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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९३

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९३
दोनों पक्षों में समान है [ उपासक को भी तो अपनी ब्रह्मता
का निश्चय नहीं होता है इसी कारण उसकी ब्रह्मता अपुरुषार्थ
होती है ]। हां इतनी बात तो है कि भूखे रहने से जैसे भीख
मांगना श्रेष्ठ होता है, इसी प्रकार और सब बातों से ध्यान
[ उपासना ] अच्छा माना जाता है।
पामराणां व्यवहृते वरं कर्माद्यनुष्ठितिः ।
ततोऽपि सगुणोपास्ति र्निर्गुणोपासना ततः ॥१२१॥
पामर लोगों के व्यवहार से तो कर्मानुष्ठान ही श्रेष्ठ है,
उससे सगुणोपासना भली है। सगुणोपासना से भी निर्गुणो-
पासना का दर्जा ऊंचा होता है।
यावद् विज्ञानसामीप्यं तावच्छ्रैष्ठ्यं विवर्धते ।
ब्रह्मज्ञानायते साक्षान्निर्गुणोपासनं शनैः ॥१२२॥
ज्यों-ज्यों विज्ञान की समीपता आती जाती है, त्यों त्यों
श्रेष्ठता की मात्रा बढ़ने लगती है। [ निर्गुणोपासना के सर्व-
श्रेष्ठ होने का कारण यही है कि—] यह उपासना अन्त में धीरे
धीरे ब्रह्म ज्ञान के रूप में परिणत होजाती है ।
यथा संवादिविभ्रान्तिः फलकाले प्रमायते ।
विद्यायते तथोपास्ति र्मुक्तिकालेऽतिपाकतः ॥१२३॥
फल मिलने के समय में जैसे संवादिभ्रम प्रमाज्ञान हो
जाता है, इसी प्रकार अतिपक्व हो जाने के कारण, मुक्ति का
समय आ जाने पर 'उपासना' ही 'ब्रह्मविद्या' हो जाती है ।
संवादिभ्रमतः पुंसः प्रवृत्तस्यान्यमानतः ।
प्रमेति चेत् तथोपास्ति र्मान्तरे कारणायताम्॥१२४॥

३९४ पञ्चदशी
जो पुरुष संवादिभ्रम से किसी वस्तु को उठाने दौड़ा है,
उसे [उस भ्रम से प्रमाज्ञान नहीं होता किन्तु उसे] किसी दूसरे
प्रमाण से प्रमाज्ञान हो जाता है। ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे
कि इसी प्रकार उपासना भी स्वयं तो ब्रह्मज्ञान नहीं हो जाती।
किन्तु दूसरे ज्ञान का कारण बन जाती है। [अर्थात् निर्गुणोपा-
सना निदिध्यासन रूप होकर अपरोक्ष ज्ञान को उत्पन्न कर
देती है।]
मूर्तिध्यानस्य मन्त्रादेरपि कारणता यदि।
अस्तु नाम तथाप्यत्र प्रत्यासत्तिर्विशिष्यते ॥१२५॥
यदि कहो कि—यों तो [चित्त की एकाग्रता के सम्पादन
के द्वारा] मूर्ति का ध्यान या मन्त्रादि भी अपरोक्षज्ञान के
कारण होते हैं तो हम इस बात को स्वीकार करते हैं। परन्तु
इस निर्गुणोपासना में इतनी विशेषता है कि यह उपासना ज्ञान
के सबसे अधिक समीप होती है।
निर्गुणोपासनं पक्कं समाधिः स्याच्छनैस्ततः।
यः समाधिर्निरोधाख्यः सोऽनायासेन लभ्यते ॥१२६॥
[वह निर्गुणोपासना ज्ञान के समीप यों है कि] यह
निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब इसकी सविकल्प समाधि
हो जाती है। फिर उस सविकल्प समाधि की ही निर्विकल्प
समाधि बन जाती है। यह निरोध नाम की समाधि निर्गुणो-
पासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है।
निरोधलाभे पुंसोऽन्तरसङ्गं वस्तु शिष्यते।
पुनः पुनर्वासितेऽस्मिन् वाक्याज्जायेत तत्त्वधीः ॥१२७॥
निरोध का लाभ हो जाने पर किंवा निर्विकल्प समाधि हो