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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 261 में से

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पृष्ठ 122
११६तैत्तिरीयोपनिषद्[ वल्ली २

गतेन सर्वात्मना नित्यब्रह्मात्म- | प्रकारसे सर्वज्ञ सर्वगत सर्वात्मक
स्वरूपेण धर्मादिनिमित्तानपेक्षां- | एवं नित्यब्रह्मात्मस्वरूपसे, धर्मादि
श्चक्षुरादिकरणनिरपेक्षांश्च सर्वा- | निमित्तकी अपेक्षासे रहित तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भी निरपेक्ष सम्पूर्ण भोगोंको एक साथ ही प्राप्त कर लेता है—यह इसका तात्पर्य है । विपश्चित्—मेधावी अर्थात् सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसे । ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व है वही उसकी विपश्चित्ता (विद्वत्ता) है। उस सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्मरूपसे ही वह उन्हें भोगता है । मूलमें ‘इति’ शब्द मन्त्रकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।
न्कामान्सहैवाश्नुत इत्यर्थः । |
विपश्चिता मेधाविना सर्वज्ञेन । |
तद्धि वैपश्चित्यं यत्सर्वज्ञत्वं तेन |
सर्वज्ञस्वरूपेण ब्रह्मणाश्नुत इति । |
इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । |
सर्व एव वल्ल्यर्थो ब्रह्मविदा- | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस ब्राह्मण-
प्नोति परमिति ब्राह्मणवाक्येन | वाक्यद्वारा इस सम्पूर्ण वल्लीका अर्थ सूत्ररूपसे कह दिया है । उस सूत्रभूत अर्थकी ही मन्त्रद्वारा संक्षेप-
सूत्रितः । स च सूत्रितोऽर्थः |
संक्षेपतो मन्त्रेण व्याख्यातः । | से व्याख्या कर दी गयी है । अब
पुनस्तस्यैव विस्तरेणार्थनिर्णयः | फिर उसीका अर्थ विस्तारसे निर्णय
कर्तव्य इत्युत्तरस्तद्वृत्तिस्थानीयो | करना है—इसीलिये उसका वृत्तिरूप
ग्रन्थ आरभ्यते तस्माद्वा एतस्मा- | ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि आगेका
दित्यादिः । | ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।
तत्र च सत्यं ज्ञानमनन्तं | उस मन्त्रमें सबसे पहले ‘सत्यं
^(सत्यं ज्ञानमनन्तं) ब्रह्मेत्युक्तं मन्त्रादौ | ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । वह
^(ब्रह्मेति मीमांस्यते) तत्कथं सत्यं ज्ञान- | सत्य, ज्ञान और अनन्त किस प्रकार
मनन्तं चेत्यत आह । तत्र | है ? सो बतलाते हैं—अनन्तता
त्रिविधं ह्यानन्त्यं देशतः कालतो | तीन प्रकारकी है—देशसे, कालसे
वस्तुतश्चेति । तद्यथा देशतो- | और वस्तुसे । उनमें जैसे आकाश
ऽनन्त आकाशः। न हि देशतस्तस्य | देशतः अनन्त है । उसका देशसे


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri