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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७
है। क्यों कि तब तक तो द्वैत की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी। इस
कारण प्रथम पक्ष ही शेष रह जाता है अर्थात् द्वैत की उत्पत्ति
से प्रथम अद्वैत ही था।
अद्वैतसिद्धिर्युक्त्यैव नानुभूत्येति चेद्वद।
निर्दृष्टान्ता सदृष्टान्ता वा कोट्यन्तर मत्र नो ॥२७॥
यदि कहो कि अद्वैत की सिद्धि युक्ति से तो हो जाती है,
परन्तु अनुभव से तो अद्वैत का अनुमोदन नहीं होता। तो
बताओ कि जो युक्ति अद्वैत को सिद्ध करती है वह किसी
दृष्टान्त को न देकर सिद्ध करती है, या दृष्टान्त को देकर सिद्ध
करती है ? इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त तीसरी बात तो
हो ही नहीं सकती।
नानुभूति र्न दृष्टान्त इति युक्तिस्तु शोभते।
सदृष्टान्तत्वपक्षे तु दृष्टान्तं वद मे मतम् ॥२८॥
[जो (इसी प्रकरण के २७श्लोक में) कहता है कि अद्वैत की
सिद्धि युक्ति से ही होती है, अनुभव से अद्वैत की सिद्धि नहीं
होती वह अनुभूति का तो निषेध ही कर रहा है, और दृष्टान्त
के बिना युक्ति कुछ सिद्ध नहीं कर सकती। फिर यह कहना कि]
बिना ही दृष्टान्त के अद्वैत सिद्धि हो जाती है आपके ही मुंह
को शोभा देने वाली बात है [विवेचक लोग तो ऐसी बात को
मान ही नहीं सकते कि बिना दृष्टान्त के भी कोई बात युक्ति से
सिद्ध हो जाती हो] अब केवल सदृष्टान्तत्व पक्ष शेष रह जाता
है [कि दृष्टान्त देकर ही युक्ति किसी अर्थ को सिद्ध किया करती
है] उसमें आपको ऐसा दृष्टान्त देना चाहिये जो हम दोनों
वादियों को सम्मत हो।

४२८ पञ्चदशी
अद्वैतः प्रलयो द्वैतानुपलम्भेन सुप्तिवत् ।
इति चेत् सुप्तिरद्वैतेत्यत्र दृष्टान्तमीरय ॥२९॥
[पूर्ववादी कहता है कि अच्छा लो दृष्टान्त भी सुन लो]
प्रलय तो एक प्रकार का अद्वैत [अर्थात् द्वैत रहित अवस्था]
है। क्योंकि उस समय द्वैत की उपलब्धि नहीं होती। जिस
जिस में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती वह वह सभी अद्वैत होता
है जैसे कि सुप्ति। इस पर हमारा कहना है कि सुप्ति अद्वैत
होती है इस बात को सिद्ध करने के लिये भी तुम्हें अन्य दृष्टान्त
देना पड़ेगा। [यदि तुम अपनी सुप्ति का दृष्टान्त दोगे तो उसे कोई
जानता नहीं। वह तो दूसरे के प्रति असिद्ध है। इस कारण उसकी
सिद्धि के लिये कोई और दृष्टान्त तुम्हें टटोलना ही पड़ेगा।]
दृष्टान्तः परसुप्तिश्चेदहो ते कौशलं महत् ।
यः स्वसुप्तिं न वेत्स्यस्य परसुप्तौ तु का कथा ॥३०॥
यदि तुम दूसरे की सुप्ति का दृष्टान्त दो 'सुप्तिरद्वैता पर-
सुप्तिवत्' तब तो यह तुम्हारी बड़ी [भद्दी] चतुराई है [क्योंकि
अप्रसिद्ध होने के कारण परसुप्ति का तो तुम्हें दृष्टान्त ही नहीं
देना चाहिये] भला जो तुम अपनी सुप्ति को भी नहीं जानते
हो वह तुम दूसरे की सुप्ति की बातें क्यों करते हो [जिसे
अपनी सुप्ति का ज्ञान नहीं है उसे परसुप्ति का ज्ञान भी नहीं
हो सकता।]
निश्चेष्टत्वात् परः सुप्तो यथाहमिति चेत् तदा ।
उदाहर्तुः सुषुप्तेस्ते स्वप्रभत्वं भवेद् बलात् ॥३१॥
यदि अनुमान से परसुप्ति को सिद्ध करना चाहो कि-
परः सुप्तः निश्चेष्टत्वात् अहमिव दूसरा सोया पड़ा है क्योंकि