पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
तो जल का गुण है। उस शैत्य से तो जल के होने का अनु-
मान भर हुआ करता है।
यावद्यावदहङ्कारो विस्मृतोऽभ्यासयोगतः ।
तावत्तावत्सूक्ष्मदृष्टे र्निजानन्दोऽनुमीयते ॥९८॥
[प्रकृत बात तो यह हुई कि] निरोध समाधि के अभ्यास
से जितना जितना अहंकार का विस्मरण होता जायगा—अहम्
आदि वृत्तियें विलीन होती जायंगी और योगी के चित्त में
सूक्ष्मता आती जायगी] उतना ही उतना निजानन्द अनुभव में
आने लगेगा अथवा उतना ही उतना निजानन्द व्यक्त होने
लगेगा ऐसा अनुमान से जाना जाता है।
अनुमान यों करना चाहिए—जिन क्षणों में हम अहंकार
का संकोच करने बैठते हैं, उनमें पिछले पिछले क्षणों में, पहले
पहले क्षणों से अधिक आत्मानन्द आविर्भूत होता जाता है।
क्योंकि अहंकार का संकोच करने वाले क्षणों की लम्बाई उत्त-
रोत्तर बढ़ती ही जाती है। अहंकार के विस्तार ने आत्मानन्द
को ढक रक्खा था। अब अहंकार का संकोच होने से वह
निजानन्द उघड़ने लगता है—फैलने लग पड़ता है। तात्पर्य यह
है कि—जैसे जैसे अहंकार का संकोच बढ़ने लगेगा तैसे तैसे
निजानन्द भी बढ़ता ही जायगा।
सर्वात्मना विस्मृतः सन् सूक्ष्मतां परमां व्रजेत् ।
अलीनत्वान्न निद्रैषा ततो देहोऽपि नो पतेत् ॥९९॥
जब अहंकार का विस्मरण पूर्णरूप से हो जाता है तब यह
परम सूक्ष्म हो जाता है [सब वृत्तियों के विलीन हो जाने पर
भी] अन्तःकरण का स्वरूप विलीन नहीं होता इसलिए उसे
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निद्रा नहीं कह सकते [निद्रा तो वही है जब कि बुद्धि कारण
रूप में पहुँच गई हो] अन्तःकरण के स्वरूप का विलय न होने
से ही योगी का देह निद्रा की तरह गिर नहीं पड़ता [इससे
समझ लेना चाहिए कि अन्तःकरण का स्वरूप अभी विलीन
नहीं हुआ है।]
न द्वैतं भासते नापि निद्रा तत्रास्ति यत् सुखम् ।
स 'ब्रह्मानन्द' इत्याह भगवानर्जुनं प्रति ॥१००॥
गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा
है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय, और नींद भी
न आय, उस समय जो सुख किसी को भासता हो, बस वही
'ब्रह्मानन्द' है।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१०१॥
गीता के ब्रह्मानन्दबोधक वे श्लोक ये हैं—धीर बुद्धि के
सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना करो। जब मन
को आत्मसंस्थ कर चुको [जब मन को यह निश्चय करा चुको
कि यह सब कुछ आत्मा ही है 'आत्मा से भिन्न यह कुछ भी
नहीं है'] तब बस फिर कुछ भी न सोचो। [यह तो योग की
अन्तिम हालत है।]
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥१०२॥
[ऐसी ऊँची अवस्था को जो योगी लाना चाहें वह पहले
यह करें कि] जो मन [स्वभाव दोष से ही] चंचल है, जो अस्थिर
है [जो एक विषय में बंध कर कभी नहीं रहता] ऐसा मन जिस