तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
प्रतिपत्तेः । “मनसश्चेन्द्रियाणां | ही है; क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति उसीके
च ह्येकाग्र्यं परमं तपः। | द्वारा होनेवाली है । “मन और
तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप
| है । वह सब धर्मोंसे उत्कृष्ट है और
पर उच्यते” (महा० शा० २५०। | वही परम धर्म कहा जाता है”—इस
४) इति स्मृतेः । स च तपस्त- | स्मृतिसे यही बात सिद्ध होती है ।
प्त्वा ॥ १ ॥ | उस भृगुने तप करके—॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर
भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके
उपदेशसे पुनः तप करना
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि
भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर-
मुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब
प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा
प्रयाण करते समय अन्नमें ही लीन होते हैं । ऐसा जानकर वह फिर
अपने पिता वरुणके पास आया [ और कहा— ] ‘भगवन् ! मुझे ब्रह्मका
उपदेश कीजिये ।’ वरुणने उससे कहा—‘ब्रह्मको तपके द्वारा जाननेकी
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