बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
दशमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने दशमोऽध्यायः ३६५
दशमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने दशमोऽध्यायः ३६५
अनु०—पातक, वर्ण का लोप करने वाले पतनीय और उपपातकों को छोड़कर अन्य अपराधों के लिए आधे मास तक प्रतिदिन बारह-बारह प्राणायाम करे। पातक और पतनीय अपराधों को छोड़कर जो अन्य पाप कर्म हों उनके लिए बारह दिन की बारह अवधि तक अर्थात् एक सौ चौवालिस दिन प्रति दिन बारह-बारह प्राणायाम करे ॥ ८-९ ॥
पातकं ब्रह्महत्यादि पतनीयं तत्समानमुपपातकं गोवधादि तद्वर्जितेषु जातिभ्रंशकरादिषु एतत्प्रायश्चित्तम् ॥ ८,९ ॥
पातकवर्जेषु यच्चाऽन्यदप्येवं युक्तं द्वादशाऽर्धमासान् द्वादश द्वादश प्राणायामान् धारयेत् ॥ १० ॥
अनु०—पातक अपराधों को छोड़कर अन्य अपराधो के लिए अर्धमास की बारह अवधि तक (अर्थात् छः मास) प्रति दिन बारह-बारह प्राणायाम करे ॥ १० ॥
यच्चाऽन्यदपीत्यनृतगमनाभ्यासो गृह्यते । तच्च महापातकातिदेशिकं कर्म । द्वादशाऽर्धमासाः षण्मासाः । सर्वत्र गुरुलघुनोस्सहोपादाने गुरुलघुनोरभ्यासापेक्षयैव मतिपूर्वाद्यपेक्षया वा निमित्तं द्रष्टव्यम् । अन्यथा विषमसमीकरणप्रसङ्गात् ॥ १० ॥
अथ पातकेषु संवत्सरं द्वादश द्वादश प्राणायामान् धारयेत् ॥ ११ ॥
अनु०—पातक अपराधों के लिए एक वर्ष तक प्रति दिन बारह-बारह प्राणायाम धारण करे ॥ ११ ॥
योगनिष्ठस्याऽमात्यान्तनिर्गुणब्राह्मणवधादावेव महापातकानि प्रसक्तानि । तेष्वेव भ्रूणहत्याऽप्यन्तर्भवति ॥ ११ ॥
ऋतुमत्याः कन्याया अप्रदाने भ्रूणहत्यातुल्यदोषो भवतीत्येतद्वक्तुकामः कन्यादानप्रकरणमारभते—
दद्याद्गुणवते कन्यां नग्निकां ब्रह्मचारिणे ।
अपि वा गुणहीनाय नोपरुन्ध्याद्रजस्वलाम् ॥ १२ ॥
अनु०—कन्या जब नंगी ही घूमती हो (अर्थात् लज्जा भाव से शून्य अत्यन्त अल्प अवस्था में हो) तभी गुणवान् ब्रह्मचारी को विवाह में देनी चाहिए अथवा गुणहीन व्यक्ति को भी विवाह में दे देना उचित है किन्तु उसके रजस्वला होने पर अपने घर में रखना उचित नहीं ॥ १२ ॥
गुणवते विद्याचारित्रबन्धुशीलसम्पन्नाय नग्निका वस्त्रपरिधानाभावेऽपि
३६६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [समये कन्याऽदाने दोषः, स्वयंवरश्च
लज्जाशून्या, गुणहीनाय सर्वगुणाभावेऽपि कतिपयगुणसंपन्नाय, नोपरुन्ध्या-
दिति रजोदर्शनात्प्रागेव दद्यादित्यर्थः ॥ १२ ॥
तदतिक्रमे दोषमाह—
त्रीणि वर्षाण्यृतुमतीं यः कन्यां न प्रयच्छति ।
स तुल्यं भ्रूणहत्यायै दोषमृच्छत्यसंशयम् ॥ १३ ॥
अनु०— जो पिता ऋतुमती कन्या को तीन वर्ष के भीतर विवाह नहीं कर देता, वह निश्चय ही भ्रूणहत्या के समान पाप का भागी होता है ॥ १३ ॥
यतश्चैतदेवं तत ऋतुमत्ययाः प्रागेव दद्यादित्यभिप्रायः ॥ १३ ॥
किं सर्वत्रैतावदेव ? नेत्याह—
न याचते चेदेवं स्याद्याचते चेत्पृथक् यक्।
एकैकस्मिन्नृतौ दोष पातकं मनुरब्रवीत् ॥ १४ ॥
अनु०— इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति उसे विवाह के लिए नहीं मांगता अथवा विवाह के लिए माँगता है, तब भी पिता को वही दोष होता है क्योंकि मनु ने कहा है कि अविवाहिता कन्या का प्रत्येक ऋतुकाल पिता के लिए पातक उत्पन्न करता है।१४।
न याचते न प्रार्थयते चेत् कश्चिदपि ॥ १४ ॥
तत्र प्रसङ्गादिदमन्यदुच्यते—
'त्रीणि वर्षाण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् ।
ततश्चतुर्थे वर्ष तु विन्देत सदृशं पतिम् ॥ १५ ॥
अनु०— ऋतुमती कन्या तीन वर्षतक पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा करे । उसके बाद चौथे वर्ष में अपने योग्य गुणवान् पति का स्वयं वरण करे ॥ १५ ॥
सादृश्यं जातिगुणादिभिः ॥ १५ ॥
अत एवाऽऽह—
अविद्यमाने सदृशे गुणहीनमपि श्रयेत् ॥ १६ ॥
अनु०— यदि जाति और गुण में समान पुरुष न मिले तो गुणहीन पुरुष को भी पति के रूप में वरण करे ॥ १६ ॥
गुणा अभिजननादयो न जातिः ॥ १६ ॥
१. cf म. स्मृ. ९. ९०.