बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६३
नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६३
भूमिगता इत्युक्तम्, तत्प्रसङ्गादाह—
'भूमेस्तु सम्मार्जनप्रोक्षणोपलेपनावास्तरणो-
ल्लेखनैर्यथास्थानं दोषविशेषात् प्रायत्यम् ॥ ११ ॥
**अनु०—**भूमि की शुद्धि स्थान के अनुसार तथा अशुद्धिदोष की मात्रा के अनुसार झाडू आदि से झाड़ने, जल से धोने, लीपने (दर्भ आदि के) अवस्तरण, (कुदाली आदि से) खोदने-खुरचने से—इनमें से एक, दो, तीन या एकसाथ सभी विषयों से होती है ॥ ११ ॥
भवेदिति शेषः । सम्मार्जनं संमूहन्या । प्रोक्षणं त्वद्भिः । उपलेपनं गोमयादिना । अवस्तरणं दर्भादिभिः । उल्लेखनं खनित्रैः ।
आह च मनुः—
सम्मार्जनेनाञ्जनेन सेचनोल्लेखनेन च ।
गवां च परिवासेन भूमिशुध्यति पञ्चभिः ॥ इति ॥
यथास्थानं यथादेशम्, दोषविशेषात् दोषगुरुलघुतापेक्षया सम्मार्जनादीनां व्यस्तसमस्तापेक्षया प्रायत्यं शुचित्वं भवति । तत्रैकेनँ क्वचिच्छुद्धिः, क्वचिद् द्वाभ्याम्, क्वचित्त्रिभिः क्वचित्समस्तैरिति द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥
तत्र क्वचित्प्रोक्षणस्यैव शुद्धिहेतुतामाह—
अथाऽप्युदाहरन्ति ॥ १२ ॥
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने नवमः खण्डः ॥ ९ ॥
**अनु०—**इस सम्बन्ध में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य भी उद्धृत करते हैं—॥ १२ ॥
षष्ठाध्याये दशमः खण्डः
गोचर्ममात्रमम्बिन्दुः ॥
गोचर्मगात्रमम्बिन्दुः भूमेश्शुद्ध्यति पातितः ।
समूढमसमूढं वा यत्राऽमेध्यं न लक्ष्यत इति ॥ १ ॥
**अनु०—**गिराया गया (या न झाड़ा गया) हो जल का एक बिन्दु बैल के चर्म के
१. खननाद्दहनाद्वर्षाद्गोभिराक्रमणादपि । चतुर्भिश्शुध्यते भूमिः पञ्चमाच्चोपलेपनात् ॥ इति वसिष्ठः । (व. ध. ३. ५१)
| ६४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ शुद्धिप्रकरणम् |
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बराबर भूमि के भाग को चाहे वह झाड़ा गया हो, यदि उस भूमि पर कोई अपवित्र पदार्थ दृष्टिगोचर न हों तो पवित्र कर देता ॥ १ ॥
अष्ठिबिन्दुः जललवः पातितः शुष्यतीति अन्तर्णीतणिजर्थो द्रष्टव्यः । समूढं सम्मार्जन्या । असमूढं स्पर्शादिशिष्टं देशं गोचर्ममात्रप्रमाणं यत्र गोशतमावेष्ट-यति, यत्र देशे, अमेध्यं पुरीषादि न लक्ष्यते तमिति शेषः ॥ १ ॥
परोक्षमधिश्रितस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणम् ॥ २ ॥
**अनु०—**खाने वाले की दृष्टि से परोक्ष में पकाये गये अन्न को जलती हुई अग्नि दिखानी चाहिए तथा उसके चारो ओर जल छिड़कना चाहिए ॥ २ ॥
**टि०—**ब्यूह्लरे ने अपने अनुवाद में यह सुझाया है कि यहाँ परोक्ष पकाये गये अन्न से शूद्र द्वारा पकाये गये अन्न का तात्पर्य है "ऐसा प्रतीत होता है कि यह नियम आर्यों के निरीक्षण के बिना ही शूद्रों द्वारा पकाये गये अन्न की ओर संकेत करता है । क्योंकि आपस्तम्ब सूत्रों में भी उसी शब्द 'परोक्षम्' 'आँख से परे' का प्रयोग है और निश्चित रूप से उसी स्थिति का निर्देश है, इस बात के लिए कोई कारण नहीं कि ब्राह्मण रसोइए द्वारा बनाये गये भोजन को खाने से पहले पवित्र किया जाय ।"—ब्यूह्लरेर, वही, पृ० १७२ टि० किन्तु गोविन्द स्वामी ने यह सुझाया है कि शङ्का होने-पर ही उपर्युक्त विधि से भोजन की शुद्धि की जाती है: 'शङ्का-पदमापन्नस्य शुद्धिर्भवति ।' शङ्का न होने की स्थिति में ऊपर बतायी गयी १.९.९ की तीन विधियों से शुद्धि हो ही जाती है ।
परोक्षं भोक्तुरसमक्षमधिश्रितस्य पक्वस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणं शङ्कापद-मापन्नस्य शुद्धिर्भवति । अनाशङ्कितस्य तु 'त्रीणि देवाः पवित्राणि' ( १.९.९. ) इत्युक्तम् ॥ २ ॥
तथापणेयानां च भक्ष्याणाम् ॥ ३ ॥
**अनु०—**इसी प्रकार बाजार की खाने योग्य वस्तुओं की भी शुद्धि होती है ॥३॥
**टि०—**बाजार की खाद्य वस्तुओं के अन्तर्गत गोविन्द ने लड्डु, अपूप, मोदक आदि तैयार बनी हुई मिठाइयों का उल्लेख किया है ।
आपणं वाणिजां पण्यस्थानम् ; क्रयविक्रयस्थानमित्यर्थः । तत्र भवा आप-णेया भक्ष्या ^१लड्डुकापूपसक्तुमोदकादयः उत्तरापथवासिनां प्रसिद्धाः । तेषा-मवद्योत्याऽभ्युक्षणम् । तथा च शङ्खः—"आकरजानामभ्युक्षितानां घृतेनाऽभि-घारितानामभ्यवहरणीयानां पुनः पचनमेव स्नेहद्रव्यसमानाम् इत्यादिना ॥३॥
१. मण्डकेति. क. पु.