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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
ब्राह्मणा बाह्यरसलाभादिव सा- | भी बाह्य रसके लाभसे आनन्दित
नन्दा दृश्यन्ते विद्वांसः; नूनं | होनेके समान आनन्दयुक्त देखे जाते
| हैं । निश्चय उनका रस ब्रह्म ही है ।
ब्रह्मैव रसस्तेषाम् । तस्मादस्ति | अतः रसके समान उनके आनन्दका
तत्तेषामानन्दकारणं रसवद्ब्रह्म । | कारणरूप वह ब्रह्म है ही ।
इतश्चास्ति; कुतः ? प्राणनादि- | इसलिये भी ब्रह्म है; किसलिये ?
| प्राणनादि क्रियाके देखे जानेसे ।
क्रियादर्शनात् । अयमपि हि | जीवित पुरुषका यह पिण्ड भी प्राणकी
| सहायतासे प्राणन करता है और
पिण्डो जीवतः प्राणेन प्राणित्य- | अपान वायुके द्वारा अपानक्रिया
| करता है । इसी प्रकार संघातको
पानेनापानिति । एवं वायवीया | प्राप्त हुए इन शरीर और इन्द्रियोंके
| द्वारा निष्पन्न होती हुई और भी
ऐन्द्रियकाश्च चेष्टाः संहतैः कार्य- | वायु और इन्द्रियसम्बन्धिनी चेष्टाएँ
| देखी जाती हैं । वह वायु आदि
करणैर्निर्वर्त्यमाना दृश्यन्ते । | अचेतन पदार्थोंका एक ही उद्देश्यकी
तच्चैकार्थवृत्तित्वेन संहननं नान्त- | सिद्धिके लिये परस्पर संहत ( अनु-
| कूल ) होना किसी असंहत ( किसी-
रेण चेतनमसंहतं संभवति । | से भी न मिले हुए ) चेतनके बिना
| नहीं हो सकता; क्योंकि और कहीं
अन्यत्रादर्शनात् । | ऐसा देखा नहीं जाता ।
तदाह-तद्यदि एष आकाशे | इसी बातको श्रुति कहती है-
परमे व्योम्नि गुहायां निहित | यदि आकाश-परमाकाश अर्थात्
आनन्दो न स्यान्न भवेत्को ह्येव | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ यह
| आनन्द न होता तो लोकमें कौन
लोकेऽन्यादपानचेष्टां कुर्यादि- | अपान-क्रिया करता और कौन
त्यर्थः । कः प्राण्यात्प्राणनं वा | प्राणन कर सकता; इसलिये वह
कुर्यात्तस्मादस्ति तद्ब्रह्म । यदर्थाः | ब्रह्म है ही, जिसके लिये कि शरीर

अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७

कार्यकरणप्राणनादिचेष्टास्तत्कृत | और इन्द्रियकी प्राणन आदि चेष्टाएँ
एव चानन्दो लोकस्य । | हो रही हैं; और उसीका किया हुआ
| लोकका आनन्द भी है ।
कुतः ? एष ह्येव पर आत्मा | ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह
आनन्दयात्यानन्दयति सुखयति | परमात्मा ही लोकको उसके धर्मा-
लोकं धर्मानुरूपम् । स एवात्मा- | नुसार आनन्दित-सुखी करता है ।
नन्दरूपोऽविद्यया परिच्छिन्नो | तात्पर्य यह है कि वह आनन्दरूप
विभाव्यते प्राणिभिरित्यर्थः । | आत्मा ही प्राणियोंद्वारा अविद्यासे
भयाभयहेतुत्वाद्विद्वदविदुषोरस्ति | परिच्छिन्न भावना किया जाता है ।
तद्ब्रह्म । सद्द्वस्त्वाश्रयेण ह्यभयं | अविद्वान्के भय और विद्वान्के
भवति । नासद्वस्त्वाश्रयेण | अभयका कारण होनेसे भी ब्रह्म है;
भयनिवृत्तिरुपपद्यते । | क्योंकि किसी सत्य पदार्थके आश्रयसे
| ही अभय हुआ करता है, असद्वस्तुके
| आश्रयसे भयकी निवृत्ति होनी सम्भव
| नहीं है ।
कथमभयहेतुत्वमित्युच्यते— | ब्रह्मका अभयहेतुत्व किस प्रकार
[ब्रह्मणोऽभय-हेतुत्वम्] यदा ह्येव यस्मादेष साधक एतस्मिन्न- | है, सो बतलाया जाता है—क्योंकि
| जिस समय भी यह साधक इस
ह्मणि किंविशिष्टेऽदृश्ये दृश्यं नाम | ब्रह्ममें [ प्रतिष्ठा-स्थिति अर्थात्
| आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।]
द्रष्टव्यं विकारो दर्शनार्थत्वाद्धि- | किन विशेषणोंसे युक्त ब्रह्ममें ?
| अदृश्यमें—दृश्य देखे जानेवाले अर्थात्
कारस्य । न दृश्यमदृश्यमविकार | विकारका नाम है; क्योंकि विकार
| देखे जानेके ही लिये है; जो दृश्य न
इत्यर्थः । एतस्मिन्नदृश्येऽविकारे- | हो उसे अदृश्य अर्थात् अविकार
| कहते हैं । इस अदृश्य-अविकारी
ऽविषयभूते अनात्म्येऽशरीरे । | अर्थात् अविषयभूत, अनात्म्य-अ-
| शरीरमें । क्योंकि वह अदृश्य है
यस्माददृश्यं तस्मादनात्म्यं | इसलिये अशरीर भी है और क्योंकि
तै० उ० २३—२४—