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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 261 में से

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पृष्ठ 121

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
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स एवं ब्रह्म विजानन्किमि- | वह इस प्रकार ब्रह्मको जानने-
| वाला क्या करता है ? इसपर श्रुति
ब्रह्मविद त्याह-अश्नुते भुङ्क्ते | कहती है—वह सम्पूर्ण अर्थात् निः-
ऐश्वर्यम् सर्वान्निरवशिष्टान्का- | शेष कामनाओं यानी इच्छित भोगों-
| को प्राप्त कर लेता है अर्थात् उन्हें
मान्भोगानित्यर्थः । किमस्मदादि- | भोगता है । तो क्या वह हमारे-
| तुम्हारे समान पुत्र एवं स्वर्गादि
वत्पुत्रस्वर्गादीन्पर्यायेण नेत्याह । | भोगोंको क्रमसे भोगता है ? इसपर
सह युगपदेकक्षणोपारूढानेव | श्रुति कहती है—नहीं, उन्हें एक
| साथ भोगता है । वह एक ही क्षणमें
एकयोपलब्ध्या सवितृप्रकाशवत् | बुद्धिवृत्तिपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण
| भोगोंको सूर्यके प्रकाशके समान
नित्यया ब्रह्मस्वरूपाव्यतिरिक्तया | नित्य तथा ब्रह्मस्वरूपसे अभिन्न एक
| ही उपलब्धिके द्वारा, जिसका हमने
यामवोचाम सत्यं ज्ञानमनन्त- | 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' ऐसा निरूपण
मिति । एतत्तदुच्यते—ब्रह्मणा | किया है, भोगता है । 'ब्रह्मणा
| सह सर्वान्कामानश्नुते' इस वाक्यसे
सहेति । | यही अर्थ कहा गया है ।
ब्रह्मभूतो विद्वान्ब्रह्मस्वरूपे- | ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूपसे
णैव सर्वान्कामान्सहाश्नुते, न | ही एक साथ सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त
| कर लेता है । अर्थात् दूसरे लोग
यथोपाधिकृतेन स्वरूपेणात्मना | जिस प्रकार जलमें प्रतिबिम्बित
| सूर्यके समान अपने औपाधिक और
जलसूर्यकादिवत्प्रतिबिम्बभूतेन | संसारी आत्माके द्वारा धर्मादि
सांसारिकेण धर्मादिनिमित्तापे- | निमित्तकी अपेक्षावाले तथा चक्षु
| आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षासे युक्त
क्षांश्चक्षुरादिकरणापेक्षांश्च कामान् | सम्पूर्ण भोगोंको क्रमशः भोगते हैं
| उस प्रकार उन्हें नहीं भोगता । तो
पर्यायेणाश्नुते लोकः; कथं तर्हि ? | फिर कैसे भोगता है ? वह उपर्युक्त
यथोक्तेन प्रकारेण सर्वज्ञेन सर्व- |

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri