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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ८१

एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ८१

अनु०—प्रपितामह, पितामह, पिता, स्वयम् एक ही माता पिता से उत्पन्न अपने भाई, सवर्ण पत्नी से उत्पन्न पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र को, सपिण्ड कहा गया है, किन्तु प्रपौत्र के पुत्र को सपिण्डों में नहीं गिना जाता, इनमें भी पुत्र और पौत्र पिता के साथ अविभक्तदाय वाले होते हैं ॥ ७ ॥

टि०—गोविन्द स्वामी ने इस सूत्र की व्याख्या में अर्थविषयक कठिनाई नहीं दूर की है । 'पुत्रपौत्रमविभक्तदायम्' विशेषतः विचारणीय है। ब्यूह्लर ने कोले-ब्रूक के 'दायभाग' ११.१.३७ का उल्लेख करते हुए पाठभेद का निर्देश किया है, 'तेषां च पुत्रपौत्रम्' 'अविभक्तदायादान्' अन्य पाठान्तर हैं। इसका ब्यूह्लर ने यह अर्थ सुझाया है कि पिता अपने पुत्र और पौत्र के साथ अविभक्त रूप से श्राद्ध के समय चौथे पुरुष द्वारा दिये गये पिण्डदान को ग्रहण करता है।

सापिण्ड्य एव किञ्चिद्वक्तव्यमस्तीति मत्वाऽत्रापि चेत्याह । उक्तस्यैव विस्तारोऽयं प्रपितामह इत्यादि । परिभाषा चैषा द्रष्टव्या ॥ ७ ॥

विभक्तदायानपि सकुल्यानाचक्षते ॥ ८ ॥

अनु०—विभक्तदाय वाले पुरुषों को सकुल्य कहते हैं ॥ ८ ॥

टि०—गोविन्द स्वामी के अनुसार सपिण्डों में ही जब सम्बन्ध विशेष का ज्ञान नहीं होता तो उन्हें सकुल्य कहते हैं । सम्बन्धमात्र का ज्ञान होने पर सकुल्य होते हैं। 'जीमूतवाहन के अनुसार सकुल्या प्रपितामह के पहले के तीन तथा प्रपौत्र के बाद के तीन पुरुषों को कहते हैं ।"—ब्यूह्लर की टिप्पणी । इस दृष्टि से ब्यूह्लर की पूर्ववर्ती सूत्र की टिप्पणी समीचीन प्रतीत होती है ।

एषा च परिभाषा । एतदुक्तं भवति—विभक्ताविभक्तशब्दौ व्यत्यस्तौ कार्यो । सम्बन्धविशेषज्ञाने सति सपिण्डा उच्यन्ते । संबंधमात्रज्ञाने सकुल्याः । अतश्च सकुल्या अपि सपिण्डा एव, द्रव्यपरिग्रहे तु विशेषोऽस्ति ॥ ८ ॥

तदाह—

असत्स्वन्येषु तद्गामी ह्यर्थो भवति ॥ ९ ॥

अनु०--जब (औरस पुत्र आदि ) कोई सम्बन्धी नहीं रह जाता तो मृत पुरुष की सम्पत्ति सपिण्डों को प्राप्त होती है ॥ ९ ॥

अन्येष्वौरसादिषु पुत्रेषु ॥ ९ ॥

सपिण्डाभावे सकुल्यः ॥ १० ॥

अनु०—सपिण्डों के अभाव में वह सम्पत्ति सकुल्य को प्राप्त होती है ॥ १० ॥

९ बौ० ध०

८२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ सापिण्ड्यम्

ऋज्वेवत् ॥ १० ॥

तदभावे पिताऽऽचार्योऽन्तेवास्यृत्विग्वा हरेत् ॥ ११ ॥

**अनु०—**सकुल्यों के अभाव में सम्पत्ति पिता तुल्य आचार्य, उनके अभाव में अन्तेवासी शिष्य और उसके अभाव में यज्ञ करानेवाला ऋत्विज् सम्पत्ति को ग्रहण करे ॥ ११ ॥

**टि०—**पिताऽऽचार्यं से पितृस्थानीय या पितातुल्य आचार्य का अर्थ ग्रहण किया गया है। आचार्य पिता-स्थानीय होता है इस सम्बन्ध में गोविन्द स्वामी ने वसिष्ठ ध० सू० के वचनों का उल्लेख किया है। इस सूत्र में 'वा' शब्द यह प्रदर्शित करता है कि आचार्य, शिष्य और ऋत्विज् में पूर्व के अभाव में बाद वाला अधिकारी होता है।

वाशब्दो विकल्पार्थः । स च व्यवस्थया । सा च पूर्वपूर्वाभावे उत्तरोत्तर इति । पिता पितृस्थानीयः । अनेन पुत्रस्थानीयोऽपि लक्ष्यते । स च दाहादिसंस्कारकर्ता; कथम् ? तथाऽऽह वसिष्ठः—'सपिण्डाः पुत्रस्थानीया वा तस्य धनं विभजेरन्' इति । इतरथा सकुल्याभावे पिता गृह्णीयादित्युक्ते पूर्वापरविरोधस्यात् । तस्मात् पितृशब्देन पितृस्थानीयः पुत्रस्थानीयो ग्रहीतव्यः ॥ ११ ॥

तदभावे राजा तत्स्वं त्रैविद्यवृद्धेभ्यः संप्रयच्छेत् ॥ १२ ॥

**अनु०—**उसके अभाव में राजा ब्राह्मण के धर्म को तीनों वेदों के विद्वानों को प्रदान करे ॥ १२ ॥

**टि०—**सूत्र में 'सत्स्वम्' से गोविन्द स्वामी ने सत् से ब्राह्मण का अर्थ लेकर ब्राह्मण का धन राजा वेदविद्या के विद्वानों को दे, अन्य वर्ण के ऐसे व्यक्ति के धन को राजा स्वयं ग्रहण कर सकता है। 'सत्स्वम्' के स्थान पर 'तत्स्वम्' भी पाठ है जिसका अर्थ होगा, 'उस धन को' या 'उस व्यक्ति के धन को' । किन्तु अगले सूत्र में ब्राह्मण के धन के विषय में तो स्पष्टतः विधान कर ही दिया गया है।

सदिति ब्राह्मणं प्रति निर्दिशति । इतरवर्णस्वं तु सर्वाभावे राजैवाऽऽददीत ॥ १२ ॥

न त्वेव कदाचित्स्वयं राजा ब्राह्मणस्वमाददीत ॥ १३ ॥

**अनु०—**किन्तु राजा ब्राह्मण के धन को कदापि स्वयं न ग्रहण करे ॥ १३ ॥