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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
लीना सुप्तौ वपुर्बोधे व्याप्नुयादानखाग्रगा ।
चिच्छायोपेतधीर्नात्मा विज्ञानमयशब्दभाक् ॥७॥
चिच्छाया से युक्त जो बुद्धि, सुषुप्तिकाल में लीन होजाती
है, तथा जागने पर नखाग्र तक शरीर को व्याप्त किये रहती
है, वह विज्ञानमय कहाने वाली बुद्धि भी तो आत्मा नहीं है
[बताओ कि विलय आदि अवस्थाओं में फंस जानेवाली बुद्धि
आत्मा कैसे हो ? ]
कर्तृत्वकरणत्वाभ्यां विक्रियेतान्तरिन्द्रियम् ।
विज्ञानमनसी अन्तर्बहिःस्थैते परस्परम् ॥८॥
[मनोमय तथा विज्ञानमय का भेद इस श्लोक में बताया जाता
हैं] अन्दर की इन्द्रिय जिसे मन भी कहते हैं, कभी तो कर्त्ता-
रूप से तथा कभी करणरूप से परिणत होती रहती है। जब
कर्त्तारूप से परिणत होती है तब उसको 'विज्ञानमय कोश'
कहते हैं। जब करणरूप से परिणत होती है तब उस को
'मनोमय कोश' कहा जाता है। ये दोनों आपस में अन्दर
बाहर रहा करते हैं [बुद्धि अन्दर रहती है, मन बाहर रहता
है, उसी से एक के ही दो कोश हो गये हैं।]
काचिदन्तर्मुखा वृत्तिरानन्दप्रतिविम्बभाक् ।
पुण्यभोगे, भोगशान्तौ निद्रारूपेण लीयते ॥९॥
जब हम किसी पुण्यकर्म के फल का अनुभव करते हैं,
तब कोई बुद्धिवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है और उस पर आनन्द
का प्रतिविम्ब पड़ जाता है, तथा भोगों के शान्त हो जाने पर
वही बुद्धिवृत्ति निद्रारूप से विलीन हो जाती है। [उस लीन
बुद्धिवृत्ति को ही 'आनन्दमय' कहा जाता है।]

७६ पंचदशी
कादाचित्कत्वतो नात्मा स्यादानान्दमयोऽप्ययम् ।
विम्बभूतो य आनन्द आत्मासौ सर्वदा स्थितेः॥१०॥
यह 'आनन्द' भी कादाचित्क[कभी कभी होने वाला=सदा
न रहने वाला] होने से [मेघ आदि कादाचित्क पदार्थों के
समान] आत्मा नहीं है। किन्तु बुद्धि आदि में प्रतिबिम्बित
होकर बैठे हुए आनन्दमय का बिम्बभूत अर्थात् कारणभूत जो
आनन्द है, वही तो सच्चा आत्मा है। क्योंकि वह सदा ही
बना रहता है [नित्य है]
ननु देहमुपक्रम्य निद्रानन्दान्तवस्तुषु ।
मा भूदात्मत्वमन्यस्तु न कश्चिदनुभूयते ॥११॥
अन्नमय देह से लेकर निद्रा तथा आनन्द पर्यन्त पदार्थों
में आत्मभाव नहीं है तो न सही, परन्तु इन के अतिरिक्त और
भी तो कोई वस्तु अनुभव में नहीं आती है [जिसे आत्मा
कहा जा सकता हो]।
बाढं, निद्रादयः सर्वेऽनुभूयन्ते न चेतरः ।
तथाप्येतेऽनुभूयन्ते येन तं को निवारयेत् ॥१२॥
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि—"निद्रानन्द से लेकर देह
पर्यन्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं और कुछ भी पदार्थ उपलब्ध नहीं
होता" तुम्हारा यह कहना तो बिलकुल ठीक है। परन्तु इन सब
पदार्थों का अनुभव जो करता है उस को कौन हटा सकता है।
[तात्पर्य यह है कि यह तो ठीक है कि इन के अतिरिक्त
और कोई उपलब्ध नहीं होता है परन्तु जिस अनुभव के बल
से इन सब आनन्दमयादि में उपलभ्यमानता आ गयी है उस
अनुभव की सत्ता का निषेध तुम कैसे कर सकते हो]