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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 261 में से

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पृष्ठ 183

अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७

कार्यकरणप्राणनादिचेष्टास्तत्कृत | और इन्द्रियकी प्राणन आदि चेष्टाएँ
एव चानन्दो लोकस्य । | हो रही हैं; और उसीका किया हुआ
| लोकका आनन्द भी है ।
कुतः ? एष ह्येव पर आत्मा | ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह
आनन्दयात्यानन्दयति सुखयति | परमात्मा ही लोकको उसके धर्मा-
लोकं धर्मानुरूपम् । स एवात्मा- | नुसार आनन्दित-सुखी करता है ।
नन्दरूपोऽविद्यया परिच्छिन्नो | तात्पर्य यह है कि वह आनन्दरूप
विभाव्यते प्राणिभिरित्यर्थः । | आत्मा ही प्राणियोंद्वारा अविद्यासे
भयाभयहेतुत्वाद्विद्वदविदुषोरस्ति | परिच्छिन्न भावना किया जाता है ।
तद्ब्रह्म । सद्द्वस्त्वाश्रयेण ह्यभयं | अविद्वान्के भय और विद्वान्के
भवति । नासद्वस्त्वाश्रयेण | अभयका कारण होनेसे भी ब्रह्म है;
भयनिवृत्तिरुपपद्यते । | क्योंकि किसी सत्य पदार्थके आश्रयसे
| ही अभय हुआ करता है, असद्वस्तुके
| आश्रयसे भयकी निवृत्ति होनी सम्भव
| नहीं है ।
कथमभयहेतुत्वमित्युच्यते— | ब्रह्मका अभयहेतुत्व किस प्रकार
[ब्रह्मणोऽभय-हेतुत्वम्] यदा ह्येव यस्मादेष साधक एतस्मिन्न- | है, सो बतलाया जाता है—क्योंकि
| जिस समय भी यह साधक इस
ह्मणि किंविशिष्टेऽदृश्ये दृश्यं नाम | ब्रह्ममें [ प्रतिष्ठा-स्थिति अर्थात्
| आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।]
द्रष्टव्यं विकारो दर्शनार्थत्वाद्धि- | किन विशेषणोंसे युक्त ब्रह्ममें ?
| अदृश्यमें—दृश्य देखे जानेवाले अर्थात्
कारस्य । न दृश्यमदृश्यमविकार | विकारका नाम है; क्योंकि विकार
| देखे जानेके ही लिये है; जो दृश्य न
इत्यर्थः । एतस्मिन्नदृश्येऽविकारे- | हो उसे अदृश्य अर्थात् अविकार
| कहते हैं । इस अदृश्य-अविकारी
ऽविषयभूते अनात्म्येऽशरीरे । | अर्थात् अविषयभूत, अनात्म्य-अ-
| शरीरमें । क्योंकि वह अदृश्य है
यस्माददृश्यं तस्मादनात्म्यं | इसलिये अशरीर भी है और क्योंकि
तै० उ० २३—२४—