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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

१३६ पञ्चदशी
उस समय जो हर्षवृत्ति उत्पन्न होती है, उसमें बड़ा सुख होता है।
उसका भोग करना मिल जाय तो और भी बड़ा सुख होता है। उस
काम्य पदार्थ के मिलने की सभावना हो जाय तो थोड़ा सा ही सुख
होता है। उसकी ओर से वैराग्य हो जाय तो बहुत ही बड़ा सुख
होता है—जिसका वर्णन हमने विद्यानन्द नाम के प्रकरण में विस्तार
पूर्वक किया है। क्रोध को भगा देने वाली क्षमा और लोभ को मार-
भगाने वाली उदारता में भी बड़ा सुख होता है। परन्तु यह बात
कभी न भूलनी चाहिये कि जो भी कोई सुख होता है वह सब
ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्म ही है। इष्ट भोग जब मिलता
है और प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब वह ब्रह्मतत्व उन
अन्तर्मुख वृत्तियों में निर्विघ्नता के साथ प्रतिबिम्बित हो जाया करता
है। बस यही.तो प्राणियों का 'सुख' कहाता है। 'सत्ता' चैतन्य
और 'सुख' ये ब्रह्म के तीन स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदियों में
केवल सत्ता ही प्रकट होती है, चैतन्य और सुख नहीं। 'घोर' और
'मूढ़' बुद्धिवृत्तियों में 'सत्ता' और 'चैतन्य' दो गुण प्रकट हो जाते
हैं। 'शान्त' वृत्तियों में तो 'सत्ता' 'चैतन्य' और 'सुख' तीनों ही
व्यक्त हो जाते हैं। प्रपंच में मिश्रित ब्रह्मतत्व का निरूपण यहां तक
किया गया। उस ब्रह्म को यदि कोई अमिश्ररूप में देखना चाहे तो
'ज्ञान' और 'योग' से ही उसे देखा जा सकता है। उन दोनों का
वर्णन पहले आ चुका है—ब्रह्मानन्द के प्रथम अध्याय में 'योग' का
वर्णन है। ब्रह्मानन्द के दूसरे [आत्मानन्द] तथा तीसरे [अद्वैतानन्द]
अध्याय में 'ज्ञान' का बखान किया गया है। 'असत्ता' 'जड़ता' और
'दुःख' ये तीनों ही माया के रूप हैं। 'असत्ता'[मिथ्यापन] मनुष्य के
सींग आदि पदार्थों में है। 'जड़ता' काष्ठ पाषाण आदि में पायी जाती
है। घोर और मूढ़ वृत्तियों में दुःख पाया जाता है। यों सब जगह

ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३७
माया का राज्य विस्तृत हो रहा है । बुद्धि की जो शान्त वृत्तियां हैं
उनके साथ एकता को प्राप्त हुआ हो जाने से उसको 'मिश्रब्रह्म'
कहा है ।
ब्रह्म की स्थिति तो हमने साफ़ साफ़ समझा दी है । अब जो
कोई पुरुष ब्रह्म का ध्यान करना चाहे, वह नृशृंग आदि जैसे पदार्थों
की तो उपेक्षा करता जाय और फिर जो तत्व शेष रह गया हो, उसी
का यथायोग्य रीति से ध्यान करे । वह यों कि—शिला आदियों में
नाम और रूपों [आकारों] को छोड़कर केवल सन्मात्र की ही चिन्ता
किया करे । घोर और मूढ बुद्धियों के दुःख-भाग को छोड़कर उनमें
के सत् और चित् के चिन्तन में लग जाय । शान्त वृत्तियों में तो
सच्चिदानन्द नामक तीनों की ही चिन्ता करने लगे । ये उक्त तीन
प्रकार की चिन्तायें क्रम से 'कनिष्ठ' 'मध्यम' और 'उत्कृष्ट' चिन्ता
कहाती हैं ।
जिन मन्दलोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार
ही नहीं है, वे लोग व्यवहार काल में भी मिश्र ब्रह्म का चिन्तन करें,
तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है। ऐसा मिश्रब्रह्मचिन्तन बताने के
लिये ही विषयानन्द नाम का यह प्रकरण लिखा गया है ।
उदासीन अवस्था में जब बुद्धिवृत्ति ढीली पड़ जाती हैं, तब तो
विना वृत्ति का ध्यान होने लगता है। वह ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे
दर्जे का है। इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार
का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का तो सवृत्तिक ध्यान तथा
एक विना वृत्ति का ध्यान, यों चार प्रकार का ध्यान हो गया । जड
पदार्थों में सत्ता, मूढ़वृत्ति में सत्ता तथा चैतन्य, सात्विकवृत्ति में सत्ता
चैतन्य तथा आनन्द, यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान हो जाता है।

१३८ पञ्चदशी
इस ब्रह्मानन्द नाम के पांच अध्याय वाले ग्रन्थ में 'ज्ञान' और
'योग'के द्वारा जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान तो ब्रह्मविद्या
ही है। उसका वर्णन तो हमने यों किया है कि ध्यान से जब चित्त
एकाग्र हो जाता है तब उस चित्त में ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है।
ब्रह्मविद्या के स्थिर हो जाने पर ये 'सत्' 'चित्' 'आनन्द' पहले की
तरह अलग अलग नहीं दीखते। तब तो ये अखण्ड एकरस होकर
दीखने लगते हैं। क्योंकि उस समय भेद करने वाली उपाधियां नहीं
रहतीं। भेद करने वाली उपाधियें तो ये शान्त घोर वृत्तियां और
शिलादि पदार्थ ही हैं। इन उपाधियों को यदि कोई हटाना चाहे तो
'योग' या 'विवेक' से ही ऐसा कर सकता है। जब उपाधिरहित
स्वयं प्रकाश अद्वैत ब्रह्मतत्त्व भासने लगता है तब यह प्रत्यक्ष दीख
पड़ने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि तब उसे
'भूमानन्द' भी कह देते हैं।
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का वर्णन समाप्त हुआ। मन्दाधि-
कारी लोग इसी को द्वार बनाकर आत्मधाम में घुस जांय।