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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५
[ इसी से जानते हैं कि उस ने ब्रह्मानंद को भोगा था और अब
भी उसके संस्कारों से वह सुखी हो रहा है ]
कर्मभिः प्रेरितः पश्चान्नानादुःखानि भावयन् ।
शनै र्विस्मरति ब्रह्मानन्दमेषोऽखिलो जनः ॥७५॥
[फिर सदा मौन होकर ही क्यों नहीं बैठा रहता इसका
कारण भी सुन लो] पूर्वोक्त कर्मों से प्रेरित हुए सभी प्राणी पीछे
से जब संसार के नाना दुःखों की भावना करने लगते हैं तब
फिर ये सभी प्राणी धीरे धीरे [हाय ! हाय ! उस जगज्जीवन]
ब्रह्मानन्द को भूल जाते हैं ।
प्रागूर्ध्वमपि निद्रायाः पक्षपातो दिने दिने ।
ब्रह्मानन्दे नृणां, तेन प्राज्ञोऽस्मिन् विवदेत कः ॥७६॥
[ब्रह्मानन्द में संशय न करने का एक यह भी कारण है
कि] सभी मनुष्यों को नींद से पहले और नींद के पीछे ब्रह्मा-
नन्द में स्नेह बना रहता है [जभी तो निद्रा के आदि में कोमल
शय्या आदि का संपादन करते हैं। निद्रा समाप्त हो जाने पर
उस ब्रह्मानन्द को न छोड़ने के कारण चुप चाप बैठे रहते हैं]
ऐसी अवस्था में कौन समझदार होगा जो इस आनन्द में
विवाद करेगा ?
ननु तूष्णीं स्थितौ ब्रह्मानन्दश्चेद् भाति, लौकिकाः।
अलसाश्चरितार्थाः स्युः, शास्त्रेण गुरुणात्र किम् ॥७७॥
जो ब्रह्मानन्दानुभव गुरुशुश्रूषा आदि प्रयासों से मिला
करता है वह अगर चुप रहने मात्र से किसी को मिल सकता
हो तब तो लौकिक पामर लोग तथा आलस में पड़े रहने वाले

४४६ पञ्चदशी
अहदी लोग सभी कृतार्थ हो जाने चाहिये । फिर श्रवणादि
परिश्रम की क्या आवश्यकता रह जायगी ?
बाढं, ब्रह्मेति विद्युश्चेत् कृतार्था स्तावतैव ते ।
गुरुशास्त्रे विनात्यन्तं गम्भीरं ब्रह्म वेत्ति कः ॥७८॥
‘यह ब्रह्मानन्द है’ ऐसा यदि कोई उनमें से पहचान जाय
तो वह अवश्य ही कृतार्थ हो कर रहे । परन्तु गुरु और शास्त्र
के बिना [मन वाणी से अगम्य सर्वज्ञ सर्वान्तर सर्वात्मरूप]
उस गम्भीर ब्रह्म को और किस उपाय से कौन जान सकता
है ? [अर्थात् गुरु और शास्त्र के बिना इस तत्व का पता नहीं
चलता]
जानाम्यहं त्वदुक्त्याद्य कुतो मे न कृतार्थता ।
शृण्वत्र त्वादृशो वृत्तं प्राज्ञंमन्यस्य कस्यचित् ॥७९॥
यदि यह पूछा जाय कि—तुम्हारे कहने से मैं ब्रह्मानन्द
को जान तो गया हूँ परन्तु मैं कृतार्थ क्यों नहीं हो पाया हूँ ?
इसके उत्तर में अपने जैसे किसी प्राज्ञाभिमानी का वृत्तान्त सुन
लीजिये ।
चतुर्वेदविदे देयमिति शृण्वन्नवोचत ।
वेदाश्चत्वार इत्येवं वेद्मि मे दीयतां धनम् ॥८०॥
किसी तुम्हारे जैसे ने यह सुना था कि—चतुर्वेदज्ञ को
यह बहुत सा धन दे दो । बस इस बात को सुन कर वह कह
उठा कि वेद चार हैं यह तो मैं जानता ही हूँ और यों मैं चतु-
र्वेदज्ञ हो गया हूँ, इस कारण यह धन मुझे ही दे दो [ इसी
तरह तुम भी कहते हो कि मैं ब्रह्मज्ञ हो गया हूँ मैं कृतार्थ क्यों
नहीं हुआ ?]