पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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तो हम कहेंगे कि तब तो स्वर्ग का ज्ञान भी भ्रम ही होगा।
क्योंकि 'यह स्वर्ग है' ऐसा ज्ञान किसी को नहीं होता। किन्तु
सब सामान्यतया इतना ही तो जानते हैं कि 'स्वर्ग नाम का
कोई लोकविशेष है।'
अपरोक्षत्वयोग्यस्य न परोक्षमत्ति भ्रमः ।
परोक्षमित्यनुल्लेखादर्थात् पारोक्ष्यसंभवात् ॥५४॥
जो वस्तु प्रत्यक्ष होनी चाहिये, उसको यदि पहले केवल
परोक्षरूप से ही जान लिया जाय तो वह भ्रम नहीं होता है।
क्योंकि 'ब्रह्म परोक्ष है' ऐसा ज्ञान तो हम किसी को कराते ही
नहीं। वह ब्रह्म तो [हम लोगों की बे समझी से] अर्थात् ही
परोक्ष हो गया है। ['वह ब्रह्म है' ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान जब किसी
को नहीं हो पाता, तब वह अर्थात् यह मान बैठता है कि ब्रह्म
तत्व परोक्ष है। हां 'ब्रह्म परोक्ष है' ऐसा ज्ञान यदि किसी को
हो जाता हो तो वह अवश्य ही भ्रान्त ज्ञान कहायगा]
अंशागृहीते भ्रान्तिश्चेद् घटज्ञानं भ्रमो भवेत् ।
निरंशस्यापि सांशत्वं व्यावृत्यांशविभेदतः ॥५५॥
[परोक्षज्ञान में ब्रह्मभाग को तो ग्रहण कर लिया जाता है किंतु
उसका जो प्रत्यग् भाग है—उसमें जो मैं पन या हमारा हिस्सा है—
उसको ग्रहण नहीं किया जाता यों] अंश का अग्रहण होने से ही
यदि उस परोक्षज्ञान को भ्रम माना जाय, तब तो घटादि का ज्ञान
भी भ्रम ही हो जायगा [क्योंकि घट के अन्दर के अवयवों का
भी तो ग्रहण किसी को नहीं होता है, वहाँ भी तो अंश का अग्रहण
रहता ही है] यदि पूछो निरंश ब्रह्म को अंश वाला कैसे कहते हो ?
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हम कहेंगे कि-व्यावर्त्य अंशरूपी उपाधि के भिन्न होने से निरंश
(निरवयव) भी सांश (सावयव) मान लिया जाता है।
असत्वांशो निवर्तेत परोक्षज्ञानतस्तथा ।
अभानांशनिवृत्तिः स्यादपरोक्षधिया कृता ॥५६॥
उन व्यावर्त्य दो अंशों में से एक 'असत्त्वांश' की निवृत्ति
तो परोक्षज्ञान से हो जाती है तथा दूसरे 'अभानांश की निवृत्ति
अपरोक्षज्ञान कर देता है।
दशमोस्तीति विश्रान्तं परोक्षज्ञान मीक्ष्यते ।
ब्रह्मास्तीत्यपि तद्वत्स्यादज्ञानावरणं समम् ॥५७॥
आप्त का वाक्य सुनने पर 'दसवां है' ऐसा विश्रान्त अर्थात्
अभ्रान्त परोक्षज्ञान लोक में देखते हैं। इसी प्रकार [शास्त्र या
गुरु के कहने से] जोकि 'ब्रह्म है' ऐसा एक परोक्षज्ञान उत्पन्न
होता है वह भी अभ्रान्त ही है। क्योंकि अज्ञान के कारण
असत्वावरण तो दोनों में समान ही था [ब्रह्म और दसवां दोनों
ही नास्ति (नहीं हैं) समझ लिये गये थे। ऐसी अवस्था में
जिसको प्रत्यक्ष ग्रहण किया जा सकता हो, इसको यदि परोक्ष
रूप से जान लिया जाय तो वह ज्ञान भ्रमज्ञान नहीं होता।
यही बात इस श्लोक में दर्शायी गयी है।]
आत्मा ब्रह्मेति वाक्यार्थे निःशेषेण विचारिते ।
व्यक्तिरुल्लिख्यते यद्वद् दशमस्त्वमसीत्यतः ॥५८॥
'अयमात्मा ब्रह्म' बृ० २-५-१९ इस महावाक्य के अर्थ का
विचार जब भले प्रकार किया जाता है तब पहले जिस ब्रह्म
को परोक्षरूप से जाना जा चुका था, उसी ब्रह्म स्वरूप का
पीछे से साक्षात्कार हो जाता है। जैसे कि 'दसवां तू ही है'
इस वाक्य से अपने में दशमत्व का साक्षात्कार हो गया था।
[भाव यह है कि—केवल वाक्यश्रवण से तो परोक्षज्ञान ही
हुआ करता है। परन्तु जब उस परोक्षज्ञान के साथ विचार
भी मिल जाता है और विचार तथा अनुभव दोनों एक ही
बात कहने लगते हैं, तब साक्षात्कार किंवा अपरोक्षज्ञान
हो जाता है।]
दशमः क इति प्रश्ने त्वमेवेति निराकृते ।
गणयित्वा स्वेन सह स्वमेव दशमं स्मरेत् ॥५९॥
[जिस दसवें के होने को तुम कह रहे हो कि 'दसवां है']
वह दसवां कौन सा है ? वह प्रश्न जब किया जाता है और
जब कि उसका उत्तर यह दिया जाता है, कि 'दसवें तुम्ही हो'
तब वह अपने साथ शेष नौ को गिन कर पीछे से अपने को
ही दसवां मान लेता है [कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ। यों
यह देख लो कि विचार सहित वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न
हो जाता है]।
दशमोसीति वाक्योत्था न धीरस्य विहन्यते ।
आदिमध्यावसानेषु न नवस्वस्य संशयः ॥६०॥
इस दसवें पुरुष को 'तू ही दसवां है' इस वाक्य से जो
अपने दशवेंपन का ज्ञान उत्पन्न.हो जाता है कि 'मैं ही दसवां
हूँ' उस बुद्धि का फिर कभी विघात नहीं होता [किसी ज्ञान से
उस बुद्धि की बाधा नहीं होती]। फिर तो उसे उन नौ के
आदि, मध्य या अवसान में कहीं भी गणना करने पर दसवें
के विषय में संशय कभी (जीवनपर्यन्त) नहीं होता कि 'मैं
दसवां हूँ या नहीं?
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है। उसको नौ के विषय में संशय नहीं था केवल दसवें का
संशय था वह भी अब जाता रहा ]
सदेवेत्यादिवाक्येन ब्रह्मसत्त्वं परोक्षतः ।
गृहीत्वा तत्वमस्यादिवाक्याद् व्यक्तिं समुल्लिखेत् ॥६१॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छा० ६-२-१) इत्यादि
वाक्यों को सुन कर साधक पहले तो ब्रह्म के होने का निश्चय
कर लेता है, [फिर जब उसके जीवरूप से प्रवेश को सुनता है
तब उसी के प्रत्यग्रूप होने की संभावना भी कर लेता है] उसके
पश्चात् जब 'तत्वमसि' आदि महावाक्य [ अनुभवी गुरु के
द्वारा] सुनाया जाता है तब अपने अद्वितीय ब्रह्मरूप आत्मा को
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में साक्षात् कर लेता है ।
आदिमध्यावसानेषु स्वस्य ब्रह्मत्वधीरियम् ।
नैव व्यभिचरेत् तस्मादापरोक्ष्यं प्रतिष्ठितम् ॥६२॥
यह आत्मा के ब्रह्मत्व की बुद्धि जब एक बार पैदा हो
जाती है, फिर पांचों कोशों के आदि या मध्य या अन्त में कहीं
भी आत्मा का व्यवहार करने पर भी, वह ब्रह्मत्व बुद्धि अन्यथा
नहीं होती । इस कारण इस बुद्धि को ही अपरोक्षज्ञान कहते हैं।
जन्मादिकारणत्वाख्यलक्षणेन भृगुः पुरा ।
पारोक्ष्येण गृहीत्वाथ विचाराद् व्यक्तिमैक्षत ॥६३॥
भृगु नाम के ऋषि ने 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन
जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म' तै० ३-१
इस वाक्य में कहे हुए लक्षणों से, कि वह जगत् के जन्म,
स्थिति और प्रलय का कारण है, ब्रह्म को पहले तो परोक्षरूप
से जाना, उसके पश्चात् जब उसने अन्नमयादि पांचों कोशों का