यर्थ निन्दा करने वाले अपने
तन्त्र में अनभिज्ञ होते हैं। इस प्रकार के शास्त्र को बदनाम करने वालों को
मृत्यु के फांसों के समान दूर से ही छोड़ देना चाहिये। जो शान्त, ज्ञान-विज्ञान
से परिपूर्ण हों ऐसे उत्तम वैद्यों की सेवा करनी चाहिये ॥ ८१-८२ ॥
समग्रं दुःखमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम् ।
सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम् ॥ ८३ ॥
इदमेवमुदारार्थमज्ञानार्थप्रकाशकम् ।
शास्त्रं दृष्टिप्रनष्टानां यथैवाऽऽदित्यमण्डलम् ॥ ८४ ॥ इति ।
सब प्रकार के दुःखों का कारण शारीरिक और मानसिक ज्ञान का अभाव
है। शरीर और मन सम्बन्धी ज्ञान न होने से सब रोग होते हैं।
इन दोनों के विशुद्ध ज्ञान से सम्पूर्ण सुख-आरोग्य मिलता है।
यह शास्त्र अति गम्भीर, दोनों लोकों में हितकारी अर्थ को बतलाता है,
तथा अज्ञात वस्तु को प्रकाशित करता है, परन्तु जिस प्रकार नेत्रहीन पुरुष
चमकते हुए सूर्य का कुछ भी उपयोग नहीं कर सकता, इसी प्रकार शास्त्रहीन
व्यक्तियों के लिये यह कुछ काम नहीं दे सकता ॥ ८३-८४ ॥
तत्र श्लोकाः- अर्थे दश महामूलाः संज्ञा चैषां यथा कृता ।
अयनान्ताः षडर्थाश्च रूपं वेदविदां च यत् ॥ ८५ ॥
सप्तप्रश्नाष्टकश्चैव परिप्रश्नः सनिर्णयः ।
यथा वाच्यं यदर्थं च यद्विद्याच्चैकदेशिकः ॥ ८६ ॥