तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
स्वात्मानमेवोपसंक्रामतीति वि- | प्रकरणका आरम्भ करके अब ‘मनो-
रोधः स्यात् । तथा नानन्दमय- | मय अथवा विज्ञानमय अपनेको ही प्राप्त होता है’ ऐसा कहनेमें
स्यात्मसंक्रमणमुपपद्यते । तस्मान्न | उससे विरोध आता है । इसी प्रकार
प्राप्तिः संक्रमणं नाप्यन्नमयादी- | आनन्दमयका भी अपनेको प्राप्त होना सम्भव नहीं है; अतः प्राप्तिका
नामन्यतमकर्तृकम् । पारिशेष्याद- | नाम संक्रमण नहीं है और न वह अन्नमयादिमेंसे किसीके द्वारा किया
न्नमयाद्यानन्दमयान्तात्मव्यति- | जाता है । फलतः आत्मासे भिन्न
रिक्तकर्तृकं ज्ञानमात्रं च संक्रमण- | अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश- पर्यन्त जिसका कर्ता है वह ज्ञानमात्र
मुपपद्यते । | ही संक्रमण होना सम्भव है ।
ज्ञानमात्रत्वे चानन्दमयान्तः- | इस प्रकार ‘संक्रमण’ शब्दका
स्थस्यैव सर्वान्तरस्याकाशाद्यन्न- | अर्थ ज्ञानमात्र होनेपर ही आनन्दमय कोशके भीतर स्थित सर्वान्तर तथा
मयान्तं कार्यं सृष्ट्वानुपविष्टस्य | आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें अनुप्रविष्ट
हृदयगुहाभिसंबन्धादन्नमयादि- | हुए आत्माका जो हृदयगुहाके
ष्वनात्मस्वात्मविभ्रमः संक्रमणे- | सम्बन्धसे अन्नमय आदि अनात्माओं- में आत्मत्वका भ्रम है वह संक्रमण-
नात्मविवेकविज्ञानोत्पत्त्या विन- | स्वरूप विवेक ज्ञानकी उत्पत्तिसे नष्ट
श्यति । तदेतस्मिन्नविद्याविभ्रम- | हो जाता है । अतः इस अविद्यारूप भ्रमके नाशमें ही संक्रमण शब्दका
नाशे संक्रमणशब्द उपचर्यते न | उपचार ( गौणरूप ) से प्रयोग किया गया है; इसके सिवा किसी और
ह्यन्यथा सर्वगतस्यात्मनः संक्र- | प्रकार सर्वगत आत्माका संक्रमण
मणमुपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है ।
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
वस्त्वन्तराभावाच्च । न च | आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका
स्वात्मन एव संक्रमणम् । न हि | अभाव होनेसे भी [ उसका किसीके
| प्रति जानारूप संक्रमण नहीं हो
जलूकात्मानमेव संक्रामति । | सकता ] । अपना अपनेको ही
| प्राप्त होना तो सम्भव नहीं है ।
तस्मात्सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति | जोंक अपने प्रति ही संक्रमण ( गमन )
| नहीं करती । अतः 'ब्रह्म सत्यस्वरूप,
यथोक्तलक्षणात्मप्रतिपत्त्यर्थमेव | ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस
| पूर्वोक्त लक्षणवाले आत्माके ज्ञानके
बहुभवनसर्गप्रवेशरसलाभाभय- | लिये ही सम्पूर्ण व्यवहारके आधार-
| भूत ब्रह्ममें अनेक होना, सृष्टिमें
संक्रमणादि परिकल्प्यते ब्रह्मणि | अनुप्रवेश करना, आनन्दकी प्राप्ति,
| अभय और संक्रमणादिकी कल्पना
सर्वव्यवहारविषये; न तु परमार्थतो | की गयी है; परमार्थतः तो निर्विकल्प
| ब्रह्ममें कोई विकल्प होना सम्भव
निर्विकल्पे ब्रह्मणि कश्चिदपि | है नहीं ।
विकल्प उपपद्यते । |
तमेतं निर्विकल्पमात्मानमेवं- | इस प्रकार क्रमशः उस इस
| निर्विकल्प आत्माके प्रति उपसंक्रमण-
क्रमेणोपसंक्रम्य विदित्वा न | कर अर्थात् उसे जानकर साधक
बिभेति कुतश्चनाभयं प्रतिष्ठां | किसीसे भयभीत नहीं होता । वह
विन्दत इत्येतस्मिन्नर्थेऽप्येष श्लो- | अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । इसी
| अर्थमें यह श्लोक भी है । इस
को भवति । सर्वस्यैवास्य प्रक- | सम्पूर्ण प्रकरणके अर्थात् आनन्द-
रणस्यानन्दवल्ल्यर्थस्य संक्षेपतः | वल्लीके अर्थको संक्षेपसे प्रकाशित
प्रकाशनायैष मन्त्रो भवति ॥५॥ | करनेके लिये ही यह मन्त्र है ॥५॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
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नवम अनुवाक
ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । एतँह
वाव न तपति । किमहँसाधु नाकरवम् । किमहं पाप-
मकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानँ स्पृणुते ।
उभे ह्येवैष एते आत्मानँ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युप-
निषत् ॥ १ ॥
जहाँसे मनके सहित वाणी उसे प्राप्त न करके लौट आती है उस
ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे भी भयभीत नहीं होता । उस
विद्वान्को, मैंने शुभ क्यों नहीं किया, पापकर्म क्यों कर डाला—इस
प्रकारकी चिन्ता सन्तप्त नहीं करती । उन्हें [ ये पाप और पुण्य ही
तापके कारण हैं--] इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् अपने आत्माको
प्रसन्न अथवा सबल करता है उसे ये दोनों आत्मस्वरूप ही दिखायी
देते हैं । [ वह कौन है ? ] जो इस प्रकार [ पूर्वोक्त अद्वैत आनन्दस्वरूप
ब्रह्मको ] जानता है । ऐसी यह उपनिषद् ( रहस्यविद्या ) है ॥ १ ॥
यतो यस्मान्निर्विकल्पाद्यथोक्त- | जिस पूर्वोक्त लक्षणोंवाले
| निर्विकल्प अद्वयानन्दरूप आत्माके
लक्षणादद्वयानन्दादात्मनो वाचो- | पाससे द्रव्यादि सविकल्प वस्तुओंको
| प्रकाशित करनेवाला वाक्य--
ऽभिधानानि द्रव्यादिसविकल्प- | अभिधान, जो वस्तुत्वमें [ ब्रह्मको
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[अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
[मूल संस्कृत (वाम भाग)]
वस्तुविषयाणि वस्तुसामान्या-
न्निर्विकल्पेऽद्वयेऽपि ब्रह्मणि प्रयो-
क्तृभिः प्रकाशनाय प्रयुज्यमाना-
न्यप्राप्याप्रकाशयैव निवर्तन्ते
स्वसामर्थ्याद्धीयन्ते—
मन इति प्रत्ययो विज्ञानम् ।
तच्च यत्राभिधानं प्रवृत्तमतीन्द्रि-
येऽप्यर्थे तदर्थे च प्रवर्तते प्रका-
शनाय । यत्र च विज्ञानं तत्र
वाचः प्रवृत्तिः । तस्मात्सहैव
वाङ्मनसयोरभिधानप्रत्यययोः
प्रवृत्तिः सर्वत्र ।
तस्माद्ब्रह्मप्रकाशनाय सर्वथा
प्रयोक्तृभिः प्रयुज्यमाना अपि
वाचो यस्मादप्रत्ययविषयादन-
भिधेयाददृश्यादिविशेषणात्सहैव
मनसा विज्ञानेन सर्वप्रकाशन-
समर्थेन निवर्तन्ते तं ब्रह्मण आ-
नन्दं श्रोत्रियस्यावृजिनस्याकामह-
तै० उ० २७–२८--
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण भाग)]
अन्य सविकल्प वस्तुओंके ] समान
समझनेके कारण वक्ताओंद्वारा, ब्रह्म-
के निर्विकल्प और अद्वैत होनेपर
भी, उसका निर्देश करनेके लिये
प्रयोग किया जाता है, उसे न
पाकर अर्थात् उसे प्रकाशित किये
बिना ही लौट आता है—अपनी
सामर्थ्यसे च्युत हो जाता है—
[ 'मनसा सह' ( मनके सहित )
इस पदसमूहमें ] 'मन' शब्द प्रत्यय
अर्थात् विज्ञानका वाचक है । वह,
जहाँ-कहीं अतीन्द्रिय पदार्थोंमें भी
शब्दकी प्रवृत्ति होती है वहीं उसे
प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ
करता है । जहाँ-कहीं भी विज्ञान
है वहीं वाणीकी भी प्रवृत्ति है ।
अतः अभिधान और प्रत्ययरूप
वाणी और मनकी सर्वत्र साथ-साथ
ही प्रवृत्ति होती है ।
इसलिये वक्ताओंद्वारा सर्वथा
ब्रह्मका प्रकाश करनेके लिये ही
प्रयोग की हुई वाणी, जिस प्रतीतिके
अविषयभूत, अकथनीय, अदृश्य और
निर्विशेष ब्रह्मके पाससे मन अर्थात्
सबको प्रकाशित करनेमें समर्थ
विज्ञानके सहित लौट आती है उस
ब्रह्मके आनन्दको—श्रोत्रिय निष्पाप