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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

तृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २७

तृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २७

श्लाघनं विकत्थनं तच्च क्रीडनं करताडनादिः । तथा च वसिष्ठः—'न पादेन पाणिना वा जलमभिहन्यान्न जलेन जलम्' इति ॥ ४० ॥

दण्ड इव प्लवेत् ॥ ४१ ॥

**अनु०—**जल में सीधा दण्ड की भाँति तैरे ॥ ४१ ॥

अप्सूदूर्त्तनप्रतिषेधोऽयम् ॥ ४१ ॥

अब्राह्मणादध्ययनमापदि ॥ ४२ ॥

**अनु०—**आपत्ति काल में ( अर्थात् ब्राह्मण गुरु उपलब्ध न होने पर ) ब्राह्मणेतर वर्ण के गुरु से ( ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय गुरु से और क्षत्रिय के अभाव में वैश्य गुरु से ) विद्या ग्रहण करे ॥ ४२ ॥

**टि०—**अब्राह्मण से शूद्र का भी ग्रहण नहीं होगा । 'शूद्र से कभी भी लौकिकी विद्या भी नहीं ग्रहण करनी चाहिए ।'—गोविन्द स्वामी ।

कुर्यादिति शेषः । आपत् ब्राह्मणाभावः । अध्ययनं श्रवणस्याऽपि प्रदर्शनार्थम् । ब्राह्मणाभावे क्षत्रियात्, तदभावे वैश्यात् । अब्राह्मणग्रहणात् त्रैवर्णिका गृह्यन्ते । ततश्च न कदाचिच्छूद्रालौकिक्यपि विद्या ग्रहीतव्या ॥ ४२ ॥

क्षत्रियवैश्ययोरपि—

शुश्रूषाऽनुव्रज्या च यावदध्ययनम् ॥ ४३ ॥

**अनु०—**जब तक अध्ययन करे तब तक ही उस अब्राह्मण ( क्षत्रिय, वैश्य वर्ण के ) गुरु की प्रसाधन आदि सेवा करे ॥ ४३ ॥

तावत् । शुश्रूषा प्रसाधनादि । अनुव्रज्या अनुगमनम् ॥ ४३ ॥

अयुक्तमेतदिति चेत् —

तयोस्तदेव पावनम् ॥ ४४ ॥

**अनु०—**उन दोनों का ( शिष्य और उपाध्याय का ) यह संबन्ध स्वतः ही वर्ण व्यतिक्रम दोष को पवित्र करने वाला होता है ॥ ४४ ॥

पावनं शुचिहेतुः । एवं कृतेऽपि शिष्योपाध्याययोर्वर्णधर्मव्यतिक्रमदोषोनाऽस्तीत्यभिप्रायः ॥ ४४ ॥

भ्रातृपुत्रशिष्येषु चैवम् ॥ ४५ ॥

**अनु०—**इसी प्रकार गुरु के भ्राता, पुत्र तथा अन्य शिष्यों के प्रति भी ( अध्ययन काल तक ) सेवाकार्य करे ॥ ४५ ॥

२८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ ब्रह्मचारिधर्मः

शुश्रूषाऽतिदिश्यते यावदध्ययनम् । यवीयसामित्युपरितनसूत्रात् प्रतिकर्षो द्रष्टव्यः ॥ ४५ ॥

'ऋत्विक्श्वशुरपितृव्यमातुलानां तु यवीयसां प्रत्युत्थायाऽभिभाषणम् ॥ ४६ ॥

**अनु०—**अपने से कम अवस्था वाले-ऋत्विक्, श्वशुर, चाचा, मामा के आगमन पर ( उनका चरण स्पर्श न कर ) आसन से उठकर स्वागतार्थ शब्दों का उच्चारण करे ॥ ४६ ॥

**टि०—**तुलना० आपस्तम्बधर्म० १.१४.१०

अयमपि नियमोऽध्यापकानामेवर्त्विगादीनाम् । अभिभाषणं स्वागतादिशब्दप्रयोगः ॥ ४६ ॥

प्रत्यभिवाद इति कात्यः ॥ ४७ ॥

**अनु०—**कात्य नाम के धर्मशास्त्री का मत है कि कम अवस्था वाले ऋत्विक् आदि को अभिवादन का उत्तर उसी प्रकार से देना चाहिए ॥ ४७ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी के अनुसार ऋत्विक् आदि को अभिवादन करना चाहिए ।

कतस्य ऋषेरपत्यं कात्यः । स एवं मन्यते स्म-ऋत्विगादिभिः प्रत्यभिवादः कर्तव्य इति । एषां प्रत्यभिवादनविधानादितरैरभिवादनं कर्तव्यमिति गम्यते ॥ ४७ ॥

तत्र हेतुमाह—

२शिशावाङ्गिरसे दर्शनात् ॥ ४८ ॥
धर्मार्थौ यत्र न स्याताम् ॥ ३ ॥

**अनु०—**क्योंकि शिशु आङ्गिरस के उपाख्यान से स्पष्ट है ॥ ४८ ॥

**टिप्पणी—**शिशु आङ्गिरस की कथा मनुस्मृति २. १५१-१५३ में उल्लिखित है । शिशु आङ्गिरस ने अपने पिता को वेद का अध्यापन किया तथा उन्हें "पुत्रकाः" कहकर संबोधित किया ।

यह कथा ताण्ड्यमहाब्राह्मण १३.३.२४ में भी दी गयी है ।


१. Cf with आपस्तम्बधर्म. १. १४ १०
२. ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥