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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 261 में से

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पृष्ठ 226

२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
सैव ब्रह्म विजिज्ञासस्वेत्यर्थः । | है कि तू तपसे ही ब्रह्मको जाननेकी
ऋज्वन्यत् ॥ १ ॥ | इच्छा कर । शेष अर्थ सरल है ॥१॥
इति भृगुवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर
भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके
उपदेशसे पुनः तप करना
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि
भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं
पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपो-
ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
प्राण ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय प्राणसे ही ये प्राणी
उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर प्राणसे ही जीवित रहते हैं और मरणोन्मुख
होनेपर प्राणमें ही लीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता
वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश
कीजिये ।' उससे वरुणने कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर ।
तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri