पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
माना जाता है [आत्मा के अवयव जब सूक्ष्म नाडियों में
प्रचार करेंगे तब उसे आत्मा का ही प्रचार मान लिया जायगा।]
न्यूनाधिकशरीरेषु प्रवेशोऽपि गमागमैः ।
आत्मांशानां भवेत्, तेन मध्यमत्वं विनिश्चितम् ॥८४॥
आत्मा का जब एक नियत मध्यम परिमाण मानेंगे तब
जब वह छोटे बड़े शरीरों में प्रवेश करेगा, उस समय आत्मा
के कुछ अवयव घट बढ़ जाया करेंगे। फिर जैसे देह छोटे
बड़े हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मा के अंश भी घट बढ़ जायँगे।
यों आत्मा तो मध्यम परिमाण ही है ऐसा उन्होंने अपने मन
को समझा रक्खा है।
सांशस्य घटवन्नाशो भवत्येव, तथा सति ।
कृतनाशाकृताभ्यागमयोः को वारको भवेत् ॥८५॥
आत्मा को सावयव मानने पर घटादि की तरह उसका
नाश होगा ही। फिर कृतनाश और अकृताभ्यागम नाम के
दोषों को हटानेवाला कौन होगा उसे बताओ ? [किये हुए
पुण्य पाप जब बिना भोग दिये नष्ट हो जाते हैं तब उसे 'कृत-
नाश' कहते हैं। जब तो बिना किये ही कुछ भोगना पड़ जाता
है तब वह 'अकृताभ्यागम' कहा जाता है। आत्मा को अनित्य
मानने में ये दो दोष आते हैं।]
तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः ।
आकाशवत् सर्वगतो निरंशः श्रुतिसम्मतः ॥८६॥
यों परिशेष से यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा तो
महान् [विभु=व्यापक] ही है। यह न तो अणु है और न यह
मध्यम परिमाण वाला ही है। आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः
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निष्कलं निष्क्रियम् [ श्वेता० ६-१९ ] इत्यादि श्रुतियें आत्मा को
आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक तथा निरवयव मानती हैं ।
इत्युक्त्वा तद्विशेषे तु बहुधा कलहं ययुः ।
अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपश्चिदचिद्रूप इत्यपि ॥८७॥
यों आत्मा की विभुता तो सिद्ध हो गयी । परन्तु
उसके विशेष धर्मों के विषय में भी अनेक विवाद चलते हैं ।
कोई कहता है आत्मा 'अचिद्रूप' है। दूसरा आत्मा को 'चिद्रूप'
मानता है । कोई उसे चिदचिद्रूप भी बता देता है ।
प्राभाकरास्तार्किकाश्च प्राहुरस्याचिदात्मताम् ।
आकाशवद् द्रव्यमात्मा शब्दवत् तद्गुणश्चितिः ॥८८॥
प्राभाकर और तार्किक दोनों ही इसको अचिद्रूप बताते
हैं। वे कहते हैं कि—आत्मा भी आकाश की तरह एक द्रव्य है।
शब्द जैसे आकाश का गुण है इसी प्रकार चिति [ चैतन्य ]
उस. आत्मा का गुण है। [ इस चैतन्य गुण ने ही इस आत्मा
को पृथिवी आदि सब से भिन्न कर दिया है ] ।
इच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च धर्माधर्मौ सुखासुखे ।
तत्संस्काराश्च तस्यैते गुणाश्चितिवदीरिताः ॥८९॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्माधर्म, सुख, दुःख, तथा उनके
संस्कार ये सब चेतना के समान ही आत्मा के गुण हैं ।
आत्मनो मनसा योगे स्वादृष्टवशतो गुणाः ।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते सुषुप्तेऽदृष्टसंक्षयात् ॥९०॥
आत्मा का जब मन से योग हो जाता है, तब अपने अदृष्ट
के प्रताप से ये गुण उत्पन्न हो जाते हैं, तथा सुषुप्ति के समय
जब अदृष्ट का क्षय हो जाता है तब ये गुण नष्ट हो जाते हैं ।
चितिमत्त्वाच्चेतनोऽयमिच्छाद्वेषप्रयत्नवान् ।
स्याद्धर्माधर्मयोः कर्ता भोक्ता दुःखादिमत्त्वतः ॥९१॥
चिति नामक गुणवाला होने से यह चेतन है [ यों स्वयं
अचिद्रूप होने पर भी इसको चेतन मान लिया जाता है ]
चेतन होने का एक और भी प्रमाण है कि इसमें इच्छा, द्वेष
तथा प्रयत्न नाम के गुण विद्यमान हैं। यह आत्मा धर्माधर्म
का कर्ता है। दुःखादिवाला होने से इसे भोक्ता माना जाता है
[ यों उसमें ईश्वर तत्व से विलक्षणता पायी जाती है। ]
यथात्र कर्मवशतः कादाचित्कं सुखादिकम् ।
तथा लोकान्तरे देहे कर्मणेच्छादि जन्यते ॥९२॥
जैसे कर्म के वश यहाँ ( इस लोक में ) कभी कभी होने
वाले सुखादि होते हैं, इसी प्रकार लोकान्तर में [ मिले हुए ]
दूसरे देह में भी, कर्म से ही इच्छादि हो जाते हैं।
विभु होने पर आत्मा लोकान्तर गमन आदि कैसे करेगा ?
इसका समाधान यह है कि—जैसे इस देह में कर्म के वश
इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं तो इसे यहाँ आत्मा का रहना मान
लिया जाता है, इसी प्रकार कर्म के वश जब लोकान्तर में
देहान्तर मिलता है तब उस देहावच्छिन्न आत्मा के प्रदेश में
ही सुखादि उत्पन्न होने लगते हैं और वहाँ आत्मा का गमनादि
मान लिया जाता है। वस्तुतः आत्मा में गमनादि कुछ
नहीं होता।
एवं च सर्वगस्यापि संभवेतां गमागमौ ।
कर्मकाण्डः समग्रोऽत्र प्रमाणमिति तेऽवदन् ॥९३॥
इस प्रकार सर्वग [ सर्वत्र व्यापक ] आत्मा का भी आना
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जाना संभव हो जाता है। आत्मा में कर्तृत्वादि धर्म रहते हैं
इस बात में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड प्रमाण है ऐसा वे कहते हैं।
[ यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मकाण्ड की रचना क्यों की
गयी है ? ]
आनन्दमयकोशो यः सुषुप्तौ परिशिष्यते ।
अस्पष्टचित् स आत्मैषां पूर्वकोशोऽस्य ते गुणाः ॥९४॥
सुषुप्ति के समय जो 'आनन्दमय कोश' शेष रह जाता है
जिसमें चेतनता अस्पष्ट रूप से रहती है, कोशों में सबसे
पहला कोश यह आनन्दमय कोश ही इन प्रभाकर आदियों का
आत्मा है। वे पूर्वोक्त इच्छा आदि इसी के गुण हैं। [ तात्पर्य
यह कि जिस आत्मा को हमने पहले आनन्दमय कहा था
इच्छादि वाला वही उनका सम्मत आत्मा है । ]
गूढं चैतन्यमुत्प्रेक्ष्य जडबोधस्वरूपताम् ।
आत्मनो ब्रुवते भाट्टाश्चिदुत्प्रेक्षोत्थितस्मृतेः ॥९५॥
कुमारिल भट्ट के अनुयायी तो इसी आत्मा के गूढ अर्थात्
अस्पष्ट चैतन्य की ऊहना कर लेते हैं फिर इसको चैतन्य और
जड उभय रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि सोकर उठे हुए पुरुष
को जो स्मृति होती है उससे चैतन्य की उत्प्रेक्षा होती है। सो-
कर उठा हुआ पुरुष जब स्मरण करता है तब उससे सुषुप्ति
के समय के चैतन्य की ऊहना कर ली जाती है।
जडो भूत्वा तदास्वाप्समिति जाड्यस्मृतिस्तदा ।
विना जाड्यानुभूतिं न कथंचिदुपपद्यते ॥९६॥
[ चैतन्य की उत्प्रेक्षा करने की उनकी परिपाटी यह है
'कि ]—सुषुप्ति के समय 'मैं जड होकर सोया पड़ा था' ऐसा