पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
उस माया ने, कूटस्थ असङ्ग आत्मा को बिगाड़ कर, उस
का जगत् बना दिया है। उसी ने चिदाभास स्वरूप से जीव
और ईश्वर का भी निर्माण किया है। [यही उस का अन्यथा-
करण कहाता है।]
कूटस्थ मनुपद्रुत्य करोति जगदादिकम्।
दुर्घटैकविधायिन्यां मायायां का चमत्कृतिः ॥१३४॥
इस माया की होशियारी तो देखो कि—यह माया कूटस्थ
में किसी प्रकार का उपद्रव भी नहीं करती है [उसको
जैसे का तैसा भी रहने देती है] और उसी से जगदादि को
भी बना डालती है। दुर्घट कामों को करने का वीड़ा उठाने
वाली इस माया में यह कोई चमत्कार की बात नहीं है [कि
कूटस्थता को भी बना रहने दे और उसको जगदादिस्वरूप भी
कर डाले। ऐसा न करे तो उसे माया ही कौन कहे?]
द्रवत्वमुदके वह्नावौष्ण्यं काठिन्यमश्मनि।
मायाया दुर्घटत्वं च स्वतः सिद्ध्यति नान्यतः ॥१३५॥
पानी में द्रवत्व, वह्नि में उष्णता, पत्थर में कठोरता, और
माया में दुर्घटपना स्वभाव से ही सिद्ध हो रहा है। [उसमें
यह दुर्घटता कहीं अन्यत्र से नहीं आयी है।]
न वेत्ति लोको यावत् तां साक्षात् तावच्चमत्कृतिम् ।
धत्ते मनसि, पश्चात्तु मायैषेत्युपशाम्यति ॥१३६॥
यह लोक जब तक उस माया का साक्षात्कार नहीं कर
लेता, तभी तक मन में आश्चर्य किया करता है। साक्षात्
कर लेने के पीछे तो 'यह माया है' ऐसा समझ कर शान्त हो
जाता है।
१६८ पञ्चदशी
प्रसरन्ति हि चोद्यानि जगद्वस्तुत्ववादिषु ।
न चोदनीयं मायायां तस्याश्चोद्यैकरूपतः ॥१३७॥
ये समस्त आक्षेप तो जगत् को सत्य मानने वाले नैयायिक
आदियों पर ही हो सकते हैं । मायावाद में ये आक्षेप नहीं
चलते । क्योंकि यह माया तो स्वयं ही आक्षेपस्वरूप है [ इस
माया का तो दुर्घटपना ही रूप माना जाता है । यदि यह किसी
तरह से घटमान हो जाय, यदि समझ में आजाय तो फिर यह
माया ही क्या रही ? जो बात बुद्धि को समझ न पड़े, जिस
में सब दोष आते हों वही माया है । ]
चोद्येऽपि यदि चोद्यं स्याच्चोद्ये चोद्यते मया ।
परिहार्यं ततश्चोद्यं न पुनः प्रतिचोद्यताम् ॥१३८॥
आक्षेप योग्य बात पर भी [ जिसका कोई उत्तर कभी
दिया ही नहीं जा सकता] यदि आक्षेप करते ही जाओगे तो
फिर विवश हो कर तुम्हारे उन सिद्धान्तों पर आक्षेप करने लगूँगा
[जिनका तुम पर कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं है, जिनको
तुम अनादि आदि बताकर अपना पीछा छुड़ाया करते हो । फिर
इसका परिणाम क्या होगा ] इस कारण किसी तरह इस चोद्य-
माया का परिहार करना चाहिये । इस माया पर आक्षेप करते
जाना ठीक नहीं है [भला जब तुम्हारे वस्त्र पर धब्बा पड़ गया
हो तब क्या ? क्यों ? कैसे ? और कब ? करना भला या कि
उसे छुड़ाने के उपाय सोचना भला ? ]
जिस कमी को मैं स्वयं मान रहा हूँ, जो कमी मुझ माया-
वादी का भूषण है, उसी पर अड़ कर बैठ जाने से मुझे तुम्हारे
सिद्धान्त के मर्मस्थल दिखा कर अपना पीछा छुड़ाना पड़ेगा ।
इस कारण मैं तो यही कहता हूँ कि किसी तरह इस माया से
अपना पिण्ड छुड़ा लो। इस पर बार बार आक्षेप करते जाना
ठीक नहीं है। इसी झगड़े में फँसे रहकर आत्महित में प्रतिबन्ध
डाल देना उचित नहीं है। विचार कर तो देख लो कि माया के
द्वारा जगद्रचना के जिस प्रश्न पर तुम विचार कर रहे हो वह प्रश्न
यदि यों बातचीत में ही हल हो जाय तो फिर सभी सहसा मुक्त
हो जायँगे। अजी ! यह प्रश्न ही तो भोग और मोक्ष की मध्य
सीमा है। जो इस प्रश्न का उत्तर निर्विकल्प समाधि से मांग लेते
हैं वे मुक्त हो जाते हैं, जिन्हें इस का सदुत्तर नहीं मिल पाता वे
यहीं भोगों में फँसे रह जाते हैं। फिर ऐसे असाधारण विषय को
वाद विवाद से निर्णय कर लेने की दुराकांक्षा क्यों करते हो ?
अरे भाई ! इस प्रश्न को समाधिभावना के द्वारा सुलझाने का
प्रयत्न करो। ऐसा यत्न करो कि किसी तरह इस माया का परि-
हार हो जाय। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता
इसी प्रकार आत्मदर्शन हुए बिना केवल युक्तिवाद से इस महा-
प्रश्न का सुलझना किंवा इस महास्वप्न का भंग हो जाना
अत्यन्त असम्भव बात है।
विस्मयैकशरीराया मायायाश्चोद्यरूपतः।
अन्वेष्यः परिहारोऽस्या बुद्धिमद्भिः प्रयत्नतः ॥१३९॥
देखो कि विस्मयरूपिणी यह माया आक्षेपरूप ही है।
बुद्धिमानों को इस विषय में केवल यही करना चाहिये कि वे इस
के परिहार का कोई उपाय सोच लें।
बुद्धिमान् लोग यह मालूम कर लें कि किस रीति से इस
माया का मोहक प्रभाव उनपर पड़ना बन्द हो जायगा ? प्याज़
०१
१७० पञ्चदशी
को छीलने से जैसे पत्ते ही पत्ते हाथ लगते हैं सार कुछ भी
नहीं मिलता इसी प्रकार माया के स्वरूप का विचार करने से तो
इसका कोई भी निर्णीत रूप हाथ नहीं आयेगा।
मायात्वमेव निश्चेयमिति चेत्तर्हि निश्चिनु ।
लोकप्रसिद्धमायाया लक्षणं यत्तदीक्ष्यताम् ॥१४०॥
पूर्वपक्षी पूछता है कि—तो फिर क्या मैं इसे माया ही
मान लूँ और परिहार का उपाय सोचना प्रारम्भ कर दूँ ? सिद्धा-
न्ती कहता है कि हां, अवश्य ही इसको माया मान लो । देख लो
कि लोकप्रसिद्ध माया के लक्षण इसमें भी पाये जाते हैं। इसी से
कहते हैं कि इसको भी माया ही मान लो।
न निरूपयितुं शक्या विस्पष्टं भासते च या ।
सा मायेतीन्द्रजालादौ लोकाः संप्रतिपेदिरे ॥१४१॥
जिसका निरूपण न हो सकता हो, फिर भी जो स्पष्ट ही
भासती हो, वह 'माया' है, ऐसा इन्द्रजालादि में लोग माया को
समझते हैं।
स्पष्टं भाति जगच्चेद मशक्यं तन्निरूपणम् ।
मायामयं जगत् तस्मादीक्षस्वापक्षपाततः ॥१४२॥
यह जगत् भी स्पष्ट ही दीख रहा है । परन्तु इसका निरूपण
कर सकना किसी के बूते की बात नहीं है। इस कारण कहते हैं
कि पक्षपात को छोड़ कर इस जगत् को मायामय समझ लो ।
निरूपयितुमारब्धे निखिलैरपि पण्डितैः ।
अज्ञानं पुरतस्तेषां भाति कक्षासु कासुचित् ॥१४३॥
संसार के सम्पूर्ण पण्डित, जब इस जगत् का निरूपण करना