तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
पृष्ठ 204, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 204मेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिप- | अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त
१९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिप- | अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त
| एकत्ववादी बतलाया है—यही बड़े
क्षमात्थ । अतो जेप्यामि सर्वान्; | मङ्गलकी बात है । अतः अब मैं
| सबको जीत लूँगा; ले, मैं विचार
आरभे च चिन्ताम् । | आरम्भ करता हूँ ।
स एव तु स्यात्तद्भावस्य वि- | वह संक्रमणकर्ता परमात्मा ही
| है; क्योंकि यहाँ जीवको परमात्म-
वक्षितत्वात् । तद्विज्ञानेन परमा- | भावकी प्राप्ति बतलानी अभीष्ट है ।
| 'ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता
त्मभावो ह्यत्र विवक्षितो ब्रह्म- | है' इस वाक्यके अनुसार यहाँ ब्रह्म-
| विज्ञानसे परमात्मभावकी प्राप्ति होती
विदाप्नोति परमिति । न ह्यन्य- | है—यही प्रतिपादन करना इष्ट है ।
| किसी अन्य पदार्थका अन्य पदार्थ-
स्यान्यभावापत्तिरुपपद्यते । ननु | भावको प्राप्त होना सम्भव नहीं है ।
| यदि कहो कि उसका स्वयं अपने
तस्यापि तद्भावापत्तिरनुपपन्नैव ? | स्वरूपको प्राप्त होना भी असम्भव
| ही है, तो ऐसी बात नहीं है;
न; अविद्याकृततादात्म्यापो- | क्योंकि यह कथन केवल अविद्यासे
| आरोपित अनात्मपदार्थोंका निषेध
हार्थात् । या हि ब्रह्मविद्यया | करनेके लिये ही है । [ तात्पर्य यह
| है कि ] ब्रह्मविद्याके द्वारा जो
स्वात्मप्राप्तिरुपदिश्यते साविद्या- | अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिका
| उपदेश किया जाता है वह अविद्या-
कृतस्यान्नादिविशेषात्मन आत्म- | कृत अन्नमयादि कोशरूप विशेषात्मा-
| का अर्थात् आत्मभावसे आरोपित
त्वेनाध्यारोपितस्यानात्मनोऽपो- | किये हुए अनात्माका निषेध करनेके
| लिये ही है ।
हार्था । |
कथमेवमर्थतावगम्यते ? | पूर्व०—उसका इस प्रयोजनके
| लिये होना कैसे जाना जाता है ?
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri