तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१
प्राप्त होता है या नहीं ? [ इन प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये आचार्य
भूमिका बाँधते हैं— ] उस परमात्माने कामना की 'मैं बहुत हो जाऊँ
अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।' अतः उसने तप किया । उसने तप करके
ही यह जो कुछ है इस सबकी रचना की । इसे रचकर वह इसीमें
अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त्त-
अमूर्त्त, [ देशकालादि परिच्छिन्नरूपसे ] कहे जानेयोग्य और न कहे
जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्य-
रूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग 'सत्य' इस नामसे
पुकारते हैं । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥१॥
असन्नेवासत्सम एव यथा- | जिस प्रकार असत् ( अविद्यमान )
सन्न पुरुषार्थसंब- | पदार्थ पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाला
सदसद्वादिनोर्भेदः | नहीं होता उसी प्रकार वह भी
न्ध्येवं स भवति | असत्—असत्के समान ही
पुरुषार्थसे सम्बन्ध नहीं रखनेवाला
अपुरुषार्थसंबन्धी । कोऽसौ ? | हो जाता है—वह कौन ? जो
'ब्रह्म असत्—अविद्यमान है' ऐसा
योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद | जानता है । 'चेत्' शब्दका अर्थ
'यदि' है । इसके विपरीत 'जो
विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण | तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पोंका आश्रय,
समस्त प्रवृत्तियोंका बीजरूप और
यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्ति- | सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित भी है वही
ब्रह्म है' ऐसा यदि कोई जानता है
बीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्य- | [ तो उसे ब्रह्मवेत्तालोग सद्रूप समझते
हैं इस प्रकार इसका आगेके वाक्यसे
स्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् । | सम्बन्ध है ] ।
कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे ? | किन्तु ब्रह्मके अस्तित्वाभावके
विषयमें शंका क्यों की जाती है ?
व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति | [ इसपर ] हमारा यह कथन है
कि ब्रह्म व्यवहारसे परे है । [ इसी-
ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचा- | लिये ] व्यवहारके विषयभूत पदार्थों-