तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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यत्त्वाद्विरोधः । विहितानि च | (विद्याका विधान करनेवाली
| श्रुतियों) से विरोध उपस्थित होता
कर्माणि । स च विरोधो न | है; और कर्मोंका विधान भी
| किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ
युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति | प्रमाणभूत हैं इसलिये पूर्वोक्त
| विरोधका होना उचित नहीं है-यदि
चेत् ? | ऐसा कहें तो ?
न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुती- | सिद्धान्ती-यह कथन ठीक नहीं;
| क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थका
नाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः | उपदेश करनेमें प्रवृत्त हैं । श्रुति
| ज्ञानका उपदेश करनेमें तत्पर है ।
संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति | उसे संसारसे पुरुषका मोक्ष कराना
| है, इसके लिये संसारकी हेतुभूत
संसारहेतोरविद्याया विद्यया | अविद्याकी विद्याके द्वारा निवृत्ति
| करना आवश्यक है; अतः वह
निवृत्तिः कर्त्तव्येति विद्याप्रकाश- | विद्याका प्रकाश करनेवाली होकर
| प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा
कत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः । | माननेसे कोई विरोध नहीं आता ।
एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भाव- | पूर्व०-किन्तु ऐसा माननेपर भी
| तो कर्तादि कारककी सत्ताका प्रति-
प्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत | पादन करनेवाले शास्त्रका तो उससे
| विरोध होता ही है ?
एवेति चेत् ? |
न; यथाप्राप्तमेव कारकास्ति- | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है;
| स्वभावतः प्राप्त कारकोंके अस्तित्वको
त्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं | स्वीकार कर सञ्चित पापोंके क्षयके
| लिये कर्मोंका विधान करनेवाला
कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां | शास्त्र मुमुक्षुओं और फलकी