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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

किं ततः ? | पूर्व०-इस विचारसे लाभ क्या है ?
|
यद्यन्यः स्याच्छ्रुतिविरोधः । | सिद्धान्ती-यदि वह उससे भिन्न
“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” | है तो “उसे रचकर उसीमें अनुप्रविष्ट
( तै० उ० २ । ६ । १) “अ- | हो गया” “यह अन्य है और मैं
न्योऽसावन्योऽहमस्मीति । न स | अन्य हूँ-इस प्रकार जो कहता है
वेद” ( बृ० उ० १ । ४ । १० ) | वह नहीं जानता” “एक ही
“एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० | अद्वितीय” “तू वह है” इत्यादि
६ । २ । १) “तत्त्वमसि” | श्रुतियोंसे विरोध होगा । और यदि
( छा० उ० ६ । ८-१६ ) इति । | वह स्वयं ही आनन्दमय आत्माको
अथ स एव, आनन्दमयमात्मानमु- | प्राप्त होता है तो उस [ एक ही ]
पसंक्रामतीति कर्मकर्तृत्वानुप- | में कर्म और कर्तापन दोनोंका होना
पत्तिः, परस्यैव च संसारित्वं | असम्भव है, तथा परमात्माको ही
पराभावो वा । | संसारित्वकी प्राप्ति अथवा उसके
| परमात्मत्वका अभाव सिद्ध होता है ।
|
यद्युभयथा प्राप्तो दोषो न | पूर्व०-यदि दोनों ही अवस्थाओं-
| में प्राप्त होनेवाले दोषका परिहार
परिहर्तुं शक्यत इति व्यर्था | नहीं किया जा सकता तो उसका
| विचार करना व्यर्थ है और यदि
चिन्ता । अथान्यतरस्मिन्पक्षे | किसी एक पक्षको स्वीकार कर लेनेसे
| दोषकी प्राप्ति नहीं होती अथवा
दोषाप्राप्तिस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे | कोई तीसरा निर्दोष पक्ष हो तो उसे
स एव शास्त्रार्थ इति व्यर्थैव | ही शास्त्रका आशय समझना चाहिये ।
| ऐसी अवस्था में भी विचार करना
चिन्ता । | व्यर्थ ही होगा ।
|
न; तन्निर्धारणार्थत्वात् । सत्यं | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि यह
| उसका निश्चय करनेके लिये है ।

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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
प्राप्तो दोषो न शक्यः परिहर्तु- | यह ठीक है कि इस प्रकार प्राप्त
| होनेवाला दोष निवृत्त नहीं किया
मन्यतरस्मिंस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे- | जा सकता तथा उपर्युक्त दोनों
| पक्षोंमेंसे किसी एकका अथवा किसी
ऽवधृते व्यर्था चिन्ता स्यान्न तु | तीसरे निर्दोष पक्षका निश्चय हो
| जानेपर भी यह विचार व्यर्थ ही
सोऽवधृत इति तदवधारणार्थ- | होगा। किन्तु उस पक्षका निश्चय
| तो नहीं हुआ है; अतः उसका
| निश्चय करनेके लिये होनेके कारण
त्वादर्थवत्येवैषा चिन्ता । | यह विचार सार्थक ही है ।
सत्यमर्थवती चिन्ता शास्त्रा- | पूर्व०—शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय
| करनेके लिये होनेसे तो सचमुच
र्थावधारणार्थत्वात् । चिन्तयसि | यह विचार सार्थक है, परन्तु तू तो
| केवल विचार ही करता है, निर्णय
च त्वं न तु निर्णेष्यसि, | तो कुछ करेगा नहीं ।
किं न निर्णेतव्यमिति वेद- | सिद्धान्ती—निर्णय नहीं करना
वचनम् ? | चाहिये—ऐसा क्या कोई वेदवाक्य है ?
न। | पूर्व०—नहीं ।
कथं तर्हि ? | सिद्धान्ती—तो फिर निर्णय क्यों
| नहीं होगा ?
बहुप्रतिपक्षत्वात् । एकत्ववादी | पूर्व०—क्योंकि तेरा प्रतिपक्ष
| बहुत है। वेदार्थपरायण होनेके
त्वम्, वेदार्थपरत्वात्, बहवो हि | कारण तू तो एकत्ववादी है किन्तु
| तेरे प्रतिपक्षी वेदबाह्य नानात्ववादी
नानात्ववादिनो वेदबाह्यास्त्व- | बहुत हैं। इसलिये मुझे सन्देह है
त्प्रतिपक्षाः । अतो ममाशङ्कां न | कि तू मेरी शङ्काका निर्णय नहीं
निर्णेष्यसीति । | कर सकेगा।
एतदेव मे स्वस्त्ययनं यन्मा- | सिद्धान्ती—तूने जो मुझे बहुत-से

१९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

मेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिप- | अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त
| एकत्ववादी बतलाया है—यही बड़े
क्षमात्थ । अतो जेप्यामि सर्वान्; | मङ्गलकी बात है । अतः अब मैं
| सबको जीत लूँगा; ले, मैं विचार
आरभे च चिन्ताम् । | आरम्भ करता हूँ ।
स एव तु स्यात्तद्भावस्य वि- | वह संक्रमणकर्ता परमात्मा ही
| है; क्योंकि यहाँ जीवको परमात्म-
वक्षितत्वात् । तद्विज्ञानेन परमा- | भावकी प्राप्ति बतलानी अभीष्ट है ।
| 'ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता
त्मभावो ह्यत्र विवक्षितो ब्रह्म- | है' इस वाक्यके अनुसार यहाँ ब्रह्म-
| विज्ञानसे परमात्मभावकी प्राप्ति होती
विदाप्नोति परमिति । न ह्यन्य- | है—यही प्रतिपादन करना इष्ट है ।
| किसी अन्य पदार्थका अन्य पदार्थ-
स्यान्यभावापत्तिरुपपद्यते । ननु | भावको प्राप्त होना सम्भव नहीं है ।
| यदि कहो कि उसका स्वयं अपने
तस्यापि तद्भावापत्तिरनुपपन्नैव ? | स्वरूपको प्राप्त होना भी असम्भव
| ही है, तो ऐसी बात नहीं है;
न; अविद्याकृततादात्म्यापो- | क्योंकि यह कथन केवल अविद्यासे
| आरोपित अनात्मपदार्थोंका निषेध
हार्थात् । या हि ब्रह्मविद्यया | करनेके लिये ही है । [ तात्पर्य यह
| है कि ] ब्रह्मविद्याके द्वारा जो
स्वात्मप्राप्तिरुपदिश्यते साविद्या- | अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिका
| उपदेश किया जाता है वह अविद्या-
कृतस्यान्नादिविशेषात्मन आत्म- | कृत अन्नमयादि कोशरूप विशेषात्मा-
| का अर्थात् आत्मभावसे आरोपित
त्वेनाध्यारोपितस्यानात्मनोऽपो- | किये हुए अनात्माका निषेध करनेके
| लिये ही है ।
हार्था । |
कथमेवमर्थतावगम्यते ? | पूर्व०—उसका इस प्रयोजनके
| लिये होना कैसे जाना जाता है ?

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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९
विद्यामात्रोपदेशात् । विद्या- | सिद्धान्ती—केवल ज्ञानका ही
याश्च दृष्टं कार्यमविद्यानिवृत्ति- | उपदेश किया जानेके कारण । अज्ञानकी निवृत्ति—यह ज्ञानका
स्तच्चेह विद्यामात्रमात्मप्राप्तौ | प्रत्यक्ष कार्य है, और यहाँ आत्माकी प्राप्तिमें वह ज्ञान ही साधन बतलाया
साधनमुपदिश्यते । | गया है ।
मार्गविज्ञानोपदेशवदिति चे- | पूर्व०—यदि वह मार्गविज्ञानके उपदेशके समान हो तो ? [ अब
त्नात्मत्वे विद्यामात्रसाधनोप- | इसीकी व्याख्या करते हैं—] केवल ज्ञानका ही साधनरूपसे उपदेश
देशोऽहेतुः । कस्मात् ? देशान्तर- | किया जाना उसकी परमात्मरूपतामें कारण नहीं हो सकता । ऐसा
प्राप्तौ मार्गविज्ञानोपदेशदर्श- | क्यों है ? क्योंकि देशान्तरकी प्राप्तिके लिये भी मार्गविज्ञानका उपदेश होता
नात् । न हि ग्राम एव गन्तेति | देखा गया है । ऐसी अवस्थामें ग्राम ही गमन करनेवाला नहीं हुआ
चेत् ? | करता—ऐसा माने तो ?
न, वैधर्म्यात् । तत्र हि ग्राम- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे दोनों समान धर्मवाले नहीं
विषयं विज्ञानं नोपदिश्यते । | हैं । * [तुमने जो दृष्टान्त दिया है ] उसमें ग्रामविषयक विज्ञानका उपदेश
तत्प्राप्तिमार्गविषयमेवोपदिश्यते | नहीं दिया जाता, केवल उसकी प्राप्तिके मार्गसे सम्बन्धित विज्ञान-

  • ग्रामको जानेवाले और ब्रह्मको प्राप्त होनेवालेमें बड़ा अन्तर है । इसके
    सिवा ग्रामको जानेवालेको जो मार्गके विज्ञानका उपदेश किया जाता है उसमें
    यह नहीं कहा जाता कि 'तू अमुक ग्राम है' परन्तु ब्रह्मज्ञानका उपदेश तो 'तू
    ब्रह्म है' इस अभेदसूचक वाक्यसे ही किया जाता है ।
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