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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९५

द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९५

भक्ष्याः श्वाविद्गोधाशशशल्यककच्छपखड्गाः खड्गवर्जं: पञ्च पञ्चनखाः ॥ ५ ॥

अनु०—श्वाविद्-गोधा ( गोह ), खरगोश, शल्यक, कच्छप और खड्ग इनमें खड्ग के अतिरिक्त पांच नखवाले पांच पशु भक्ष्य होते हैं ॥ ५ ॥

टि०—सूत्र में पहले खड्ग को एक साथ गिनाकर 'पञ्च पञ्चनखाः' 'खड्गवर्जः' कहकर विकल्प नियम प्रस्तुत किया गया है। खड्ग का मांस भक्षण करने के विषय में विवाद है, जिसका उल्लेख गोविन्द स्वामी ने अपनी व्याख्या में किया है और वसिष्ठ के वाक्य को उद्धृत किया है 'खड्गे तु विवदन्ते'। श्वाविद्-कुत्ते जैसा मृग है; शल्यक एक विशेष प्रकार का सूअर है; गोधा गोह को कहते हैं। खड्ग भी एक विशेष प्रकार का मृग है 'खड्गो मृगविशेषः' 'शल्यको वराहविशेषो यस्य नाराचाकाराणि लोमानि। गोधा कृकलासाकृतिमहाकायः'—गौतम ध० सू० पर २.८.२७ हरदत्त कृत मिताक्षरा । 'पञ्चनखाश्चाशल्यकशशश्वाविद्गोधाखड्ग कच्छपाः' वही, पृ० १८६.

¹परिसङ्ख्यैषा । कामत एवैषामपि भक्ष्यत्वे प्राप्ते भक्ष्येतरनिषेधार्थम् । 'पञ्चपञ्चनखग्रहणाच्च सजातीयपरिसंख्यैषा गम्यते । श्वाविदादीन् षडनुक्रम्य 'पञ्चग्रहणात् षष्ठस्य परिसङ्ख्यायां विकल्पः। तच्च स्पष्टीकृतम्-खड्गवर्जंा इति । तथा च वसिष्ठः—'खड्गे तु विवदन्ते' इति । आचार्येणाऽप्युक्तं 'खड्गंश्श्राद्धे पवित्रम्' इति । एवमुत्तरेष्वपि खड्गवत् यथासम्भवं योजना । श्वाविङः 'श्वसदृशमृगाः। शल्यकाः वराहविशेषाः । ऋज्यन्त्यत् ॥ ५ ॥

तथर्श्यहरिणपृषतमहिषवराह ²कुलुङ्गाः कुलुङ्गवर्जं: पञ्च द्विखुरिणः ॥ ६ ॥

अनु०—इसी प्रकार श्वेत खुर वाला मृग ( नील गाय ), सामान्य हरिण, धारीदार चर्म वाला हरिण, भैंसा, जंगली सूअर, काले रंग का मृग-इनमें काले रंग के मृग को छोड़ पांच दोखुरे जानवर भक्ष्य होते हैं ॥ ६ ॥

टि०—इस सूत्र में भी कुलुङ्ग के विषय में विवाद है अन्य दो खुर वाले पशु भक्ष्य हैं ।

भक्ष्या इत्यनुवर्तते । पूर्ववत्परिसंख्या ॥ ६ ॥


१. उभयोस्समुच्चित्य प्राप्तावितरनिवृत्तिः परिसंख्या ।
२. कुलङ्ग इति मु. पु.

९६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ भक्ष्याः

पशवो गताः। पक्षिण आरभ्यन्ते—
पक्षिणस्तित्तिरिकपोतकपिञ्जलवार्ध्राणसमयूरवारणा वारणवर्ज्याः पञ्च विविष्किराः ॥ ७ ॥

**अनु०—**तित्तिर, कबूतर, कपिञ्जल, वार्ध्राणस, मयूर और वारण में वारण को छोड़ पांच तोड़-तोड़ कर खाने वाले पक्षी भक्ष्य होते हैं ॥ ७ ॥
**टि०—**यहाँ भी वारण पक्षी के भक्षण को सन्दिग्ध समझना चाहिए। 'भक्ष्याः प्रतुदविविष्किरजालपादाः' गौतम० २. ८. ३५, पृ० १८८ ।
अस्मिन्नपि षट्के वारणे विकल्पः। विकीर्य विकोर्य भक्षयन्तीति विविष्किराः। अन्यत्पूर्ववत् ॥ ७ ॥

मत्स्यास्सहस्रदंष्ट्रचिलिचिमो वर्मी बृहच्छिरोरोमशकरिरोहितराजीवाः ॥ ८ ॥

**अनु—**सहस्रदंष्ट्र, चिलिचिम, वर्मी, बृहच्छिरस्, रोमशकरि, रोहित और राजीव मछलियाँ भक्ष्य होती हैं ॥ ८ ॥
**टि०—**वसिष्ठ १४-४१-४२ में इन मत्स्यों के भक्ष्य होने का नियम है। नामों के विषय में विभिन्न पुस्तकों में कुछ अन्तर है, उदाहरण के लिए सूत्र के प्रस्तुत पाठ में 'रोमशकरि' नाम उपलब्ध है, किन्तु 'मशकरि' नाम भी कुछ लोगों ने ग्रहण किया है। द्र० व्यूहलेर की टिप्पणी। गोविन्द स्वामी ने भी इन नामों को स्पष्ट न कर लिखा है कि इनके विषय में निषादों आदि से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
भक्ष्या इत्यनुवर्तते। उक्तेषु पशुमृगपक्षिमत्स्येषु अप्रसिद्धनामकाः निषादेभ्योऽवगन्तव्याः ॥ ८ ॥

उक्तो जङ्गमेषु भक्षणविशेषः। अथ स्थावरेष्वाह—
अनिर्दशाहसन्धिनीक्षीरमपेयम् ॥ ६ ॥

**अनु०—**जिस गाय, भैंस, बकरी आदि को ब्याए हुए दस दिन न हुए हों अथवा जो गर्भिणी अवस्था में दुही जा रही हो उसका दूध अपेय होता है ॥ ९ ॥
**टि०—**द्रष्टव्य वसिष्ठ १४. ३४-३५; गौतम० २. ८. २२ 'गोश्च क्षीरमनिर्दशायाः सुतके' २३, अजामहिष्योश्च, २५ 'स्यन्दिनीयामसुसंधिनीनां च'। संधिनी की गोविन्द स्वामी की व्याख्या स्पष्ट है: जो गर्भिणी स्थिति में दुही जाती है और प्रातः न दुहने पर सायं दुही जाती है। स्थानीय बोलियों में ऐसी गायों के विशेष नाम होते हैं।
गोमहिष्यजानामिति शेषः। प्रसवादारभ्य नातिक्रान्तदशाहमनिर्दशाहं क्षीरम्। सन्धिनी पुनः या गर्भिणी दुह्यते या वा सायमदुग्धा प्रातर्दुह्यते प्रातर्दुग्धा वा सायंम् ॥ ९ ॥