सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पंचकोशविवेक का संक्षेप १९

पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
इस पसारे का दीखना सवा सोलह आने इसके दीखने के अधीन
है। यों इस सारे जगत् का साक्षी जो ज्ञानरूप आत्मा है वह
शुद्ध अवस्था में तब ही दीख सकेगा जब कि इन पांचों कोशों का
परित्याग पूर्णतया कर दिया जायगा। अर्थात् इनको आत्मा
समझना छोड़ दिया जायगा। इन सब कोशों को चमकाने वाला
जो ज्ञान नाम का प्रकाश है, वही तो हमारा अपना स्वरूप है।
अविचारपूर्ण दृष्टि के रहते रहते ही दीख पड़नेवाले देहादियों
को जब अनात्मा समझ लिया जाता है, तब विचारक के सामने
आत्मतत्व स्वयमेव आ खड़ा होता है। उस समय उसको चाहो
'तो 'कुछ नहीं' कह दो या 'आत्मा' कह दो या कुछ भी मत कहो।
आत्मतत्व का वर्णन करने में अध्यात्मशास्त्र ने 'नेति नेति' की
निराली भाषा का उपयोग इसी भाव से किया है। सम्प्रदायवाले
इस प्रकरण में एक गाथा कहा करते हैं—किसी मेले में कोई स्त्री
पुरुष बिछड़ गये थे। राज-पुरुषों ने सारे मेले को घेरकर एक द्वार
में से निकाला और द्वार पर खड़ी की हुई स्त्री से पूछते गये कि
क्या यह तुम्हारा पुरुष है? वह सब का निषेध करती गयी 'कि
यह मेरा पुरुष नहीं है।' जब तो उसका पुरुष आया, तब वह
कुछ भी न बोली किन्तु चुपचाप खड़ी रह गयी। कुछ न बोल
कर ही उसने अपने पुरुष को राजपुरुषों को बता दिया। इसी
प्रकार जितना कुछ निषेध किया जा सकता है, उस सब ही का
निषेध कर देने पर, जो तत्व शेष रह जाता है, वही तो आत्मा
है। यही 'नेति नेति' का सरल भाव भी है। यों यह तत्व सत्य
पदार्थ है यह सिद्ध हो चुका। इसकी ज्ञानरूपता भी सिद्ध की
जा चुकी। यही तत्व अनन्त भी है—औरों का तो कहना ही
क्या है, सबसे तीव्र गति वाली कल्पना को भी यदि हजारों वर्ष

२०
पंचदशी


देश और काल के विस्तृत मैदान में दौड़ते जांय, फिर जहां हम
पहुँच सकेंगे, वहाँ भी और उससे आगे भी यह ज्ञान रहता है।
यों इसमें देश और काल की कोई मर्यादा ही नहीं है। यह ज्ञान
सर्वरूप भी है—पदार्थों को दिखाने वाला सूर्य का प्रकाश जैसे
पदार्थों के ही आकार का हो जाता है, या जैसे पदार्थों के अन्दर
रहनेवाले पांच भूत पदार्थों के ही आकार के हो जाते हैं, इसी
प्रकार यह ज्ञान भी सब पदार्थों के रूप का हो जाता है। यह तो
सब पदार्थों का आत्मा है क्योंकि यह उनके अन्दर बैठा बैठा सब
को दिखाता रहता है। यों यह तत्व प्रत्येक पहलू से अनन्त है।
यह एक ही तत्व कभी तो 'ईश्वर' हो जाता है और कभी 'जीव'
बन जाता है। जगत् की निर्माणशक्ति जब हमारे ध्यान में आती
है तब ईश्वर रूप में यही तत्व हमें याद आता है। जब पांचभौतिक
शरीर की ओर हमारा ध्यान जाता है तब यही तत्व हमें जीव मालूम
पड़ने लगता है। तात्पर्य यह है कि जो जो उपाधियां हमें दीखती हैं
उन सभी के साथ यह तत्व अठखेलियां करता रहता है—यह उन
सभी में रमा हुआ रहता है। जब हम न तो सृष्टि को देखें और न
शरीरों का ही ध्यान करें, तब तो केवल अनन्त व्यापक चेतना का
ही अखण्ड साम्राज्य हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। तब
योगी के अवाक् रह जाने की ऊँची से ऊँची अवस्था आती है।
ईश्वर और जीव दोनों ही तत्व अपनी अपनी उपाधि के कारण
से ही हैं। ये दोनों उपाधियुक्त चेतना हैं। जो महापुरुष इन
उपाधियुक्त चेतनाओं को छोड़कर निरुपाधि चेतना से आँख भिड़ा
देगा, जिस साधक का यह त्राटक कभी भी खण्डित नहीं होगा,
जो साधक बड़े बड़े साम्राज्यों को चलाता हुआ भी इस व्यापक
चेतना को नहीं भूलेगा, जिस महापुरुष के अन्तस्तल में यह बात