तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[संस्कृत-भाष्यम्]
मनो विज्ञानम् मनुतेर्ज्ञान-
कर्मणः, तन्मयस्तत्प्रायस्तदुपल-
भ्यत्वात्। मनुतेऽनेनेति वा मनो-
ऽन्तःकरणं तदभिमानी तन्मय-
स्तल्लिङ्गो वा; अमृतोऽमरणधर्मा
हिरण्मयो ज्योतिर्मयः ।
तस्यैवंलक्षणस्य हृदयाकाशे
(पार्श्व-टिप्पणी: हृदयाकाशस्थ-जीवोपलब्धये मार्गः) साक्षात्कृतस्य विदुष
आत्मभूतस्येन्द्रस्यै-
द्यस्वरूपप्रतिपत्तये
मार्गोऽभिधीयते। हृदयादूर्ध्वं प्रवृ-
त्ता सुषुम्ना नाम नाडी योग-
शास्त्रेषु च प्रसिद्धा । सा चान्त-
रेण मध्ये प्रसिद्धे तालुके तालु-
कयोर्गता । यश्चैष तालुकयोर्मध्ये
स्तन इवावलम्बते मांसखण्डस्त-
स्य चान्तरेणेत्येतत् । यत्र च
केशान्तः केशानामन्तोऽवसानं
मूलं केशान्तो विवर्तते विभागेन
वर्तते मूर्धप्रदेश इत्यर्थः तं देशं
प्राप्य तत्र विनिःसृता व्यपोह्य
विभज्य विदार्य शीर्षकपाले
[हिन्दी-अनुवाद]
—ज्ञानवाची 'मन्' धातुसे सिद्ध होनेके
कारण 'मन' शब्दका अर्थ 'विज्ञान'
है, तन्मय–तत्प्राय अर्थात् विज्ञान-
मय है; क्योंकि उस (विज्ञानस्वरूप)
से ही वह उपलब्ध होता है; अथवा
जिसके द्वारा जीव मनन करता है वह
अन्तःकरण ही 'मन' है उसका अभि-
मानी, तन्मय अथवा उससे उपलक्षित
होनेवाला अमृत—अमरणधर्मा और
हिरण्मय—ज्योतिर्मय है ।
हृदयाकाशमें साक्षात्कार किये
हुए उस ऐसे लक्षणोंवाले तथा विद्वान्-
के आत्मभूत इन्द्र ( ईश्वर ) के ऐसे
स्वरूपकी प्राप्तिके लिये मार्ग बतलाया
जाता है—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर
जानेवाली सुषुम्ना नामकी नाडी योग-
शास्त्रमें प्रसिद्ध है । वह 'अन्तरेण
तालुके' अर्थात् दोनों तालुओंके
बीचमें होकर गयी है। और तालुओंके
बीचमें यह जो स्तनके समान मांस-
खण्ड लटका हुआ है उसके भी
बीचमें होकर गयी है । तथा जहाँ यह
केशान्त—केशोंके मूलभागका नाम
'केशान्त' है वह जिस स्थानपर
विभक्त होता है अर्थात् जो मूर्ध-
प्रदेश है, उस स्थानमें पहुँचकर
जो निकल गयी है, अर्थात् जो
शीर्षकपालों—मस्तकके कपालोंको
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
............................................~
शिरःकपाले विनिर्गता या सेन्द्र- | पार-विभक्त यानी विदीर्ण करती हुई
योनिरिन्द्रस्य ब्रह्मणो योनिर्मार्गः | बाहर निकल गयी है वही इन्द्रयोनि—
स्वरूपप्रतिपत्तिद्वारमित्यर्थः । | इन्द्र अर्थात् ब्रह्मकी योनि—मार्ग यानी
| ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्तिका द्वार है ।
तयैवं विद्वान्मनोमयात्मदर्शी | इस प्रकार उस सुषुम्ना नाडीद्वारा
[सुषुम्नाद्वारा] मूर्ध्ना विनिष्क्रम्या- | जाननेवाला अर्थात् मनोमय आत्मा-
[चतुर्व्याहृतिरूप-] स्य लोकस्याधिष्ठा- | का साक्षात्कार करनेवाला पुरुष
[ब्रह्मप्राप्तिः] ता भूरिति व्याहृति- | मूर्धद्वारसे निकलकर इस लोकका
| अधिष्ठाता जो महान् ब्रह्मका अङ्ग-
रूपो योऽग्निर्महतो ब्रह्मणोऽङ्गभूत- | भूत 'भूः' ऐसा व्याहृतिरूप अग्नि
स्तस्मिन्नग्नौ प्रतितिष्ठत्यग्न्यात्मनेमं | है उस अग्निमें स्थित हो जाता है;
| अर्थात् अग्निरूप होकर इस लोक-
लोकं व्याप्नोतीत्यर्थः । तथा भुव | को व्याप्त कर लेता है । इसी प्रकार
इति द्वितीयव्याहृत्यात्मनि वायौ । | वह 'भुवः' इस द्वितीय व्याहृति-
| रूप वायुमें स्थित हो जाता है—इस
प्रतितिष्ठतीत्यनुवर्तते । सुवरिति | प्रकार 'प्रतितिष्ठति' इस क्रियाकी
| अनुवृत्ति की जाती है । तथा [ ऐसे
तृतीयव्याहृत्यात्मन्यादित्ये । मह | ही ] 'सुवः' इस तृतीय व्याहृति-
इत्यङ्गिनि चतुर्थव्याहृत्यात्मनि | रूप आदित्यमें और 'महः' इस
| चतुर्थ व्याहृतिरूप अङ्गी ब्रह्ममें स्थित
ब्रह्मणि प्रतितिष्ठति । | होता है ।
तेष्वात्मभावेन स्थित्वाप्नोति | उनमें आत्मस्वरूपसे स्थित हो वह
[ब्रह्मभूतस्य] ब्रह्मभूतः स्वाराज्यं | ब्रह्मभूत हुआ स्वाराज्य—स्वराड्भावको
[विदुष ऐश्वर्यम्] स्वराड्भावं स्वयमेव | प्राप्त कर लेता है अर्थात् जिस प्रकार
| ब्रह्म अङ्गभूत देवताओंका अधिपति
राजाधिपतिर्भवति । अङ्गभूतानां | है उसी प्रकार स्वयं उनका राजा—
देवानां यथा ब्रह्म । देवाश्च | अधिपति हो जाता है । तथा उसके
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri