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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

तृतीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १८७

तृतीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १८७

यो मातापितृभ्यां मात्रा पित्रा वा दत्तः ॥ २० ॥

सदृशं यं सकामं स्वयं कुर्यात्स कृत्रिमः ॥ २१ ॥

**अनु०—**वह पुत्र कृत्रिम कहलाता है, जिसके पुत्र बनने की इच्छा को देखकर स्वयं ही पुत्र के रूप में मान लिया जाय ॥ २१ ॥

सादृश्यं जात्यादिना । सकामं अस्याऽहं पुत्रो भविष्यामि यदि मां ग्रहीष्यतीति यो मन्यतेः पुत्रार्थी च स्वयमेव पूजापूर्वकं यदि गृह्णाति । एवं गृहीतः कृत्रिम उच्यते ॥ २१ ॥

गृहे गूढोत्पन्नोऽन्ते ज्ञातो गढोः ॥ २२ ॥

**अनु०—**घर के भीतर गुप्त रूप से ( व्यभिचार द्वारा ) उत्पन्न पुत्र को गूढज कहते हैं, जिसके गुप्त रूप से उत्पादित होने का ज्ञान बाद में हो ॥ २२ ॥

गृहे अतिगुप्तायामपि स्त्रियामसमुत्पादितोऽयमिति पूर्वमज्ञातः । पश्चात्कालान्तरे येन व्यभिचारादिना कारणेनाऽस्यामुत्पादितोऽयं पुत्र इति विज्ञायते तथापि गूढजः इत्यभिप्रायः । अत्र गृहग्रहणं प्रव्रजितायां गूढोत्पन्नस्य गूढ इति संज्ञा मा भूदित्येतदर्थम् ॥ २२ ॥

मातापितृभ्यामुत्सृष्टोऽन्यतरेण वा योऽपत्यार्थे परिगृह्यतेसोऽपविद्धः॥२३॥

**अनु०—**माता और पिता के द्वारा या उनमें से किसी एक द्वारा त्यागे हुए और पुत्र के रूप में ग्रहण किये गये को अपविद्ध कहते हैं ॥ २३ ॥

अत्राऽपि सदृश इत्यनुवर्तते । उत्सृष्टस्त्यक्तः ॥ २३ ॥

असंस्कृतामनतिसृष्टां यामुपयच्छेत्तस्यां यो जातस्स कानीनः ॥२४॥

**अनु०—**अविवाहिता कन्या से गुरुजनों की अनुमति के बिना ही योनिसंबन्ध करने पर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको कानीन कहते हैं ॥ २४ ॥

**टि०—**इस सूत्र में 'असंस्कृता' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि गूढज पुत्र संस्कृता अर्थात् विवाहिता स्त्री से उत्पन्न होता था ।

अनेन ज्ञायते गूढजः संस्कृतायां जात इति । अनूढामसंस्कृतामाहुः । अनतिसृष्टां अनभ्युपगतां गुरुभिः अतिसृष्टायामप्यसंस्कृतायां संस्कृतायामप्यनतिसृष्टायां स एव । सोऽयं सदृश्यामुत्पादितो मातामहस्य पुत्रः ॥ २४ ॥

या गर्भिणी संस्क्रियते विज्ञाता वाऽविज्ञाता वा तस्यां यो जातः स सहोढः ॥ २५ ॥

१८८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ पुत्रभेदाः

अनु०—विवाह के समय ही यदि वधू ज्ञात या अज्ञात रूप से गर्भिणी हो तो उससे उत्पन्न पुत्र को सहोढ कहते हैं ॥ २५ ॥

या गूढगर्भिणी सती परिणीयते तस्यां यो जातस्स सहोढो नाम । वोढुश्चायं पुत्रः । विज्ञातायां तु संस्कार एनोऽस्ति ॥ २५ ॥

मातापित्रोर्हस्तात्क्रीतोऽन्यतरेण वा योऽपत्यार्थे परिगृह्यते स क्रीतः ॥ २६ ॥

अनु०—जो पुत्र माता और पिता को धन देकर खरीदा जाता है या उनमें से किसी एक द्वारा बेचा जाकर पुत्र के रूप में ग्रहण किया जाता है उसे क्रीत कहते हैं ॥ २६ ॥

स्वद्रव्यं प्रदायेति शेषः ॥ २६ ॥

क्लीवं त्यक्त्वा पतितं वा याऽन्यं पतिं विन्देत्तस्यां पुनर्भ्वां यो जातस्स पौनर्भवः ॥ २७ ॥

अनु०—नपुंसक या पतित पति को छोड़कर दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली स्त्री से जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको पौनर्भव कहते हैं ॥ २७ ॥

टि०—यहां पति के मृत होने पर दूसरा विवाह करने वाली स्त्री से भी अर्थ लेना चाहिए ।

मृतोऽप्यत्राऽभ्यनुज्ञातः । तथा च वसिष्ठः—'मृते वा सा पुनर्भूर्भवति' इति ॥ २७ ॥

मातापितृविहीनो यः स्वयमात्मानं दद्यात्स स्वयंदत्तः ॥ २८ ॥

अनु०—माता और पिता से विहीन होकर जो स्वयं को पुत्र के रूप में अर्पित करता है उसे स्वयं दत्त कहते हैं ॥ २८ ॥

स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनं च दानम् । अत्राऽपि शरीरेन्द्रियाणामा-त्मीयत्वाद्दानव्यवहारः ॥ २८ ॥

द्विजातिप्रवराच्छूद्रायां जातो निषादः ॥ २९ ॥

अनु०—द्विजातियों में प्रथम वर्ण अर्थात् ब्राह्मण द्वारा शूद्रा स्त्री से उत्पन्न किये गये पुत्र को निषाद कहते हैं ॥ २९ ॥

द्विजातिप्रवरो ब्राह्मणः ॥ २९ ॥

कामात्पारशव इति पुत्राः ॥ ३० ॥