सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९
उद्धार रूपी प्रयोजन सिद्ध होता दीख पड़ता हो तो तुम यह
बताओ कि वह मूढ [ जिस पर तुम कृपालु हुए हो ] जिज्ञासु
है या पराङ्मुख है ? [ उसे संसार से वैराग्य हो गया है या
वह अभी संसार में आसक्त हो रहा है ? ]
उपास्तिं कर्म वा ब्रूयाद् विमुखाय यथोचितम् ।
मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासुमात्मानन्देन बोधयेत् ॥४॥
यदि वह तत्वज्ञान से विमुख अर्थात् रागी है तो उसको
उसके राग के अनुकूल कर्म या उपासना का यथोचित उपदेश
कर देना चाहिए। [ यदि उस मूढ को ब्रह्मलोकादि की
कामना है तो उसे उपास्ति बता देनी चाहिए और यदि
वह स्वर्ग का मज़ा लूटना चाहता है तो उसे कर्म का मार्ग
बताना चाहिए] यदि तो वह मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु है तो उसे
आत्मानन्द से समझाना चाहिए । [ उसके सामने आत्मानन्द
की विवेचना करनी चाहिए और उसे अज्ञाननिद्रा से जगा
लेना चाहिए]
बोधयामास मैत्रेयीं याज्ञवल्क्यो निजप्रियाम् ।
न वा अरे पत्युरर्थे पतिः प्रिय इतीरयन् ॥५॥
याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि ने मैत्रेयी नाम की अपनी पत्नी
को 'अरे पत्नी को पति के लिए पति प्रिय नहीं होता' इत्यादि
शब्दों से इसी आत्मानन्द की विवेचना करते करते आत्म बोध
करा दिया था ।
पतिर्जाया पुत्रवित्ते पशुब्राह्मणबाहुजाः ।
लोका देवा वेदभूते सर्वं चात्मार्थतः प्रियम् ॥६॥
पति, पत्नी, पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव,

[Header]
४७० पञ्चदशी
[Decorative divider]

वेद तथा भूत, ये सभी कुछ भोक्ता आत्मा के लिए होने से ही
प्यारे हो जाते हैं [इन में से एक भी पदार्थ स्वरूप से प्यारा
नहीं होता]
पत्याविच्छा यदा पत्न्यास्तदा प्रीतिं करोति सा ।
क्षुदनुष्ठानरोगाद्यै स्तदा नेच्छति तत्पतिः ॥७॥
जब पत्नी को पति की इच्छा होती है, तभी वह पति से
प्रेम करती है। परन्तु उसका पति भूख में, किसी अनुष्ठान में
या किसी रोगादि में, फंसा होता है, तो वह उस पत्नी को नहीं
चाहता [इस कथन से यह समझलो कि पत्नी का प्रेम इकतरफ़ा
प्रेम है। यह प्रेम अकेली पत्नी का ही स्वार्थ है]
न पत्युरर्थे सा प्रीतिः स्वार्थ एव करोति ताम् ।
पतिश्चात्मन एवार्थे न जायार्थे कदाचन ॥८॥
पत्नी का वह प्रेम पति के लिए नहीं होता। किन्तु वह पत्नी
उस प्रेम को तो अपने लिए ही करती है। उधर पति की भी
यही अवस्था है। वह भी अपने मतलब से ही पत्नी से प्रेम
किया करता है। वह भी पत्नी के लिए पत्नी से प्रेम कभी
नहीं करता।
अन्योन्यप्रेरणेप्येवं स्वेच्छयैव प्रवर्तनम् ॥६॥
जब तो दोनों की इच्छा से दोनों एक साथ ही प्रवृत्त होते
हैं [तब भी प्रीति को उभयार्थ न मानना चाहिए क्योंकि] तब
भी तो वे दोनों [इसी प्रकार अपनी अपनी कामना को पूरा
करने की] अपनी अपनी इच्छा से ही प्रवृत्त हुआ करते हैं।
[पत्नी अपनी इच्छा से पति को प्रेरणा करती है और पति
अपनी इच्छा से पत्नी को प्रेरणा किया करता है।]