तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
यत्त्वाद्विरोधः । विहितानि च | (विद्याका विधान करनेवाली
| श्रुतियों) से विरोध उपस्थित होता
कर्माणि । स च विरोधो न | है; और कर्मोंका विधान भी
| किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ
युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति | प्रमाणभूत हैं इसलिये पूर्वोक्त
| विरोधका होना उचित नहीं है-यदि
चेत् ? | ऐसा कहें तो ?
न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुती- | सिद्धान्ती-यह कथन ठीक नहीं;
| क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थका
नाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः | उपदेश करनेमें प्रवृत्त हैं । श्रुति
| ज्ञानका उपदेश करनेमें तत्पर है ।
संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति | उसे संसारसे पुरुषका मोक्ष कराना
| है, इसके लिये संसारकी हेतुभूत
संसारहेतोरविद्याया विद्यया | अविद्याकी विद्याके द्वारा निवृत्ति
| करना आवश्यक है; अतः वह
निवृत्तिः कर्त्तव्येति विद्याप्रकाश- | विद्याका प्रकाश करनेवाली होकर
| प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा
कत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः । | माननेसे कोई विरोध नहीं आता ।
एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भाव- | पूर्व०-किन्तु ऐसा माननेपर भी
| तो कर्तादि कारककी सत्ताका प्रति-
प्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत | पादन करनेवाले शास्त्रका तो उससे
| विरोध होता ही है ?
एवेति चेत् ? |
न; यथाप्राप्तमेव कारकास्ति- | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है;
| स्वभावतः प्राप्त कारकोंके अस्तित्वको
त्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं | स्वीकार कर सञ्चित पापोंके क्षयके
| लिये कर्मोंका विधान करनेवाला
कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां | शास्त्र मुमुक्षुओं और फलकी
अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
फलार्थिनां च फलसाधनं न | इच्छावालोंको [ उनके इष्ट ] फलकी
प्राप्ति करानेका साधन है; वह
कारकास्तित्वे व्याप्रीयते । उप- | कारकोंका अस्तित्व सिद्ध करनेमें
चितदुरितप्रतिबन्धस्य हि विद्यो- | प्रवृत्त नहीं है । जिस पुरुषका
सञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध विद्यमान
त्पत्तिर्नावकल्पते । तत्क्षये च | रहता है उसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती; उसका क्षय हो जानेपर
विद्योत्पत्तिः स्यात्ततश्चाविद्यानि- | ही ज्ञान होता है और तभी
अविद्याकी निवृत्ति होती है तथा
वृत्तिस्तत आत्यन्तिकः संसारो- | उसके अनन्तर ही संसारकी
आत्यन्तिक उपरति होती है ।
परमः ।
अपि चानात्मदर्शिनो ह्यना- | इसके सिवा जो पुरुष अनात्म-
दर्शी है उसे ही अनात्मवस्तु-
[हाशिए पर: ज्ञानादेव तु कैवल्यम्] त्मविषयः कामः । | सम्बन्धिनी कामना हो सकती है;
कामयमानश्च करो- | कामनावाला ही कर्म करता
ति कर्माणि । ततस्तत्फलोप- | है और उसीसे उनका फल भोगनेके
लिये उसे शरीरादिग्रहणरूप संसार-
भोगाय शरीराद्युपादानलक्षणः | की प्राप्ति होती है । इसके विपरीत
जो आत्मैकत्वदर्शी है उसकी दृष्टिमें
संसारः । तद्व्यतिरेकेणात्मैक- | विषयोंका अभाव होनेके कारण उसे
उनकी कामना भी नहीं हो सकती ।
त्वदर्शिनो विषयाभावात्कामानु- | आत्मा तो अपनेसे अभिन्न है, इस-
त्पत्तिरात्मनि चानन्यत्वात्का- | लिये उसकी कामना भी असम्भव
होनेके कारण उसे स्वात्मस्वरूपमें
मानुत्पत्तौ स्वात्मन्यवस्थानं मोक्ष | स्थित होनारूप मोक्ष सिद्ध ही है ।
इत्यतोऽपि विद्याकर्मणोर्विरोधः । | इसलिये भी ज्ञान और कर्मका विरोध
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri