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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 261 में से

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पृष्ठ 253

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७


[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]

यतो मुक्तोऽप्यहमन्नभूत आद्यः
स्यामन्नस्य ।
एवं मा भैषीः संव्यवहार-
विषयत्वात्सर्वकामाशनस्य अती-
त्यायं संव्यवहारविषयमन्नान्ना-
दादिलक्षणमविद्याकृतं विद्यया
ब्रह्मत्वमापन्नो विद्वांस्तस्य नैव
द्वितीयं वस्त्वन्तरमस्ति यतो
बिभेत्यतो न भेतव्यं मोक्षात् ।
एवं तर्हि किमिदमाह-अह-
मन्नमहमन्नाद इति ? उच्यते-यो-
ऽयमन्नान्नादादिलक्षणः संव्यव-
हारः कार्यभूतः स संव्यवहार-
मात्रमेव न परमार्थवस्तु । स
एवंभूतोऽपि ब्रह्मनिमित्तो ब्रह्म-
व्यतिरेकेणासन्निति कृत्वा ब्रह्म-
विद्याकार्यस्य ब्रह्मभावस्य स्तुत्य-
र्थमुच्यते । अहमन्नमहमन्नमह-
मन्नम् । अहमन्नादोऽहमन्नादो-
ऽहमन्नाद इत्यादि । अतो भया-


[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]

हो [ यही अच्छा है ]; क्योंकि
मुक्त होनेपर मैं भी अन्नभूत होकर
अन्नका भक्ष्य होऊँगा ।
सिद्धान्ती—ऐसे मत डरो, क्योंकि
सब प्रकारके भोगोंको भोगना यह
तो व्यावहारिक ही है । विद्वान् तो
ब्रह्मविद्याके द्वारा इस अविद्याकृत
अन्न-अन्नादरूप व्यावहारिक विषय-
का उल्लङ्घन कर ब्रह्मत्वको प्राप्त हो
जाता है । उसके लिये कोई दूसरी
वस्तु ही नहीं रहती, जिससे कि
उसे भय हो । इसलिये तुझे मोक्षसे
नहीं डरना चाहिये ।
यदि ऐसी बात है तो 'मैं अन्न
हूँ, मैं अन्नाद हूँ' ऐसा क्यों कहा
है--ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता
है-यह जो अन्न और अन्नादरूप
कार्यभूत व्यवहार है वह व्यवहार-
मात्र ही है—परमार्थवस्तु नहीं है ।
वह ऐसा होनेपर भी ब्रह्मका कार्य
होनेके कारण ब्रह्मसे पृथक् असत्
ही है—इस आशयको लेकर ही
ब्रह्मविद्याके कार्यभूत ब्रह्मभावकी
स्तुतिके लिये 'मैं अन्न हूँ, मैं अन्न
हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं अन्नाद हूँ, मैं
अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ' इत्यादि कहा
जाता है । इस प्रकार अविद्याका
नाश हो जानेके कारण ब्रह्मभूत