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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

३५६ पञ्चदशी
सर्वं ब्रह्मेति जगता सामानाधिकरण्यवत् ।
अहं ब्रह्मेति जीवेन समानाधिकृतिर्भवेत् ॥४५॥
जैसे 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति में जगत् के साथ बाधा
में भी सामानाधिकरण्य देखा गया है, इसी प्रकार 'अहं ब्रह्म'
इस वाक्य में जीव के साथ भी सामानाधिकरण्य हो ही
सकता है।
सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वं निराकृतम् ।
प्रयत्नतो विवरणे कूटस्थस्य विवक्षया ॥४६॥
विवरणाचार्य ने जो बाधसामानाधिकरण्य का प्रयत्न-
पूर्वक खण्डन किया है उसका कारण तो यह है, कि उन्होंने तो
अहं शब्द का अर्थ कूटस्थ लिया है और यों सामानाधिकरण्य
का खण्डन करडाला है।
शोधितत्वंपदार्थो यः कूटस्थो ब्रह्मरूपताम् ।
तस्य वक्तुं विवरणे तथोक्त मितरत्र च ॥४७॥
जिस कूटस्थ के त्वं पदार्थ का शोध कर लिया गया हो
[त्वं पद के लक्ष्य जिस कूटस्थ को बुद्धि आदियों से विविक्त
कर लिया गया हो] उसी को ब्रह्मरूप बताने के लिये विवरण
में तथा अन्य ग्रन्थों में बाधसामानाधिकरण्य को हटाकर
मुख्य सामानाधिकरण्य को कहदिया है
देहेन्द्रियादियुक्तस्य जीवाभासभ्रमस्य या ।
अधिष्ठानचितिः सैषा कूटस्थात्र विवक्षिता ॥४८॥
देह इन्द्रिय और मनसे [ किंवा दोनों शरीरों से ] युक्त
जो जीवाभास रूपी भ्रम है, उस भ्रमका अधिष्ठान जो
चैतन्य है, उसी को तो वेदान्तों में 'कूटस्थ' कहा है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् १४७

कूटस्थदीपप्रकरणम् १४७
जगद्भ्रमस्य सर्वस्य यदधिष्ठानमीरितम् ।
त्रय्यन्तेषु तदत्र स्याद् ब्रह्मशब्दविवक्षितम् ॥४९॥
तथा वेदान्तों में जिसको इस सब जगत् की कल्पना का
अधिष्ठान बताया गया है, उसीको यहां 'ब्रह्म' शब्द से कहा
गया है [ जीवत्वरूपी भ्रमका अधिष्ठान चेतन 'कूटस्थ' है
तथा जगद्रूपी भ्रम का अधिष्ठान जो चेतन है वह 'ब्रह्म'
शब्द से कहा जाता है ]
एकस्मिन्नेव चैतन्ये जगदारोप्यते यदा ।
तदा तदेकदेशस्य जीवाभासस्य का कथा ॥५०॥
जब एकही चैतन्य में इस समस्त जगत् का आरोप किया
जाता है, तब उसी जगत् के एक भाग जीवाभास [चिदाभास]
का तो कहना ही क्या ? [ उसको भी उसी में आरोपित
मान लेना चाहिये]
जगत्तदेकदेशाख्यसमारोप्यस्य भेदतः ।
तत्त्वंपदार्थों भिन्नौ स्तो वस्तुतस्त्वेकता चितेः ॥५१॥
जगत् और जगत् का एक देश [ आभास ] कहाने वाला
जो आरोपणीय पदार्थ है, उसके भेद की वजह से ही 'तत्'
और 'त्वं' पदार्थ भिन्न भिन्न हैं। असल में तो 'चिति' एक
ही है। यों उनमें औपाधिक तो भेद हैं तथा वास्तव एकता
ही है। [जगत् का ध्यान करें तब उस चेतन को तत् अर्थात्
ब्रह्म कहते हैं, देह इन्द्रिय आदि का ध्यान करें तब उस चेतन
को त्वं अर्थात् कूटस्थ कहते हैं। जगत् को और देहादि को
भूल जांय तो अकेला चेतन ही चेतन शेष रहजाता है]

३४८ पञ्चदशी
कर्तृत्वादीन् बुद्धिधर्मान् स्फूर्त्याख्यां चात्मरूपताम् ।
दधद् विभाति पुरत आभासोऽतो भ्रमो भवेत् ॥५२॥
यह जो आभास है यह कर्तृत्व भोक्तृत्व प्रमातृत्व आदि बुद्धि
के धर्मों को तथा स्फूर्ति नामके आत्माके धर्म को धारण किये
हुये, सामने दीख पड़ता है इससे भ्रम हो ही जाता है [भ्रम
स्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही के
धर्म दीखते हैं और वह आरोपित [कल्पित] मानी जाती है
इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से ही यह आभास कल्पित है।
का बुद्धिः कोऽयमाभासः को वात्मात्र जगत् कथम् ।
इत्यनिर्णयतो मोहः सोऽयं संसार इष्यते ॥५३॥
बुद्धि क्या वस्तु है ? आभास कौन है इन सब में आत्मा
नाम का पदार्थ कौन सा है? यह जगत् कैसे बन गया है? इन
सब बातों के स्वरूप का निर्णय जब कोई नहीं कर पाता तब
उसे मोह हो जाता है । बस इसी को संसार कहते हैं [ मुमुक्षु
लोगों को इसी मोह को हटाना है यही मोह सब अनर्थों का
मूल कारण है ]
बुद्ध्यादीनां स्वरूपं यो विविनक्ति स तत्ववित् ।
स एव मुक्त इत्येवं वेदान्तेषु विनिश्चयः ॥५४॥
बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक जो कर लेता है [ बुद्धि
आभास आत्मा और जगत् इन चारों को अलग अलग छांट
कर जो रख लेता है] वही ज्ञानी है, वही मुक्त है, [उसी
का अनर्थों से छुटकारा हो सकता है ] यही वेदान्तों का
निश्चय है ।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४९

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४९
एवं च सति बन्धः स्यात् कस्येत्यादिकुतर्कजाः ।
विडम्बना दृढं खण्ड्याः खण्डनोक्तिप्रकारतः ॥५५॥
जब कि बन्ध भी अविवेकमूलक ही है और मोक्ष भी
अविवेकमूलक ही है, तब फिर अद्वैतवाद में किस का बन्ध
और किसका मोक्ष होता है ? इत्यादि तार्किकों के किये हुए कुतर्क-
मूलक परिहासों का परिहार खण्डन नामक ग्रन्थ में लिखी हुई
विधि से करना चाहिये ।
वृत्तेः साक्षितया वृत्तिप्रागभावस्य च स्थितः ।
बुभुत्सायां तथाऽज्ञोऽसीत्याभासाज्ञानवस्तुनः ॥५६॥
पुराणों में कहा है कि—कामादिवृत्तियों की उत्पत्ति जब
हो जाती है तब तो यह शिव उन वृत्तियों का साक्षी बन कर
रहता है, वृत्तियों के उदय होने से पहले वृत्ति के प्रागभाव का
साक्षी होकर रहता है,जब आत्मजिज्ञासा होती है तब जिज्ञासा
का साक्षी हो जाता है, उससे पहले तो यह शिव 'मैं अज्ञानी
हूँ' इस रूप से अनुभव में आने वाले अज्ञान का साक्षी बन
कर बैठा रहता है ।
असत्यालम्बनत्वेन सत्यः, सर्वजडस्य तु ।
साधकत्वेन चिद्रूपः, सदा प्रेमास्पदत्वतः ॥५७॥
आनन्दरूपः, सर्वार्थसाधकत्वेन हेतुना ।
सर्वसम्बन्धवत्वेन संपूर्णः शिवसंज्ञितः ॥५८॥
वह शिव क्योंकि इस असत्य जगत् का आलम्बन [अधि-
ष्ठान] है इसी से 'सत्य' है, सब जडों का साधक किंवा अव-
भासक होने से ही वह 'चिद्रूप' है, सदा प्रेम का विषय होने
से ही वह 'आनन्दरूप' है, सब अर्थों का साधक होने से तथा

३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है ।
उसी को शिव भी कहते हैं ।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है ।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि- माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है । अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वस्मादन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं-] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो- वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१
नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो । जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है । [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
असन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ खमृगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है । फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखलाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोपयन्त्यस्य.वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है।
उसी को शिव भी कहते हैं।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि—माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है। अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वसदन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं—] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो—वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या

[कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१]

नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो। जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है। [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
अस्मन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ स्वप्नगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[ जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है। फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोषयन्त्यस्य वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

३५२ पञ्चदशी
प्रत्युत सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर होकर इस कूटस्थ को ही
वास्तव पदार्थ कह रहे हैं । वे इस कूटस्थ के प्रतिपक्षी किसी
भी पदार्थ को सहन नहीं करते हैं ।
श्रुत्यर्थं विशदीकुर्मो न तर्काद्वच्मि किंचन ।
तेन तार्किकशङ्काना मत्र कोऽवसरो वद ॥६७॥
हम तो केवल श्रुति के तात्पर्य को ही विशद् करते हैं ।
तर्क के सहारे से तो हम कुछ भी नहीं कहते हैं । ऐसी अवस्था
में तार्किकों की शंकाओं का यहां अवसर ही कौनसा है ? इस
धातु का प्रयोग बहुवचन में न आने के कारण 'वच्मि' यह
प्रयोग किया है ।
तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य मुमुक्षुः श्रुति माश्रयेत् ।
श्रुतौ तु माया जीवेशौ करोतीति प्रदर्शितम् ॥६८॥
इस कारण मुमुक्षु को चाहिये कि—इस दुरवगाह आत्म-
तत्त्व को जानने के लिये कुतर्क को छोड़कर श्रुति का आश्रय ले
ले । श्रुतियों में तो जीवेश्वरों को मायिक कहा ही है ।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशकृता भवेत् ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकर्तृकः ॥६९॥
ईक्षण से लेकर प्रवेश तक की सृष्टि तो ईश्वर की बनायी
हुई है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, बन्ध तथा मोक्षरूपी संसार को
जीव ने बना लिया है । [इसका स्पष्टीकरण तृप्तिदीप के चतुर्थ
श्लोक में है]
असङ्ग एव कूटस्थः सर्वदा नास्य कश्चन ।
भवत्यतिशयस्तेन मनस्येवं विचार्यताम् ॥७०॥
मुमुक्षु लोग इस बात को अपने मन में सदा ही विचारा

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३
करें कि यह कूटस्थ तो असङ्ग ही रहता है । [ जन्म जरा रोग
और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे
हैं परन्तु ] इन सब से इस कूटस्थ तत्व में कभी कुछ भी अतिशय
नहीं हो पाता है [यह तो सदा वैसे का वैसा ही बना
रहता है] ।
न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥७१॥
सब झंझट को छोड़कर परमार्थ का निचोड़ पूछो तो इतना
ही है किः—मरण और जन्म कुछ चीज़ ही नहीं हैं। बद्ध और
साधक कोई होता ही नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को कह
ही नहीं सकते हैं ।
अवाङ्मनसगम्यं तं श्रुतिर्बोधयितुं सदा ।
जीवमीशं जगद् वापि समाश्रित्य प्रबोधयेत् ॥७२॥
वाणी और मन से अगम्य उसी तत्व का बोध कराने के
लिये श्रुति भगवती 'जीव' या 'ईश्वर' या 'जगत्' इन तीनों में
से किसी एक को पकड़ कर, उस मन वाणी के अगम्य तत्व का
बोध करा देती है । [मन वाणी के अगम्य उस तत्व का बोध
कराने के लिये श्रुतियों में 'जीव' 'ईश्वर' तथा 'जगत्' के स्वरूप
का प्रतिपादन जहां तहां किया गया है । उसका परमतात्पर्य तो
जिस किसी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध कराने में
ही है।]
यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वीत्याचार्यभाषितम् ॥७३॥
२४

३५४ पञ्चदशी
जिस जिस प्रक्रिया से पुरुषों को आत्मतत्व का परिज्ञान
हो जाय, वही प्रक्रिया ठीक होती है। यह बात सुरेश्वराचार्य
ने कही है।
वह आत्मतत्व एकरूप ही हैं। तत्व में किसी प्रकार की
भी भिन्नता नहीं है। बोध कराने के प्रकारों में ही भिन्नता पायी
जाती है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना है, या जिन्होंने
बोध कराना है, उन सब के चित्त एक समान नहीं होते। उनके
चित्तों में बड़ी विषमता रहती है। उनके चित्तों की विषमता के
कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। यही
अभिप्राय सुरेश्वराचार्य का है।
श्रुतितात्पर्य मखिल मबुद्ध्वा भ्राम्यते जडः ।
विवेकी त्वखिलं बुद्ध्वा तिष्ठत्यानन्दवारिधौ ॥७४॥
श्रुति का अर्थ तो एक ही हो सकता है। फिर भी जो लोग
विरुद्ध अर्थ करके आपस में विवाद करते हैं उसका कारण यह
है कि—जड लोग श्रुति के पूरे तात्पर्य को न समझ कर भ्रम
में पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को
समझ कर आनन्दसमुद्र में मग्न रहने लगते हैं।
मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्वेष यथा तथा ।
चिदाकाशस्य नो हानि र्न वा लाभ इति स्थितिः॥७५॥
विवेकी लोगों का तो यह निश्चय होता है कि—यह माया
रूपी मेघ, जगत् रूपी जल को, जैसे तैसे भले ही बरसाता रहो।
इसके बरसने से चिदाकाश का कुछ भी हानि या लाभ नहीं
होता है। यही सच्ची स्थिति भी है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५५

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५५
इमं कूटस्थदीपं योऽनुसन्धत्ते निरन्तरम् ।
स्वयं कूटस्थरूपेण दीप्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥७६॥
जो सदा ही इस कूटस्थदीप का विचार करेंगे, वे स्वयं ही
सदा कूटस्थरूप होकर चमक उठेंगे ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यविरचितपंचदश्यां कूटस्थदीपप्रकरणं समाप्तम्

9. Dhyanadipa

ॐ
ध्यानदीपप्रकरणम्
संवादिभ्रमवद् ब्रह्मतत्त्वोपास्त्यापि मुच्यते ।
उत्तरे तापनीयेऽतः श्रुतोपास्तिरनेकधा ॥१॥
जो मनुष्य संवादिभ्रम में आकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता
है, जैसे उसे उसकी अभिप्रेत वस्तु मिल ही जाती है, उसी
प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना करने से भी मोक्ष मिल जाता है
[यद्यपि यह मोक्ष का सीधा रास्ता नहीं है] इसी कारण तापनीय
उपनिषत् में अनेक प्रकार से ब्रह्मतत्व की उपासनायें सुनी गयी हैं।
जिन लोगों ने उपनिषदों का श्रवण कर लिया हो और बुद्धि
की मन्दता आदि किसी प्रतिबन्ध से वाक्यार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान
उत्पन्न न होता हो, उसके लाभ के लिए, अपरोक्षज्ञान को पैदा
कर के मोक्ष दिलाने वाली उपासनाओं का विधान, इस प्रकरण
में किया है ।
मणिप्रदीपप्रभयो र्मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ॥२॥
जो मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ता
है और जो दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने
दौड़ पड़ा है, यद्यपि उन दोनों ही को मिथ्याज्ञान तो समान ही
है, तो भी प्रयोजनसिद्धि में विषमता [फ़र्क] पायी जाती है।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७
मणिप्रभा को मणि समझ कर उठाने दौड़ा है, उस का काम सिद्ध
होजाता है—उसको मणि मिल जाती है । दूसरे को मणि नहीं
मिलती । प्रयोजनसिद्धि में यह विषमता पायी जाती है।]
दीपोऽपवरकस्यान्तर्वर्तते तत्प्रभा बहिः ।
दृश्यते द्वार्यथान्‍यत्र तद्वद् दृष्टा मणिप्रभा ॥३॥
किसी एक मकान में कोई दीपक रक्खा है उसकी प्रभा
किसी तंग झरोके में को निकल कर बाहर रत्न सी दीखती है ।
किसी दूसरे मकान में कोई रत्न रक्खा है, उसकी प्रभा भी किसी
झरोके में को होकर बाहर रत्न सी ही दीखती है ।
दूरे प्रभाद्वयं दृष्ट्वा मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
प्रभायां मणिबुद्धिस्तु मिथ्याज्ञानं द्वयोरपि ॥४॥
वैसी दो प्रभाओं को दूर से देखकर ‘यह मणि है’ ‘यह मणि
है’ यह समझ कर दो पुरुष उठाने दौड़ते हैं। उन दोनों ने जो
कि प्रभा को मणि समझा है उन दोनों की ही समझ भ्रम है।
न लभ्यते मणि र्दीपप्रभां प्रत्यभिधावता ।
प्रभायां धावतावश्यं लभ्येतैव मणिर्मणेः ॥५॥
यद्यपि दीपक की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ने वाले
पुरुष को मणि नहीं मिलती, परन्तु मणि की प्रभा को मणि
समझ कर दौड़ने वाला तो मणि को पा ही लेता है ।
दीपप्रभामणिभ्रान्ति र्विसंवादिभ्रमः स्मृतः ।
मणिप्रभामणिभ्रान्तिः संवादिभ्रम उच्यते ॥६॥
दीपक की प्रभा में जो मणि की भ्रान्ति है, उसे ‘विसं-
वादिभ्रम’ किंवा ‘विफलभ्रम’ कहा गया है [ क्योंकि उससे
मणि का लाभ नहीं होता ] जो तो मणि की प्रभा में मणि

३५८ पञ्चदशी

की भ्रान्ति है, उसको 'संवादिभ्रम' किंवा 'सफलभ्रम' कहते
हैं [क्योंकि उस भ्रमसे मणि का लाभ हो ही जाता है]
बाष्पं धूमतया बुद्ध्वा तत्राङ्गारानुमानतः ।
वह्निर्यदृच्छया लब्धः स संवादिभ्रमो मतः ॥७॥
किसी ने किसी देशमें वाष्प [भाप] को देखा उसे धूम
समझ कर उस देश में अंगारों का अनुमान किया और वहां से
अग्नि को लेने चल पड़ा। अब यदि दैवगति से उसे वहां अग्नि
मिलजाय तो उसका वाष्प को धूम समझना 'सफलभ्रम'
माना गया है।
गोदावर्युदके गङ्गोदकं मत्वा विशुद्धये ।
संप्रोक्ष्य शुद्धि माप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥८॥
गोदावरी और गंगा का जल दोनों ही शुद्धि कारक माने
जाते हैं। जो तो गोदावरी के जल को गंगा जल समझ कर
उससे शुद्ध होने के लिये प्रोक्षण करता है, वह भी शुद्ध हो
जाता है। गोदावरी के जल को गंगाजल समझना भ्रम तो
है, परन्तु इसे 'संवादिभ्रम' कहते हैं।
ज्वरेणार्त्तः सन्निपातं भ्रान्त्या नारायणं स्मरन् ।
मृतः स्वर्गमवाप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥९॥
ज्वर से जिसे सन्निपात होगया हो, सन्निपात के पागल-
पन में यदि वह नारायण का स्मरण भ्रम से भी करने लगे,
तो वह मर कर स्वर्ग को जाता है। यह भी संवादिभ्रम ही है।
प्रत्यक्षस्यानुमानस्य तथा शास्त्रस्य गोचरे।
उक्तन्यायेन सवादिभ्रमाः सन्ति हि कोटिशः ॥१०॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९
प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्रों में उक्त प्रकार के अनन्त
'संवादिभ्रम' पाये जाते हैं ।
अन्यथा मृत्तिकादारुशिलाः स्युर्देवताः कथम् ।
अग्नित्वादिधियोपास्याः कथं वा योषिदादयः ॥११॥
यदि संवादिभ्रम कोई चीज़ न हो तो, मिट्टी लकड़ी और
पत्थर की प्रतिमायें देवता कैसे हो जांय ? ये तो संवादिभ्रम
को मान करही फलसिद्धि के लिये देवता भाव से पूजी जाती
हैं। यदि संवादिभ्रम न हो तो स्त्री आदि को अग्नि आदि
समझकर उपासना का विधान क्यों किया जाय ? 'मनोब्रह्मे-
त्युपासीत (छा० ३-१८-१) आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छा० ३-१९-१)
इत्यादि की भी यही गति है। ये भी सब संवादिभ्रम ही हैं]
अयथावस्तुविज्ञानात् फलं लभ्यत ईप्सितम् ।
काकतालीयतः सोऽयं संवादिभ्रम उच्यते ॥१२॥
वस्तु को उलटा समझ कर भी जब किसी को काक-
तालीयन्याय किंवा दैवगति से अभिलषित फल मिल जाता है
तब यही 'संवादिभ्रम' कहाता है ।
स्वयंभ्रमोपि संवादी यथा सम्यक् फलप्रदः ।
ब्रह्मतत्त्वोपासनापि तथा मुक्तिफलप्रदा ॥१३॥
संवादी भ्रम यद्यपि स्वयं भ्रम ही है, तौ भी जैसे वह ठीक
फलदायी हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना भी
यद्यपि अयथावस्तुविषयक ( यथार्थ वस्तु को विषय न करने
वाली किंवा यथार्थ वस्तु तक न पहुँचनेवाली ) होती है तौ भी
मुक्तिरूपी फल को तो दे ही जाती है ।

१६० पञ्चदशी

वेदान्तेभ्यो ब्रह्मतत्व मखण्डैकरसात्मकम् ।
परोक्षमवगम्यैतदहमस्मीत्युपासते ॥१४॥
वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एकरसात्मक ब्रह्मतत्व को परोक्ष
रूप से जब जान लेते हैं तब उसके बाद उस ब्रह्म को 'अहं
ब्रह्मास्मि' (बृ० १-३-१०) मैं ब्रह्म हूँ इस रूप में उपासना करने
लगते हैं। [शास्त्र से परोक्ष रूप से जान लिया हुआ ब्रह्म उपा-
सना का विषय होता है।]
प्रत्यग्व्यक्तिमनुल्लिख्य शास्त्राद् विष्ण्वादिमूर्तिवत् ।
अस्ति ब्रह्मेति सामान्यज्ञानमत्र परोक्षधीः ॥१५॥
विष्णु आदि की मूर्ति को बताने वाले शास्त्र के कहने से
जैसे मूर्ति का परोक्ष ज्ञान हो जाता है, उसी तरह प्रत्यक्षरूप से
आत्मा को विषय न भी करके जब वेदान्त के कहने से केवल
इतना सामान्य ज्ञान हो जाता है कि 'ब्रह्म है' तब यही ज्ञान इस
उपासना में 'परोक्षज्ञान' कहाता है।
चतुर्भुजाद्यवगतावपि मूर्ति मनुल्लिखन् ।
अक्षैः परोक्षज्ञान्येव न तदा विष्णुमीक्षते ॥१६॥
शास्त्र से तो विष्णु को चतुर्भुज आदि जान लिया जाता है,
परन्तु भावना के प्रताप से जब तक वह मूर्ति इन्द्रियों से दीख
नहीं पड़ती, तब तक पुरुष परोक्ष ज्ञानी ही रहता है। क्योंकि
उपासना के समय वह साधक अपने उपास्य विष्णु को नहीं
देखता।
परोक्षत्वापराधेन भवेन्नातत्त्ववेदनम् ।
प्रमाणेनैव शास्त्रेण सत्वमूर्तेर्विभासनात् ॥१७॥
परोक्षता रूपी कमी से ही कोई ज्ञान मिथ्याज्ञान नहीं हो

जाता है [मिथ्याज्ञान तो वह तभी होता है जब कि उस ज्ञान
का विषय असत्य हो] यहाँ तो प्रमाण भूत शास्त्र के द्वारा ही
विष्णु आदि की मूर्ति का ज्ञान हमें मिलता है [फिर उसे
अतत्वज्ञान कैसे कह दें ?]
सच्चिदानन्दरूपस्य शास्त्राद् भानेऽप्यनुल्लिखन्।
प्रत्यञ्चं साक्षिणं तत्तु ब्रह्म साक्षान्न वीक्षते ॥१८॥
शास्त्र से सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म का भान हो जाने पर
भी, जब तक कोई उस ब्रह्म को प्रत्यगात्मरूप से [साक्षिरूप से]
नहीं जान लेता है, तबतक कहा जाता है कि वह ब्रह्म को
साक्षात् नहीं देख रहा है ।
शास्त्रोक्तेनैव मार्गेण सच्चिदानन्दनिश्चयात् ।
परोक्षमपि तज्ज्ञानं तत्वज्ञानं न तु भ्रमः ॥१९॥
वह ज्ञान यद्यपि परोक्ष ही होता है परन्तु शास्त्रोक्त रीति
से ही ब्रह्म के सच्चिदानन्द रूपका निश्चय करा देने के कारण
उसे तत्वज्ञान ही मानना चाहिये। वह ज्ञान भ्रम ज्ञान नहीं है।
ब्रह्म यद्यपि शास्त्रेषु प्रत्यक्त्वेनैव वर्णितम् ।
महावाक्यैस्तथाप्येतद् दुर्बोधमविचारिणः ॥२०॥
वेदान्तों [के महावाक्यों] ने तो ब्रह्म को प्रत्यगात्मा ही कहा
है परन्तु जिस अविचारी [पुरुष ने अन्वयव्यतिरेक से तत् त्वं
पदार्थों का विवेक नहीं किया है उस] के लिये यह बात
अत्यन्त ही दुर्बोध होती है [इसी कारण कहते हैं कि केवल
वाक्य से प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु विचार
सहित वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है ]

३६२ पंचदशी
देहाद्यात्मत्वविभ्रान्तौ जाग्रत्यां न हठात् पुमान्।
ब्रह्मात्मत्वेन विज्ञातुं क्षमते मन्दधीत्वतः ॥२१॥
देहादि को आत्मा समझने का भ्रम जब तक किसी को
बना हुआ है, तब तक कोई भी पुरुष मन्द बुद्धि होने के
कारण, ब्रह्म को आत्मा जान ही नहीं सकता [ ब्रह्मज्ञान का
विरोधी जो देहादियों में आत्मता का भ्रम बना हुआ है उस
भ्रम को विचार ही हटा सकता है—उस भ्रम को हटाने के
लिये केवल विचार की ही आवश्यकता है]
ब्रह्ममात्रं सुविज्ञेयं श्रद्धालुः शास्त्रदर्शिनः ।
अपरोक्षद्वैतबुद्धिः परोक्षाद्वैतबुद्ध्यनुद् ॥२२॥
जो श्रद्धालु हैं, जो शास्त्रदर्शी हैं, उसको ब्रह्म का परोक्ष
ज्ञान होजाना तो बड़ा ही सुकर है। क्योंकि अपरोक्षद्वैत बुद्धि
परोक्ष अद्वैत बुद्धि को नष्ट करती ही नहीं।
अपरोक्षशिलाबुद्धिर्न परोक्षेशतां नुदेत् ।
प्रतिमादिषु विष्णुत्वे को वा विप्रतिपद्यते ॥२३॥
लोक में भी देखलो, पत्थर की प्रतिमा में जो प्रत्यक्ष शिला
बुद्धि होती है, वह उसके परोक्ष ईश्वरपने को हटा नहीं
देती। प्रतिमा आदि को विष्णु मानते हुए किसी को दुविधा
नहीं होती।
अश्रद्धालो रविश्वासो नोदाहरणमर्हति ।
श्रद्धालुारेव सर्वत्र वैदिकेष्वधिकारतः ॥२४॥
इस मामले में अश्रद्धालु लोगों के अविश्वास का उदा-
हरण देना ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक कामों में सब जगह
श्रद्धालु ही अधिकारी होता है।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३
सकृदाप्तोपदेशेन परोक्षज्ञान मुद्भवत् ।
विष्णुमूर्त्युपदेशो हि न मीमांसामपेक्षते ॥२५॥
आप्त पुरुष के एक बार के उपदेश से ही परोक्ष ज्ञान हो जाता
है। लोक में भी देखलो कि विष्णुमूर्तिका उपदेश बहस और
तर्क की अपेक्षा नहीं करता [जिसको उससे ज्ञान होना होता
है उस पहली बार के उपदेश से ही हो जाता है । ]
कर्मोपास्ती विचार्येते अनुष्ठेयाविनिर्णयात् ।
बहुशाखाविप्रकीर्णं निर्णोतुं कः प्रभुर्नरः ॥२६॥
अनुष्ठान करने योग्य कर्म तथा उपासनाओं में सन्देह
हो सकता है, इससे उनका विचार किया जाता है। क्योंकि
अनेक शाखाओं में जहां तहां प्रतिपादित किये हुए कर्म को
कोई भी पुरुष सहसा निर्णय नहीं कर सकता ।
निर्णीतोऽर्थः कल्पसूत्रै ग्रथित स्तावतास्तिकः ।
विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठातुमञ्जसा ॥२७॥
जैमिनि आदि पूर्वाचार्यों ने जिस अर्थ का निश्चय कर
दिया है, उसी अर्थ [कर्म पद्धति] को कल्प सूत्रों ने संग्रह कर
लिया है। आस्तिक पुरुष तो बस इतने ही से सन्तुष्ट हो जाता
है और विचार किये बिना भी कर्म को भले प्रकार कर
सकता है ।
उपास्तीनामनुष्ठानमार्षग्रन्थेषु वर्णितम् ।
विचाराक्षममर्त्याश्च तच्छ्रुत्वोपासते गुरोः ॥२८॥
उपासनाओं की रीति भी आर्ष ग्रन्थों में कही गयी है ।
जो पुरुष स्वयं विचार नहीं कर सकते, वे कल्पों में कही हुई
उपासनाओं को गुरुमुख से सुनकर करने लगते हैं ।