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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७

फिर वही चिदाभास घटादि की तरह ब्रह्म में स्फूर्ति रूपी अति-
शय को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
अप्रमेय मनादिं चेत्यत्र श्रुत्येदमीरितम् ।
मनसैवेदमाप्तव्यमिति धीव्याप्यता श्रुता ॥९५॥
ब्रह्म में वृत्ति की व्याप्ति तो है परन्तु फल की व्याप्ति ब्रह्म में
नहीं होती, यह बात हम अप्रामाणिक नहीं कहते हैं देखो कि-
निर्विकल्पमनन्तं च हेतुदृष्टान्तवर्जितं। अप्रमेयमनादिं च यज्ज्ञात्वा मुच्यते
बुधः ॥ अमृतबिन्दु उपनिषत् की इस श्रुति के अप्रमेय शब्द
का तात्पर्य यही है कि उसमें फल की व्याप्ति नहीं होती, और
यों वह अप्रमेय ही रह जाता है तथा मनसैवेदमाप्तव्यं नेहना-
नास्ति किंचन (कठ० २-४-११) इस श्रुति में ब्रह्म की वृत्ति-
व्याप्यता की बात सुनी गयी है ।
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति वाक्यतः ।
ब्रह्मात्मन्याक्ति मुल्लिख्य यो बोधः सोऽभिधीयते॥९६॥
[सत्यज्ञानादि स्वरूपवाले] ब्रह्म से अभिन्न आत्मा को जब
कोई अधिकारी विषय कर लेता है, उस समय जो बोध
किंवा अपरोक्ष ज्ञान उसे उत्पन्न हुआ करता है, उसी बोध का
वर्णन श्रुति के आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मि (बृ० ४-४-१२)
'आत्मा को यदि पहचान ले कि मैं तो ऐसा महान् तत्व हूँ'
इतने वाक्यखण्ड ने किया है ।
अस्तु बोधो ऽपरोक्षोत्र महावाक्यात् तथाप्यसौ ।
न दृढः श्रवणादीनामाचार्यैः पुनरीरणात् ॥९७॥
इस ब्रह्मात्मता के विषय में महावाक्यों से

२५८ पञ्चदशी
बार सुनकर विचार करने पर ] अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है
यह तो हम माने लेते हैं , परन्तु ऐसा बोध दृढ तो नहीं होता
क्योंकि श्रीमच्छङ्कराचार्य ने वाक्यार्थ ज्ञान के उत्पन्न हो जाने
के बाद भी श्रवण आदि की आवृत्ति करने को कहा है ।
[ वह उन्होंने ज्ञान की दृढता के ही लिये तो कहा है । इसी
से समझते हैं कि महावाक्य से हुआ अपरोक्ष ज्ञान टिकाऊ
नहीं होता ]
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थबोधो यावद् दृढीभवेत् ।
शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् ॥९८॥
आचार्य ने कहा है कि—जब तक किसी को अपने
ब्रह्मभाव का दृढ निश्चय न हो जाय, तब तक शमदमादि से
युक्त होकर, श्रवणादि का अभ्यास किया ही करे।
बाढं सन्ति ह्यदार्ढ्यस्य हेतवः श्रुत्यनेकता ।
असंभाव्यत्वमर्थस्य विपरीता च भावना ॥९९॥
जो कि शब्दप्रमाण से उत्पन्न हुआ ज्ञान दृढ नहीं होता,
उसका कारण एक तो श्रुतियों की अनेकता होती है [ कोई
श्रुति कुछ कहती है, दूसरी श्रुति कुछ और ही बता देती है ]
दूसरे अलौकिक होने के कारण अखण्डैकरस अद्वितीय ब्रह्म-
रूपी अर्थ की संभावना ही साधारण प्राणी के हृदय में नहीं
हो पाती। तीसरे विपरीत भावनाओं ने भी प्राणियों के हृदय
पर पूर्णाधिकार जमा रक्खा है, [ कर्तृत्व भोक्तृत्व के वृथा
अभिमान से प्राणियों को इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि
वे अपने ब्रह्मत्व का किंवा अपने असंग रूप का कभी विचार
भी कर सकें ] ।