तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
च निर्मलत्वमापद्यते यावद्याव- | जितना-जितना निर्मलताको प्राप्त
त्तावत्तावद्विविक्ते प्रसन्नेऽन्तः- | होता है उतने-उतने ही स्वच्छ और
करण आनन्दविशेष उत्कृष्यते | प्रसन्न हुए उस अन्तःकरणमें विशेष
आनन्दका उत्कर्ष होता है अर्थात्
विपुलीभवति । वक्ष्यति च— | वह बहुत बढ़ जाता है। यही बात
"रसो वै सः । रसँह्येवायं | “वह रस ही है, इस रसको पाकर
लब्ध्वानन्दी भवति । एष ह्येवान- | ही पुरुष आनन्दी हो जाता है।
न्दयति” ( तै० उ० २ । ७ । | यह रस ही सबको आनन्दित करता
है।” इस प्रकार आगे कहेंगे,
१) “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि | तथा “इस आनन्दके अंशमात्रके
भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० | आश्रय ही सब प्राणी जीवित रहते
उ० ४ । ३ । ३२) इति च | हैं” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात
सिद्ध होती है। इसी प्रकार काम-
श्रुत्यन्तरात् । एवं च कामोप- | शान्तिके उत्कर्षकी अपेक्षा आगे-
शमोत्कर्षापेक्षया शतगुणोत्तरो- | आगेके आनन्दका सौ-सौ गुना
त्तरोत्कर्ष आनन्दस्य वक्ष्यते । | उत्कर्ष आगे बतलाया जायगा ।
एवं चोत्कृष्यमाणस्यानन्द- | इस प्रकार परमार्थ ब्रह्मके विज्ञान-
मयस्यात्मनः परमार्थब्रह्मविज्ञाना- | की अपेक्षासे क्रमशः उत्कर्षको प्राप्त
होनेवाले आनन्दमय आत्माकी
पेक्षया ब्रह्म परमेव । यत्प्रकृतं | अपेक्षा ब्रह्म पर ही है। जो प्रकृत
ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप है,
सत्यज्ञानानन्तलक्षणम्, यस्य | जिसकी प्राप्तिके लिये अन्नमय आदि
च प्रतिपत्त्यर्थं पञ्चान्नादिमयाः | पाँच कोशोंका उपन्यास किया गया
कोशा उपन्यस्ताः, यच्च तेभ्य | है, जो उन सबकी अपेक्षा अन्तर्वर्ती
है, और जिसके द्वारा वे सब
आभ्यन्तरम्, येन च ते सर्व | आत्मवान् हैं—वह ब्रह्म ही उस
आत्मवन्तः, तद्ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । | आनन्दमयकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है।
अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९
तदेव च सर्वस्याविद्यापरि- अविद्याद्वारा कल्पना किये हुए
कल्पितस्य द्वैतस्यावसानभूत- सम्पूर्ण द्वैतका निषेधावधिभूत वह
मद्वैतं ब्रह्म प्रतिष्ठा आनन्द- अद्वैत ब्रह्म ही उसकी प्रतिष्ठा है;
मयस्य । एकत्वावसानत्वात् । क्योंकि आनन्दमयका पर्यवसान भी
अस्ति तदेकमविद्याकल्पितस्य एकत्वमें ही होता है । अविद्या-
द्वैतस्यावसानभूतमद्वैतं ब्रह्म परिकल्पित द्वैतका अवसानभूत वह
प्रतिष्ठा पुच्छम् । तदेतस्मिन्नप्यर्थ एक और अद्वितीय ब्रह्म उसकी
प्रतिष्ठा यानी पुच्छ है । उस इसी
एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
—••|ॐ|••—
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥
षष्ठ अनुवाक
ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी
ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शंका तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे
ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण
असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति
ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव
शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उता-
विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वा-
नमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । सोऽकामयत ।
बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा
इदꣳसर्वमसृजत यदिदं किंच । तत्सृष्ट्वा तदेवानु-
प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं
चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चावि-
ज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किंच ।
तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
यदि पुरुष 'ब्रह्म असत् है' ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत्
ही हो जाता है । और यदि ऐसा जानता है कि 'ब्रह्म है' तो [ ब्रह्मवेत्ता-
जन ] उसे सत् समझते हैं । उस पूर्वकथित ( विज्ञानमय ) का यह
जो [ आनन्दमय ] है शरीर-स्थित आत्मा है । अब ( आचार्यका ऐसा
उपदेश सुननेके अनन्तर शिष्यके ) ये अनुप्रश्न हैं—क्या कोई अविद्वान्
पुरुष भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको प्राप्त हो सकता
है ? अथवा कोई विद्वान् भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१
प्राप्त होता है या नहीं ? [ इन प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये आचार्य
भूमिका बाँधते हैं— ] उस परमात्माने कामना की 'मैं बहुत हो जाऊँ
अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।' अतः उसने तप किया । उसने तप करके
ही यह जो कुछ है इस सबकी रचना की । इसे रचकर वह इसीमें
अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त्त-
अमूर्त्त, [ देशकालादि परिच्छिन्नरूपसे ] कहे जानेयोग्य और न कहे
जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्य-
रूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग 'सत्य' इस नामसे
पुकारते हैं । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥१॥
असन्नेवासत्सम एव यथा- | जिस प्रकार असत् ( अविद्यमान )
सन्न पुरुषार्थसंब- | पदार्थ पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाला
सदसद्वादिनोर्भेदः | नहीं होता उसी प्रकार वह भी
न्ध्येवं स भवति | असत्—असत्के समान ही
पुरुषार्थसे सम्बन्ध नहीं रखनेवाला
अपुरुषार्थसंबन्धी । कोऽसौ ? | हो जाता है—वह कौन ? जो
'ब्रह्म असत्—अविद्यमान है' ऐसा
योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद | जानता है । 'चेत्' शब्दका अर्थ
'यदि' है । इसके विपरीत 'जो
विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण | तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पोंका आश्रय,
समस्त प्रवृत्तियोंका बीजरूप और
यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्ति- | सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित भी है वही
ब्रह्म है' ऐसा यदि कोई जानता है
बीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्य- | [ तो उसे ब्रह्मवेत्तालोग सद्रूप समझते
हैं इस प्रकार इसका आगेके वाक्यसे
स्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् । | सम्बन्ध है ] ।
कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे ? | किन्तु ब्रह्मके अस्तित्वाभावके
विषयमें शंका क्यों की जाती है ?
व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति | [ इसपर ] हमारा यह कथन है
कि ब्रह्म व्यवहारसे परे है । [ इसी-
ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचा- | लिये ] व्यवहारके विषयभूत पदार्थों-