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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१
देहतादात्म्यमापन्नस्तप्तायःपिण्डवत्ततः।
अहं मनुष्य इत्येवं निश्चित्यैवावतिष्ठते ॥९२॥
[ देह को व्याप्त करने की रीति यह है कि] तपे हुए लोह-
पिण्ड के साथ जैसे अग्नि का तादात्म्य हो जाता है इसी तरह
मनुष्य जाति वाले देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर 'मैं
मनुष्य हूँ' यह निश्चय करके बैठ जाता है। [ फिर उसे अपने
मनुष्य होने में थोड़ा सा भी संशय नहीं रहता ]
उदासीनः सुखी दुःखी त्यवस्थात्रयमेत्यसौ ।
सुखदुःखे कर्मकार्ये, त्वौदासीन्यं स्वभावतः ॥९३॥
[देह के साथ तादात्म्याभिमान कर लेने के कारण] यह जीव
उदासीन, सुखी, दुःखी इन तीन अवस्थाओं को प्राप्त होता है,
इन तीनों अवस्थाओं में से सुख और दुःख ये दोनों कर्मजन्य
हैं [अर्थात् सुखी या दुखीपन भी कर्मजन्य ही है] परन्तु
औदासीन्य तो स्वभाव से ही होता है [जब कर्म बन्द हो जाता
है तब उदासीनता स्वभाव से ही आ जाती है। उसके लिए
कर्म की आवश्यकता नहीं होती।]
बाह्यभोगान् मनोरज्यात् सुखदुःखे द्विधा मते ।
सुखदुःखान्तरालेषु भवेत् तूष्णीमवस्थितिः ॥९४॥
'बाह्य भोग' तथा 'मनोराज्य' से दो दो प्रकार सुख दुःख
होते हैं [ एक बाह्य भोगों से मिलने वाले सुख दुःख दूसरे
मनोराज्य से मिलने वाले सुख दुःख] परन्तु कभी कभी ऐसा
भी होता है कि न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। सुखों
और दुःखों के बीच बीच चुप रहने की अवस्था आती है।

४५२ पञ्चदशी
न कापि चिन्ता मेऽस्त्यद्य सुखमास इति ब्रुवन्।
औदासीन्ये निजानन्दभानं वक्त्यखिलो जनः ॥९५॥
जब कोई मनुष्य यह कहता है कि आज मुझे कुछ भी
चिन्ता नहीं है, इस लिये आज मैं सुख पूर्वक बैठा हूँ, तब वह
दूसरे शब्दों में यह स्वीकार कर रहा है कि उदासीनता के
समय स्वरूपानन्द की स्फूर्ति हुआ करती है [इससे यह जान
लेना चाहिय कि जागरण काल में भी आत्मानन्द का भान
प्राणियों को होता ही है।]
अहमस्मीत्यहंकारसामान्याच्छादितत्वतः।
निजानन्दो न मुख्योऽयं, किन्त्वसौ तस्य वासना ॥९६॥
[इस आनन्द को ब्रह्मानन्द न मानकर वासनानन्द ही
मानने का कारण भी सुन लो] यह उपर्युक्त आनन्द 'मैं हूँ' ऐसे
एक सामान्य [सूक्ष्म] अहंकार से आवृत रहता है [इस आनन्द
को भोगते समय अपने 'देवदत्तादिपने' का विचार नहीं रहता
किन्तु मैं हूँ ऐसा एक सामान्य (अस्पष्ट) अहंकार बना रहता
है] इस कारण यह आनन्द मुख्य आनन्द नहीं है। किन्तु यह
तो मुख्यानन्द की वासना है। [इसी से इसको 'वासनानन्द'
कहते हैं।] मुख्य आनन्द में मैं हूँ ऐसा अहंकार नहीं रहना
चाहिये।
नीरपूरितभाण्डस्य बाह्ये शैत्यं न तज्जलम्।
किन्तु नीरगुणस्तेन नीरसत्तानुमीयते ॥९७॥
जल से भरा हुआ जो घड़ा है, उसके बाहर की ओर जब
स्पर्श करते हैं, तब जो शैत्य प्रतीत होता है, वह शैत्य 'जल'
नहीं है [क्योंकि उसमें द्रवपना नहीं पाया जाता।] वह शैत्य

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
तो जल का गुण है। उस शैत्य से तो जल के होने का अनु-
मान भर हुआ करता है।
यावद्यावदहङ्कारो विस्मृतोऽभ्यासयोगतः ।
तावत्तावत्सूक्ष्मदृष्टे र्निजानन्दोऽनुमीयते ॥९८॥
[प्रकृत बात तो यह हुई कि] निरोध समाधि के अभ्यास
से जितना जितना अहंकार का विस्मरण होता जायगा—अहम्
आदि वृत्तियें विलीन होती जायंगी और योगी के चित्त में
सूक्ष्मता आती जायगी] उतना ही उतना निजानन्द अनुभव में
आने लगेगा अथवा उतना ही उतना निजानन्द व्यक्त होने
लगेगा ऐसा अनुमान से जाना जाता है।
अनुमान यों करना चाहिए—जिन क्षणों में हम अहंकार
का संकोच करने बैठते हैं, उनमें पिछले पिछले क्षणों में, पहले
पहले क्षणों से अधिक आत्मानन्द आविर्भूत होता जाता है।
क्योंकि अहंकार का संकोच करने वाले क्षणों की लम्बाई उत्त-
रोत्तर बढ़ती ही जाती है। अहंकार के विस्तार ने आत्मानन्द
को ढक रक्खा था। अब अहंकार का संकोच होने से वह
निजानन्द उघड़ने लगता है—फैलने लग पड़ता है। तात्पर्य यह
है कि—जैसे जैसे अहंकार का संकोच बढ़ने लगेगा तैसे तैसे
निजानन्द भी बढ़ता ही जायगा।
सर्वात्मना विस्मृतः सन् सूक्ष्मतां परमां व्रजेत् ।
अलीनत्वान्न निद्रैषा ततो देहोऽपि नो पतेत् ॥९९॥
जब अहंकार का विस्मरण पूर्णरूप से हो जाता है तब यह
परम सूक्ष्म हो जाता है [सब वृत्तियों के विलीन हो जाने पर
भी] अन्तःकरण का स्वरूप विलीन नहीं होता इसलिए उसे

४५४ पञ्चदशी


निद्रा नहीं कह सकते [निद्रा तो वही है जब कि बुद्धि कारण
रूप में पहुँच गई हो] अन्तःकरण के स्वरूप का विलय न होने
से ही योगी का देह निद्रा की तरह गिर नहीं पड़ता [इससे
समझ लेना चाहिए कि अन्तःकरण का स्वरूप अभी विलीन
नहीं हुआ है।]
न द्वैतं भासते नापि निद्रा तत्रास्ति यत् सुखम् ।
स 'ब्रह्मानन्द' इत्याह भगवानर्जुनं प्रति ॥१००॥
गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा
है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय, और नींद भी
न आय, उस समय जो सुख किसी को भासता हो, बस वही
'ब्रह्मानन्द' है।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१०१॥
गीता के ब्रह्मानन्दबोधक वे श्लोक ये हैं—धीर बुद्धि के
सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना करो। जब मन
को आत्मसंस्थ कर चुको [जब मन को यह निश्चय करा चुको
कि यह सब कुछ आत्मा ही है 'आत्मा से भिन्न यह कुछ भी
नहीं है'] तब बस फिर कुछ भी न सोचो। [यह तो योग की
अन्तिम हालत है।]
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥१०२॥
[ऐसी ऊँची अवस्था को जो योगी लाना चाहें वह पहले
यह करें कि] जो मन [स्वभाव दोष से ही] चंचल है, जो अस्थिर
है [जो एक विषय में बंध कर कभी नहीं रहता] ऐसा मन जिस

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५
जिस शब्दादि कारण को लेकर बाहर निकल पड़ता हो, उस
उस शब्दादि की ओर से उसे रोक कर [ उन उन शब्दादियों
के मिथ्यात्व आदि दोष दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश
देकर, वहाँ से हटा कर] आत्मा के वश में करता जाय। [इस
प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा
में ही शान्त होने लगेगा । ]
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥१०३॥
[ मन के शान्त होने पर जो होता है उसे भी सुन लो ।
संसार की मोह ममता आदि ही बड़े क्लेश कहाते हैं। ये क्लेश
रजोगुण से उत्पन्न होते हैं] वह रजोगुण जिसका शान्त हो
चुका हो, इसी कारण जिसका मन प्रशान्त हो गया हो [ जिसके
मन में विक्षेपों का उठना सर्वथा रुक गया हो। 'यह सब ब्रह्म
ही है' इस निश्चय के कारण] जिसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो गई
हो जो [जीवन्मुक्त हो गया हो] जो अकल्मष अर्थात् धर्माधर्म
से छूट चुका हो, ऐसे इस योगी को ही उत्तम सुख मिलता
है [अर्थात् उस सुख के क्षय हो जाने या उसस अधिक सुख
के होने का दोष नहीं होता । ]
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥१०४॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ॥१०५॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥१०६॥

४५६ पञ्चदशी
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥१०७॥
[ऊपर के संक्षिप्त अर्थ को गीता में ही विस्तार पूर्वक यों
समझाया गया है कि] जिस समय चित्त योगसेवा के प्रताप
से सब विषयों से हटकर उपराम को पा लेता है, जिस समय
समाधिभावना से शुद्ध किये हुए अन्तःकरण के द्वारा आत्मा
अर्थात् ज्योतिः स्वरूप पर चैतन्य को देख देख कर [विषयों
में नहीं किन्तु] अपने आप में ही तुष्ट होने लगता है॥१०४॥
जिस समय आत्मा में स्थित हुआ यह योगी आत्यन्तिक
[अर्थात् अनन्त] तथा केवल बुद्धि से गृहीत होने वाले अतीन्द्रिय
[अर्थात् इन्द्रियों की पकड़ में न आने वाले किंवा विषयों से
उत्पन्न न होने वाले ऐसे किसी अपूर्व] सुख का अनुभव किया
करता है। उस आत्मा में स्थित हुआ यह योगी उस आत्म तत्व से
च्युत नहीं होता [अर्थात् उसे कभी नहीं भूलता] ॥१०५॥ जिस
आत्मा को पाकर दूसरे लाभों को उससे अधिक मानना छोड़
देता है, जिस आत्मतत्व में स्थित हुआ यह योगी बड़े भारी
दुःखों से भी [शस्त्रों के भयंकर घावों से भी—प्रह्लाद के समान]
विचलित नहीं होता ॥१०६॥ दुःखों के संयोगों का वियोग
कर देने वाली उस पवित्र अवस्था को ही 'योग' जान लो।
जिस 'योग' का वर्णन पहले कर चुके हैं उस 'योग' को निश्चय
[अर्थात् अध्यवसाय] से निर्वेद रहित मन से करना
चाहिए ॥१०७॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥१०८॥

द्वैतानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५७

द्वैतानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५७
विगतकल्मष अर्थात् योग में आने वाले विघ्नों को पार कर
डालने वाला यह योगी, सदा ऊपर कही रीति से आत्मा का
अनुसन्धान करता करता करता, बिना ही प्रयास के ब्रह्म सम्बन्धी
[अर्थात् अविनाश्वर सर्वातिशायी ] सुख को पा लेता है ।
उत्सेक उदधे र्यद्वत् कुशाग्रेणैकविन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद् भवेदपरिखेदतः ॥१०९॥
कुशाग्र से उठाई हुई एक एक बूंद से समुद्र का उत्सेक
अर्थात् बहिःसेचन किया जाय तो यह किसी समय में जाकर
तभी हो सकता जब कि इस काम से कभी भी खिन्न न हुआ
जाय और इस काम को लगातार जारी रखा जाय । ठीक इसी
प्रकार मन का निग्रह भी यदि अखिन्न होकर किया जाय तो काल
पाकर हो ही सकता है। [इस रीति से समुद्र को सुखा डालने
का जैसा पक्का धीरज टिट्टिभी में था वैसा दृढ निश्चय करके यदि
कोई बैठ जाय तभी मन का निग्रह किया जा सकता है]
एक टिट्टिभी के अण्डों को समुद्र ने बहा लिया था। अपने
अण्डों को निकालने के लिए उस टिट्टिभी ने समुद्र को सुखा-
देने का निश्चय किया । अब वह अपनी चोंच में एक एक बूंद
लाती थी और समुद्र से बाहर डाल जाती थी। उस टिट्टिभी
में उस बड़े समुद्र को सुखा देने का इतना लम्बा अखण्ड धीरज
था। वैसा लम्बा अखण्ड धीरज जिन साधकों में होगा वे ही
मन का निग्रह कर सकेंगे। जो तो यह सोचते होंगे कि हमें
प्रयत्न करते करते महीनों बीत गए अभी तक मनोनिग्रह नहीं
हो पाया ऐसे अधीर साधक लोग इस मार्ग में अवश्य ही निराश
होंगे।

४५८ पञ्चदशी
बृहद्रथस्य राजर्षेः शाकायन्यो मुनिः सुखम् ।
प्राह मैत्रारूयशाखायां समाध्युक्तिपुरःसरम् ॥११०॥
गीता में ही नहीं मैत्रायणी शाखा में भी शाकायन्य नाम
के किसी मुनि ने, अपने शिष्य बने हुए बृहद्रथ राजर्षि के प्रति
ब्रह्मसुख का कथन समाधि का वर्णन करके किया है।
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति ।
तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥१११॥
[उस में कहा गया है कि] ईधन को जला चुकने वाली
अग्नि जैसे अपने कारण [अग्नि] में ही शान्त हो जाती है
[अपने लपट आदि विशेष आकारों को छोड़ कर केवल अग्नि
मात्ररूप में आ जाती है] ठीक इसी प्रकार यह अन्तःकरण भी
निरोध समाधि का अभ्यास करने से राजस आदि सब वृत्तियों
के नष्ट हो जाने के कारण अपनी योनि अर्थात् केवल सत्त्वरूप
में शान्त हो जाता है [उस समय सत्व ही सत्व शेष रह जाता
है अन्तःकरण नहीं रहता]
स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यकामिनः ।
इन्द्रियार्थविमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥११२॥
जो मन सत्यकामी हो चुका है, [सत्य आत्मा के सिवाय
जिसे और किसी की कामना ही नहीं रह गयी है इसी कारण]
जो अपने कारण में शान्त हो बैठा है इसी लिए शब्दादि विषय
की ओर से जिसने अपना मुख मोड़ लिया है [जो बाह्यज्ञान
से शून्य हो गया है] ऐसे [संस्कारी] मन की दृष्टि में कर्म के
वश से प्राप्त होने वाले [साधनों के अधीन] सुखादि अनृत हो

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५९
जाते हैं [उन को यह समझ लिया जाता है कि ये तो मायिक
होने से मिथ्या हैं]
चित्तमेव हि संसारस्तत् प्रयत्नेन शोधयेत् ।
यच्चित्तस्तन्मयो मर्त्यो गुह्यमेतत् सनातनम् ॥११३॥
[यद्यपि यह ठीक है कि यह संसार चित्त से नहीं बना है।
परन्तु यह संसार भोग्य तो चित्त के कारण से ही बन जाता
है इस कारण कहते हैं कि ] चित्त ही संसार है [यह सभी के
अनुभव में आने वाली बात है। तभी तो सुषुप्ति आदि के समय
जब चित्त का विलय हो जाता है तब भोग नहीं होता] जब कि
चित्त ही संसार है तब फिर उस चित्त को [अभ्यास या वैराग्य
आदि] प्रयत्न से शुद्ध कर लेना चाहिए। [चित्त के रज और
तम हटा कर उसे एकाग्र कर लेना चाहिए। ] जिस देहधारी
का चित्त जिस पुत्रादि में पड़ा रहता है वह देह धारी तन्मय
ही हुआ रहता है। [उस पुत्रादि की सकलता और विकलता
को वह अपने आत्मा में ही आरोपित कर लेता है] यह एक
अनादिसिद्धि रहस्य है।
भाव यह है कि—आत्मा स्वभाव से शुद्ध है, परन्तु चित्त
के संपर्क से ही उस में संसारीपना आ गया है। ऐसी अवस्था
में चित्त का शोध करने से ही संसार की निवृत्ति हो सकेगी।
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् ।
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमक्षय्यमश्नुते ॥११४॥
जब किसी के चित्त में इतना प्रसाद आ जाता है कि वह
ब्रह्मतत्व का अनुसन्धान कर सके तब फिर वह शुभाशुभ सभी
कर्मों का क्षय कर डालता है अर्थात् कर्मों में से अहंबुद्धि को

४६० पञ्चदशी
हटा लेता है । [ सरकण्डे की रूई जैसे आग में सहसा भड़
भड़ा उठती है इसी तरह उसके सम्पूर्ण पाप सहसा नष्ट होजाते
हैं । ] प्रसन्न चित्त वाला वह, आत्मा [ अर्थात् स्वस्वरूप अद्वि-
तीयानन्दरूप ब्रह्म तत्व ] में स्थित होकर, ['वही मैं हूँ' इस
निश्चय के कारण सम्पूर्ण दृश्यों को छोड़कर ] चिन्मात्र रूप
में स्थिर होकर, अविनाशी जो सुख है [जो कि उसी का स्वरूप
है] उसे पा लेता है ।
शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म त्याज्य हैं। पुण्य कर्म से
सुख मिलता है। सुख से प्रमाद बढ़ता है। प्रमाद से पापाचरण
होता है। पापाचरण से दुःख मिलता है। दुःख से पश्चात्ताप
होता है। पश्चात्ताप से पुण्यवासना उत्पन्न होती है। पुण्यवा-
सना से फिर पुण्य कर्म होता है। यों यह पुण्य पाप का चक्कर
अनन्त काल से घूम रहा है। यों इस चक्कर पर ध्यान रक्खें
तो पुण्य भी पाप की तरह ही घातक है। इसीलिए वह भी
त्याज्य है। इन दोनों को छोड़ कर अक्षय सुख के मार्ग पर
हमें चल पड़ना चाहिए।
समासक्तं यथा चित्तं जन्तो र्विषयगोचरे ।
यद्येवं ब्रह्मणि स्यात् तत् को न मुच्येत बन्धनात्।।११५
प्राणी का चित्त विषय रूपी चरागाह में जैसे स्वभाव से
ही रमा रहता है, वही चित्त यदि ब्रह्म में उसी तरह आसक्त
हो जाय तो भला कौन इस संसार से मुक्त न हो जाय ?
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च ।
अशुद्धं कामसंपर्काच्छुद्धं कामविवर्जितम् ॥११६॥
शुद्ध और अशुद्ध यों दो प्रकार का मन होता है। काम

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६१
क्रोधादि के सम्पर्क से तो मन अशुद्ध हो जाता है। कामरहित
मन ही शुद्ध मन कहाने लगता है।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥११७॥
मन से ही बन्धन और मन से मनुष्यों को मोक्ष मिला
करता है। 'विषयासक्त' मन बंधवा देता है। 'निर्विषय' मन
मुक्ति दिला देता है।
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो
निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत् ।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा
स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥११८॥
जिस चित्त को आत्मा में लगा दिया जाता ह, जिस चित्त
के रज तम रूपी मल समाधि रूपी जल से धो दिये जाते हैं,
उस चित्त को [समाधि में] जो आनन्द आता है, उस आनन्द
का वर्णन वाणी से तो किया ही नहीं जा सकता [क्योंकि वह
तो एक अलौकिक ही सुख है। वह तो मौन की अलौकिक
भाषा में ही समझा और कहा जा सकता है] वह स्वरूपभूत
सुख तो केवल अन्तःकरण से ही गृहीत हुआ करता है।
यद्यप्यसौ चिरं कालं समाधिदुर्लभो नृणाम् ।
तथापि क्षणिको ब्रह्मानन्दं निश्चाययत्यसौ ॥११९॥
यद्यपि चिरकाल तक स्थिर रहने वाली ऐसी समाधि
मनुष्यों को दुर्लभ होती है, तौ भी क्षणिक भी वह [समाधि]
ब्रह्मानन्द का निश्चय तो करा ही देती है।

४६२ पञ्चदशी
श्रद्धालुर्व्यसनी योऽत्र निश्चिनोत्येव सर्वथा ।
निश्चिते तु सकृत् तस्मिन् विश्वसित्यन्यदाप्ययम्॥१२०
जो श्रद्धालु है, जिसे इस बात की धुन लग गई है [ कि
इसे तो अब सिद्ध करके ही छोड़ूँगा] वह तो इस समाधि में
आनन्द मिलने का निश्चय कर ही लेता है [ उसे लम्बा प्रयास
करते करते कभी कभी एकाध क्षण के लिए इस आनन्द की
झांकी मिल ही जाती है] क्षणिक समाधि में एक बार जब इस
ब्रह्मानन्द का निश्चय उसे हो जाता है तब फिर वह और समय
भी आनन्द के होने का विश्वास कर लेता है ।
तादृक् पुमानुदासीनकाले प्यानन्दवासनाम् ।
उपेक्ष्य मुख्यमानन्दं भावयत्येव तत्परः ॥१२१॥
श्रद्धादि पूर्वक एक बार भी जिसे निश्चय हो गया है ऐसा
मनुष्य, उदासीनता के समय में जो पूर्वोक्त आनन्द वासना
आया करती है उसकी भी उपेक्षा कर देता है—उसे भी हटने
को कह देता है—और तत्पर होकर मुखानन्द की ही भावना .
किया करता है ।
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि ।
तदेवास्वादयत्यन्तः परसङ्गरसायनम् ॥१२२॥
एवं तत्वे परे शुद्धे धीरो विश्रान्ति मागतः ।
तदेवास्वादयत्यन्तः र्बहिर्व्यवहरन्नपि ॥१२३॥
परपुरुष के संभोग का व्यसन जिस नारी को लग जाता
है, वह जैसे घर के कामों में व्यग्र सी दीखने पर भी, अन्दर
मन में तो उसी परसङ्ग के मजे को चाखती रहती है ॥१२२॥
इसी प्रकार जब कोई धीर पुरुष 'पर' तथा 'शुद्ध' आत्मतत्व

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६३
में एक बार क्षण भर के लिए भी विश्राम पा लेता है तब फिर
वह बाहर लोकव्यवहार करता हुआ भी अन्दर अपने मन में तो
उसी आत्मतत्व का आस्वाद लिया करता है। [यों व्यवहार
करते हुए भी आत्मसाधन चल सकता है। अर्थात् व्यवहार
ज्ञान का विरोधी नहीं है।]
धीरत्वमक्षप्राबल्ये ध्यानन्दास्वादवाञ्छया ।
तिरस्कृत्याखिलाक्षाणि तच्चिन्तायां प्रवर्तनम् ॥१२४॥
[विषयों के सामने आने पर, विषयों की ओर को पुरुष
को खींच ले जाने का सामर्थ्य इन्द्रियों में है। यों] इन्द्रियों
की प्रबलता होने पर भी आत्मसुख का आस्वाद लेने की उदार
इच्छा से, जब सारी इन्द्रियों का तिरस्कार कर दिया जाय,
और आत्मानुसन्धान में ही प्रवृत्त हुआ जाय, तब यही 'धीर-
पना' कहाता है।
भारवाही शिरोभारं मुक्त्वास्ते विश्रमं गतः ।
संसारव्यावृतित्यागे तादृग्बुद्धिस्तु विश्रमः ॥१२५॥
बोझा उठाने वाला पुरुष थकाने वाले सिर के बोझे को
उतार कर जैसे श्रमरहित हो जाता है, इसी प्रकार संसार के
व्यापारों का परित्याग कर देने पर, जब किसी-को वैसी ही
बुद्धि हो जाय, कि मैं अब श्रमरहित हो गया हूँ—तब बस
इसी को 'विश्राम' कहा जाता है।
विश्रान्तिं परमां प्राप्त स्तवौदासीन्ये यथा तथा ।
सुखदुखदशायां च तदानन्दैकतत्परः ॥१२६॥
[जिस परम विश्रान्ति का वर्णन ऊपर किया है वह] परम
विश्रान्ति जिस पुरुष को मिल जाती है, वह पुरुष जिस तरह

१६४ पञ्चदशी
अपनी उदासीन' अवस्था में लगन के साथ, परमानन्द का
स्वाद लेने को उद्यत रहता है, उसी तरह उसका यह स्वभाव
हो जाता है कि—फिर वह सुख दुःख प्राप्त होने के समय या
सुख दुःख के कारणों के प्राप्त होने के समय में भी [उन सब
का विचार छोड़ छोड़ कर] आत्मानन्द का आस्वाद लेने में ही
तत्पर रहने लगता है।
अग्निप्रवेशहेतौ धीः शृङ्गारे यादृशी तथा।
धीरस्योदेति विषयेऽनुसन्धानविरोधििन ॥१२७॥
सती होने वाली स्त्री के लिए जब अग्निप्रवेश का कारण
उपस्थित हो जाता है। शीघ्र ही देहत्याग की बलवती दृढ़ इच्छा
जब जाग उठती है तब उसको इस त्याग में विघ्न डालने वाले
शृङ्गार की कुछ भी परवाह नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार
वैराग्यादि साधनसम्पन्न विवेकी को, उस विषयसुख की पर-
वाह नहीं रहती, जो कि ब्रह्मानुसन्धान का विरोधी होता है।
भाव यह है कि विषयसुख, विषयसम्पादन के प्रयत्न में
पुरुष को इतना बहिर्मुख बना देता है कि वह पुरुष फिर आत्मा-
नुसन्धान कर ही नहीं सकता। इस कारण विवेकी लोगों को
वैषयिक सुख की इच्छा ही नहीं होती। भले ही उसको अनुकूल
समझ कर संसारी लोग उसके लिए मरते फिरें। जैसे दुःख
आत्मविचार का विरोधी होता है वैसे ही विषयसुख भी आत्म-
विचार का विरोधी है।
अविरोधिसुखे बुद्धिः स्वानन्दे च गमागमौ ।
कुर्वन्त्यास्ते क्रमादेषा काकाक्षिवदितस्ततः ॥१२८॥
कौवे की आंखों की तरह योगी की बुद्धि कभी तो आत्मा

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६५
नन्द में और कभी आत्मानन्द के अविरोधी सुख में आती जाती
रहती है।
एकैव दृष्टिः काकस्य वामदक्षिणनेत्रयोः ।
यात्यायात्येवमानन्दद्वये तत्त्वविदो मतिः ॥१२९॥
जैसे कव्बे की एक ही आंख [पुतली] होती है, वह बायीं
और दायीं दोनों आंखों में पर्याय से गमागम करती रहती है।
इसी प्रकार विवेकी की बुद्धि भी दोनों आनन्दों में जाती आती
रहती है।
भुञ्जानो विषयानन्दं ब्रह्मानन्दं च तत्त्ववित् ।
द्विभाषाभिज्ञवद् विद्यादुभौ लौकिकवैदिकौ ॥१३०॥
'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों आनन्दों को एक ही
साथ भोगने वाला तत्त्वज्ञानी, दुभाषिये के समान लौकिक और
वैदिक दोनों ही तरह के आनन्दों को जाना करता है। जैसे
कोई दुभाषिया दोनों से बातचीत करके दोनों के मन की जान
लेता हो इसी प्रकार तत्त्वज्ञानी भोग भी करता है और ब्रह्मा-
नन्द को भी जानता रहता है।
दुःखप्राप्तौ न चोद्वेगो यथापूर्वं यतो द्विदृक् ।
गङ्गामग्नार्धकायस्य पुंसः शीतोष्णधीर्यथा ॥१३१॥
जिस पुरुष का आधा शरीर गंगा जल में डूब रहा हो और
आधे पर सूरज की धूप पड़ रही हो, वह जैसे एक ही समय
शीत और उष्ण दोनों का अनुभव करता रहता है, इसी प्रकार
दुःखों की प्राप्ति होने पर भी, [पहली अज्ञानदशा की तरह]
उसको उद्वेग नहीं होता। क्योंकि वह तो दो दृष्टि वाला होजाता
है [विपत्ति के पहाड़ के टूट पड़ने पर भी वह तो वैदिक ब्रह्मा-
३१

४६६ पञ्चदशी
नन्द को याद करके आनन्दमग्न हुआ रहता है जिस समय
उसे दुःख हो रहा है उसी समय उसे ब्रह्मानन्द भी तो आरहा
है वह उस को दुःखी होने नहीं देता]
इत्थं जागरणे तत्वविदो ब्रह्मसुखं सदा ।
भाति,तद्वासनाजन्ये स्वप्ने तद् भासते तथा ॥१३२॥
इस प्रकार जागरण काल में चाहे तो सुखानुभव होता हो,
चाहे दुःखानुभव हो रहा हो, और चाहे वे उदासीन होकर चुप
चाप बैठे हों, तत्वज्ञानी लोगों को सदा ही ब्रह्मानन्द प्रतीत होता
रहता है । केवल जागरण काल में ही नहीं किन्तु जाग्रत् की
वासना से उत्पन्न होने वाले सपने में भी जाग्रत् अवस्था की
तरह ही उनको ब्रह्मसुख भासा करता है ।
अविद्यावासनाऽप्यस्तीत्यतस्तद्वासनोत्थिते ।
स्वप्ने मूर्खवदेवैष सुखं दुःखं च वीक्षते ॥१३३॥
यह तो कहा ही नहीं जासकता कि केवल आनन्दवासना
से ही सपने आते हों । सपने तो अविद्यावासना से भी आते
हैं । इस कारण जो सपना अविद्या वासना से आता है, उस
सपने में ज्ञानी को भी मूर्खों की तरह ही सुखं और दुःख देखने
पड़ जाते हैं ।
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे ब्रह्मानन्दप्रकाशकम् ।
योगिप्रत्यक्षमध्याये प्रथमेऽस्मिन्नुदीरितम् ॥१३४॥
ब्रह्मानन्द नाम का जो पांच अध्याय का ग्रन्थ है उस के
इस प्रथमाध्याय में, ब्रह्मानन्द को प्रकाशित करने वाले योगी
के अनुभव का वर्णन किया गया है ।

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६७
सुषुप्ति अवस्था में,उदासीन काल में, समाधि भावना के समय
तथा सुख दुःख की दशा में स्वयंप्रकाश ब्रह्मानन्द को प्रकाशित
करने वाला योगी का अनुभव कैसा होता है।]
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे योगानन्दो नाम
प्रथमोऽध्यायः।

12. Atmananda

ओम्
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम्
नन्वेवं वासनानन्दाद् ब्रह्मानन्दादपीतरम् ।
वेत्तु योगी निजानन्दं मूढस्यात्रास्ति का गतिः ॥१॥
[अब ब्रह्मानन्द के अन्तर्गत 'आत्मानन्द' नाम के द्वितीय
अध्याय का आरम्भ किया जाता है] शिष्य ने प्रश्न किया कि—
वासनानन्द और ब्रह्मानन्द से भिन्न जो आत्मानन्द है उसको
योगी लोग तो [इससे पहले योगानन्द नाम के प्रकरण में कहे
अनुसार] जान ही सकेंगे। परन्तु इस आत्मानन्द को वे मूढ
लोग—जिनकी गति योग में नहीं—कैसे जानें ?
धर्माधर्मवशादेष जायतां म्रियतामपि ।
पुनः पुनर्देहह्रदैः किं नो दाक्षिण्यतो वद ॥२॥
[गुरु ने उत्तर दिया कि] यह अतिमूढ पुरुष तो [बीते हुए
अनन्त कोटि जन्मों में किये हुए] पुण्य पापों के बस में आ आकर
अनेक प्रकार की लाखों योनियों में जन्मता और मरता रहेगा
ही। हमारी चतुराई से क्या होना है ? [ तात्पर्य यह है कि
अति मूढ को तो ब्रह्मविद्या का अधिकार ही नहीं है। उसे जीने
मरने दो उसकी चिन्ता मत करो।]
अस्ति वोऽनुजिघृक्षुत्वाद्दाक्षिण्येन प्रयोजनम् ।
तर्हि ब्रूहि स मूढः किं जिज्ञासुर्वा पराङ्मुखः ॥३॥
यदि तुम शिष्य लोग अनुजिघृक्षु हो—शिष्यों का उद्धार
करने की यदि तुम्हें इच्छा हो और तुम्हारे दाक्षिण्य से उनका

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९
उद्धार रूपी प्रयोजन सिद्ध होता दीख पड़ता हो तो तुम यह
बताओ कि वह मूढ [ जिस पर तुम कृपालु हुए हो ] जिज्ञासु
है या पराङ्मुख है ? [ उसे संसार से वैराग्य हो गया है या
वह अभी संसार में आसक्त हो रहा है ? ]
उपास्तिं कर्म वा ब्रूयाद् विमुखाय यथोचितम् ।
मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासुमात्मानन्देन बोधयेत् ॥४॥
यदि वह तत्वज्ञान से विमुख अर्थात् रागी है तो उसको
उसके राग के अनुकूल कर्म या उपासना का यथोचित उपदेश
कर देना चाहिए। [ यदि उस मूढ को ब्रह्मलोकादि की
कामना है तो उसे उपास्ति बता देनी चाहिए और यदि
वह स्वर्ग का मज़ा लूटना चाहता है तो उसे कर्म का मार्ग
बताना चाहिए] यदि तो वह मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु है तो उसे
आत्मानन्द से समझाना चाहिए । [ उसके सामने आत्मानन्द
की विवेचना करनी चाहिए और उसे अज्ञाननिद्रा से जगा
लेना चाहिए]
बोधयामास मैत्रेयीं याज्ञवल्क्यो निजप्रियाम् ।
न वा अरे पत्युरर्थे पतिः प्रिय इतीरयन् ॥५॥
याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि ने मैत्रेयी नाम की अपनी पत्नी
को 'अरे पत्नी को पति के लिए पति प्रिय नहीं होता' इत्यादि
शब्दों से इसी आत्मानन्द की विवेचना करते करते आत्म बोध
करा दिया था ।
पतिर्जाया पुत्रवित्ते पशुब्राह्मणबाहुजाः ।
लोका देवा वेदभूते सर्वं चात्मार्थतः प्रियम् ॥६॥
पति, पत्नी, पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव,

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वेद तथा भूत, ये सभी कुछ भोक्ता आत्मा के लिए होने से ही
प्यारे हो जाते हैं [इन में से एक भी पदार्थ स्वरूप से प्यारा
नहीं होता]
पत्याविच्छा यदा पत्न्यास्तदा प्रीतिं करोति सा ।
क्षुदनुष्ठानरोगाद्यै स्तदा नेच्छति तत्पतिः ॥७॥
जब पत्नी को पति की इच्छा होती है, तभी वह पति से
प्रेम करती है। परन्तु उसका पति भूख में, किसी अनुष्ठान में
या किसी रोगादि में, फंसा होता है, तो वह उस पत्नी को नहीं
चाहता [इस कथन से यह समझलो कि पत्नी का प्रेम इकतरफ़ा
प्रेम है। यह प्रेम अकेली पत्नी का ही स्वार्थ है]
न पत्युरर्थे सा प्रीतिः स्वार्थ एव करोति ताम् ।
पतिश्चात्मन एवार्थे न जायार्थे कदाचन ॥८॥
पत्नी का वह प्रेम पति के लिए नहीं होता। किन्तु वह पत्नी
उस प्रेम को तो अपने लिए ही करती है। उधर पति की भी
यही अवस्था है। वह भी अपने मतलब से ही पत्नी से प्रेम
किया करता है। वह भी पत्नी के लिए पत्नी से प्रेम कभी
नहीं करता।
अन्योन्यप्रेरणेप्येवं स्वेच्छयैव प्रवर्तनम् ॥६॥
जब तो दोनों की इच्छा से दोनों एक साथ ही प्रवृत्त होते
हैं [तब भी प्रीति को उभयार्थ न मानना चाहिए क्योंकि] तब
भी तो वे दोनों [इसी प्रकार अपनी अपनी कामना को पूरा
करने की] अपनी अपनी इच्छा से ही प्रवृत्त हुआ करते हैं।
[पत्नी अपनी इच्छा से पति को प्रेरणा करती है और पति
अपनी इच्छा से पत्नी को प्रेरणा किया करता है।]