तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
वस्त्वन्तराभावाच्च । न च | आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका
स्वात्मन एव संक्रमणम् । न हि | अभाव होनेसे भी [ उसका किसीके
| प्रति जानारूप संक्रमण नहीं हो
जलूकात्मानमेव संक्रामति । | सकता ] । अपना अपनेको ही
| प्राप्त होना तो सम्भव नहीं है ।
तस्मात्सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति | जोंक अपने प्रति ही संक्रमण ( गमन )
| नहीं करती । अतः 'ब्रह्म सत्यस्वरूप,
यथोक्तलक्षणात्मप्रतिपत्त्यर्थमेव | ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस
| पूर्वोक्त लक्षणवाले आत्माके ज्ञानके
बहुभवनसर्गप्रवेशरसलाभाभय- | लिये ही सम्पूर्ण व्यवहारके आधार-
| भूत ब्रह्ममें अनेक होना, सृष्टिमें
संक्रमणादि परिकल्प्यते ब्रह्मणि | अनुप्रवेश करना, आनन्दकी प्राप्ति,
| अभय और संक्रमणादिकी कल्पना
सर्वव्यवहारविषये; न तु परमार्थतो | की गयी है; परमार्थतः तो निर्विकल्प
| ब्रह्ममें कोई विकल्प होना सम्भव
निर्विकल्पे ब्रह्मणि कश्चिदपि | है नहीं ।
विकल्प उपपद्यते । |
तमेतं निर्विकल्पमात्मानमेवं- | इस प्रकार क्रमशः उस इस
| निर्विकल्प आत्माके प्रति उपसंक्रमण-
क्रमेणोपसंक्रम्य विदित्वा न | कर अर्थात् उसे जानकर साधक
बिभेति कुतश्चनाभयं प्रतिष्ठां | किसीसे भयभीत नहीं होता । वह
विन्दत इत्येतस्मिन्नर्थेऽप्येष श्लो- | अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । इसी
| अर्थमें यह श्लोक भी है । इस
को भवति । सर्वस्यैवास्य प्रक- | सम्पूर्ण प्रकरणके अर्थात् आनन्द-
रणस्यानन्दवल्ल्यर्थस्य संक्षेपतः | वल्लीके अर्थको संक्षेपसे प्रकाशित
प्रकाशनायैष मन्त्रो भवति ॥५॥ | करनेके लिये ही यह मन्त्र है ॥५॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
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