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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 261 में से

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पृष्ठ 144

चतुर्थ अनुवाक
मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष
एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मा-
न्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः ।
स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं
पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः ।
सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
जहाँसे मनके सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस
ब्रह्मानन्दको जाननेवाला पुरुष कभी भयको प्राप्त नहीं होता । यह जो
[ मनोमय शरीर ] है वही उस अपने पूर्ववर्ती [ प्राणमय कोश ] का
शारीरिक आत्मा है । उस इस मनोमयसे दूसरा इसका अन्तर-आत्मा
विज्ञानमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह विज्ञानमय भी
पुरुषाकार ही है । उस [ मनोमय ] की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह
भी पुरुषाकार है । उसका श्रद्धा ही शिर है । ऋत दक्षिण पक्ष है ।
सत्य उत्तर पक्ष है । योग आत्मा ( मध्यभाग ) है और महत्तत्त्व पुच्छ-प्रतिष्ठा
है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य | जहाँसे मनके सहित वाणी उसे
| न पाकर लौट आती है-इत्यादि
मनसा सहेत्यादि । तस्य पूर्वस्य | [ अर्थ स्पष्ट ही है ] उस पूर्व-
प्राणमयस्यैष एवात्मा शारीरः | कथित प्राणमयका यही शारीर
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri