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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३
यदि यह कहा जाय कि—बुद्धि से युक्त ही वह प्रवेश करता
है, सो यह ठीक नहीं। क्योंकि ऐतरेय में तो कहा गया है कि—
बुद्धि से पृथक् आत्मा ने पहले तो बुद्धि में प्रवेश का संकल्प
किया और फिर उसमें प्रविष्ट हो गया । ऐसी अवस्था में बुद्धि
रूपी उपाधि वाले आत्मा का प्रवेश मानना ठीक नहीं है।
कथंन्विदं साक्षदेहं मदृते स्यादितीरणात् ।
विदार्य मूर्धसीमानं प्रविष्टः संसरत्ययम् ॥३७॥
उस श्रुति में कहा गया है कि—इन्द्रियों और देह सहित
यह जड संसार मुझ चेतन को छोड़ कर कैसे रहेगा ? इसका
निर्वाह मुझ चेतन के बिना कैसे होगा ? यह विचार कर मूर्ध
सीमा को विदीर्ण करके [तीनों कपालों के मध्यदेश को भेद
कर] प्रविष्ट हो गया है और संसार में फंसा फिरता है।
अर्थात् जाग्रत् आदि अवस्थाओं का अनुभव कर रहा है ।
कथं प्रविष्टोऽसङ्गश्चेत् सृष्टिर्वास्य कथं वद ।
मायिकत्वं तयोस्तुल्यं विनाशश्च समस्तयोः ॥३८॥
यदि पूछो कि—जब वह असंग है तब वह प्रविष्ट ही कैसे
हो गया ? तो हम पूछेंगे कि फिर उस असंग ने सृष्टि रचना
ही कैसे कर दी ? यदि कहो कि मायिक होने से सृष्टि कर
दी तो हम कहेंगे कि मायिक होने से ही वह प्रवेश भी कर
गया है। मायिक होना तो दोनों बातों में समान ही है [कहो
सृष्टि मायिक है तो कहेंगे प्रवेश भी मायिक है]। क्योंकि
उन दोनों [सृष्टि और जीव] का विनाश भी सम ही है।
समुत्थायैष भूतेभ्यस्तान्येवानुविनश्यति ।
विस्पष्टमिति मैत्रेय्यै याज्ञवल्क्य उवाच हि ॥३९॥

३४४ पञ्चदशी
यह प्रज्ञानघन आत्मा पांच भूतों [से बने हुए इन देह
इन्द्रिय आदि उपाधियों] के सहारे से उठ खड़ा होता है [अर्थात्
जीवत्व का अभिमान करने लगता है] जब वे देहादि नष्ट होने
लगते हैं तब वह भी उनके पीछे पीछे—उन्हीं के साथ हो जाता
है [अथवा यों समझो कि उनके नष्ट हो जाने पर, उनके कारण
किये हुए,जीवत्व के अभिमान को छोड़ देता है। अर्थात् जब ये
देहादि नष्ट हो जाते हैं तब फिर उसका जीवत्व का अभिमान भी नहीं
रहता] इस रीति से याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी स सोपाधिकरूप को—
जिसको कि हम चिदाभास कहते हैं—स्पष्ट ही विनाशी बताया है।
अविनाश्ययमात्मेति कूटस्थः प्रविवेचितः ।
मात्राऽसंसर्ग इत्येवमसङ्गत्वस्य कीर्तनात् ॥४०॥
'अविनाशी वारेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा' (बृ० ४-५-१४) इस
श्रुति में कूटस्थ को उस [चिदाभास] से भिन्न बताया है।
'मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में आत्मा
की असंगता का कीर्तन किया गया है कि—मात्रा अर्थात् देहादि
से इस आत्मा का संसर्ग कभी भी—देह धारण करने पर भी
नहीं हो पाता [आत्मा की यह असंगता ही आत्मा के अविनाशी
होने का कारण है।]
जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न सः ।
इत्यत्र न विमोक्षोऽर्थः किन्तु लोकान्तरे गतिः ॥४१॥
'जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न जीवो म्रियते' (छा० ६-११-३)
जीव से छोड़ा हुआ यह शरीर ही मरा करता है जीव नहीं
मरता। इस श्रुति में मोक्ष का वर्णन नहीं है किन्तु इसमें तो
लोकान्तर की गति का वर्णन किया गया है।