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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]

अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि-
धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ-
भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ-
ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः
संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं
दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव
व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे-
ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः ।
कानि तानीत्याह—अधिलोकं
लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् ।
तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज-
मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च-
विषया उपनिषदो लोकादिमहा-
वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च
महत्यश्च ताः संहिताश्च महा-
संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति
वेदविदः ।
अथ तासां यथोपन्यस्ताना-
मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]

'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए
अध्ययनरूप विधानके अनन्तर,
'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें
अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको
सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ]
में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता,
इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी
संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता-
सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण
—आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें
व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि
वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके
ज्ञान बतलावेंगे ] ।
वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ?
सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो
दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक
कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष,
अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म
भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय-
सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा-
वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी
हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती
संहिता अर्थात् 'महासंहिता'
कहकर पुकारते हैं ।
अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच
प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले
अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


[संस्कृत-भाष्य]
क्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र ।
पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्व-
रूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे
पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति ।
तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्त-
रिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तर-
रूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तर-
रूपे इति । वायुः संधानम् ।
संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्य-
धिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधि-
ज्यौतिषमित्यादि समानम् ।
इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते ।
यः कश्चिदेवमेता महासंहिता
व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्यु-
पासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात्
“इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति
च वचनात् । उपासनं च यथा-

[हिन्दी-भाष्यार्थ]
यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण 'अथ' शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान 'अथाधिज्यौतिषम्' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये ।
'इति' और 'इमाः' इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण 'वेद' शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि 'इति प्राचीनयोग्योपास्स्व'¹ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है ।


१. हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! इस प्रकार तू उपासना कर ।