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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

चतुर्थः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १९५

चतुर्थः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १९५

उक्तं स्त्रीणां ब्राह्मण्यादीनाम् । अथ—
पुंसां ब्राह्मणादीनां संवत्सरं ब्रह्मचर्यम् ॥ ५२ ॥

**अनु०—**ब्राह्मण आदि पुरुषों के लिए एक वर्ष के ब्रह्मचर्य का नियम होता है॥५२

**टि०—**यहाँ एक वर्ष के प्राजापत्य का अभिप्राय है। यह नियम जानबूझ कर व्रतोल्लंघन के प्रसंग में होता है। गोविन्द के अनुसार यह नियम समान वर्ण की परदारा के साथ व्यभिचार के प्रसंग में ही समझना चाहिए।

संवत्सरं प्राजापत्यमिहाभिप्रेतम् । अत्र पारदार्यञ्च सवर्णविषयः । मतिपूर्वे चैतत् । अमतिपूर्वे तु वसिष्ठः—'ब्राह्मणश्चेदप्रेक्षापूर्वं ब्राह्मणदारानभिगच्छेद्-निवृत्तधर्मकर्मणः कृच्छ्रो निवृत्तधर्मकर्मणोऽतिकृच्छ्रः । एवं राजन्यवैश्ययोः' इति । अनिवृत्तधर्मकर्मादिनिवृत्तिहीनतद्भार्यागमने कृच्छ्रः । निवृत्तधर्मकर्मा वृत्तवान् । तद्भार्यागमनेऽतिकृच्छ्रः । 'अनिवृत्तधर्मकर्मा तद्भार्यायामति-कृच्छ्रः' इति व्याख्यातम् ॥ ५२ ॥

शूद्रं कटाग्निना दहेत् ॥ ५३ ॥

अथाऽप्युदाहरन्ति—
अब्राह्मणस्य शारीरो दण्डः ।
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे द्वितीयप्रश्ने तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥

**अनु०—**शूद्र को (आर्य स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर) घासफूस की आग में जला देना चाहिए ॥ ५३ ॥

इस विषय में निम्नलिखित उद्धृत किया जाता है—

राज्ञोऽयमुपदेशः । मरणान्तिकं चैतत् । कटः कटप्रकृतिद्रव्यं वीरणानि । उक्तं च—'शूद्रश्चेद् ब्राह्मणीमभिगच्छेत् चोरणैर्वेष्टयित्वा शूद्रमग्नौ प्रास्येत्' इति ॥ ५३ ॥


चतुर्थः खण्डः

अब्राह्मणस्य शारीरो दण्डस्सङ्ग्रहणे भवेत् ॥ १ ॥

**अनु०—**ब्राह्मण वर्ण से अतिरिक्त वर्ण का पुरुष ब्राह्मणी परदारा से व्यभिचार करे तो उसे शारीरिक दण्ड (अग्नि में जलाने का दण्ड) होता है ॥ १ ॥

**टि०—**यह दण्ड भी उस स्थिति में होता है जब जानबूझकर वैश्य या क्षत्रिय वर्ण का पुरुष ब्राह्मणी परदारा से व्यभिचार करे । वैश्य को लाल रंग के दर्भ में

१९६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तम्.

लपेटकर अग्नि में प्रक्षेप का तथा क्षत्रिय को सरपत में लपेटकर अग्नि में झोंकने का
दण्ड है—गोविन्दस्वामी।

अब्राह्मणः क्षत्रियः वैश्यश्च। तयोश्शारीरो दण्डः अग्नौ प्रक्षेपः कर्तव्यः।
क्व ? संग्रहेणे पारदार्ये। निगुप्तब्राह्मणीगमने मतिपूर्वे वैश्यो लोहितदर्भैर्वे-
ष्टयित्वाऽग्नौ प्रक्षेपव्यः। राजन्यश्शरपत्रैरिति ॥ १ ॥

अथ प्रपञ्चः—

सर्वेषामेव वर्णानां दारा रक्ष्यतमा धनात् ॥ २ ॥

**अनु०—**सभी वर्णों के पुरुषों के लिए पत्नियां धन की अपेक्षा भी अधिक साव-
धानी से रक्षणीय होती हैं ॥ २ ॥

अपोति शेषः ॥ २ ॥

अब्राह्मणवध उक्तः। अत्राऽपवदति—

न तु चारणदारेषु न रङ्गावतारे वधः ।
संसर्जयन्ति ता ह्येतान्निगुप्तांश्चालयन्त्यपि ॥ ३ ॥

**अनु०—**किन्तु चारणों की पत्नियों तथा रंगमंच पर नृत्य अभिनय करने वाली
नर्तकियों से यौनसंबंध करने पर वध का दण्ड नहीं होता है। क्योंकि ऐसी स्त्रियों
के पुरुष ही उनका संबन्ध दूसरे पुरुषों से कराते हैं या घर के भीतर भी उन्हें दूसरे
पुरुषों से (धन आदि के लिए) यौनसंबन्ध करने की छूट देते हैं ॥ ३ ॥

**टि०—**गोविन्दस्वामी के अनुसार चारणदारा देवदासी को कह सकते हैं। रंगा-
वतार से वेश्याओं से तात्पर्य है, जो नृत्य आदि द्वारा जीविकोपार्जन करती हैं।
इन स्त्रियों के साथ व्यभिचार का दोष इसलिए नहीं माना गया है कि इनके
पुरुष इस विषय में आपत्ति नहीं करते, अपितु धनलिप्सा से स्वयं ही इनका संबन्ध
दूसरे पुरुषों से कराते हैं। किन्तु वेश्यागमन के संबन्ध में भी प्रायश्चित्त का अन्यत्र
विधान किया गया है—

“पशुं वेश्यां च यो गच्छेत्प्राजापत्येन शुद्धयति”

चारणदाराः देवदास्यः। रङ्गावतारः पण्यस्त्रियः। तासु सङ्ग्रहणे वधो न
कर्तव्यः। येन तास्संसर्जयन्ति सम्बन्धयन्ति आत्मना निगुप्तान् रक्षितानपि
पुंसो द्रव्यलिप्सया। तानेव क्षीणद्रव्यांश्चालयन्ति उत्सृजन्ति च। एवंस्वभाव-
त्वात्तासां तद्गमने प्रायश्चित्तमप्यल्पमेव। ‘पशुं वेश्यां च यो गच्छेत्प्राजा-
पत्येन शुद्धयति’ इति। तथाऽन्यत्राऽपि--