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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९१

एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९१

अनु०—'जो रजस्वला स्त्री से पुत्र उत्पन्न होता है वह अभिशस्त कहा गया है' इसकथन के साथ रजस्वला स्त्री के व्रतों की व्याख्या की गयी है ॥ ३३ ॥

टि०—"यस्ततो जायते सोऽभिशस्तः" द्वारा तैत्तिरीय संहिता २.५. १ की ओर संकेत किया गया है, जिसमें रजस्वला स्त्री के विविध निषिद्ध कार्य करने पर उत्पन्न सन्तान में विविध शारीरिक दोषों का उत्पन्न होना निर्दिष्ट है ।

'यस्ततः' इत्यादिना 'प्रजायै गोपीथाय' इत्येवमन्तेन ब्राह्मणवाक्येन रजस्वलाया व्रतान्युक्तानि । तानि तया परिपालनीयानीत्यर्थः । तथा च वसिष्ठः—'त्रिरात्रं रजस्वलाऽशुद्धिर्भवैत् ! इत्येवमादिना प्रपञ्चितवान् ॥ ३३ ॥

वेदविक्रयिणं यूपं पतितं चितिमेव च ।
स्पृष्ट्वा समाचरेत्स्नानं श्वानं चण्डालमेव च ॥ ३४ ॥

वेद का विक्रय करने वाले व्यक्ति, यज्ञ के यूप, पतित, चिता, कुत्ता तथा चण्डाल का स्पर्श करने पर स्नान करे ॥ ३४ ॥

टि०—वेदविक्रय स्वर्ण आदि लेकर वेदप्रदान । पतित के उल्लेख से उपपातक से दूषित व्यक्तियों का भी अर्थ लिया जायगा ।

हिरण्यादिग्रहणपूर्वकं वेदप्रदानं बिक्रयो लक्षणया । चितियूपयोस्त्वपवृत्ते प्रयोगे स्पर्शनम् । पतितग्रहणमुपपातकानामप्युपलक्षणम् । श्वग्रहणं च सृगालादीनाम्, चण्डालग्रहणं प्रतिलोमानाम् ॥ ३४ ॥

रजस्वल्या संव्यवहारादिकं न कार्यम् । यदि तया सह सङ्गच्छेत तदा अभिशस्तादयः पुत्रा जायेरन् । या वा अभ्यञ्जनादिकं करोति अस्या दुश्चर्मादयस्सुता उत्पद्येरन् । अतः प्रजासंरक्षणार्थं पूर्वनिहस्तकर्माण्यकुर्वाणा दिनत्रयं व्रतमनुतिष्ठेदिति ।

वाक्यस्याऽयमर्थः—'यस्ततः' इत्यतः पूर्वं "यां मलवद्वाससं सम्भवन्ति" इति वाक्यम् मलवद्वासा रजस्वला । यदि रजस्वलां गच्छेत् पुरुषः, ततो यः पुत्र उत्पद्यते सः अभिशस्तादिर्भवतीति अभिशस्तो मिथ्यापवादग्रस्तः । अत्र सर्वत्राऽपि "तस्यै" इति षष्ठ्यर्थे चतुर्थी । अरण्ये तद्गमने तस्याः पुत्रः स्तेनो जायते । या पराङ्मुखी तस्याः पुत्रस्समायाँ ह्रीमान् । प्रथमदिनत्रयमध्ये स्नानेऽप्सु मरणशीलः, अभ्यञ्जने कुष्ठी, चित्रादिविलेखने केशहितः ( खल्वाटः ) अक्षणोरञ्जने काणः, दन्तधावने मलिनदन्तः, नखनिकृन्तने कुनखः, तृणादिच्छेदने ( क्लीबः ) षण्डः, रज्जुनिर्माणे उद्वन्धनमरणवान्, ह्रस्वपात्रेण पाने ह्रस्वकायश्च पात्रेणोदकपाने उन्मत्तः । अत उत्पत्स्यमानप्रजासंरक्षणायैव दिनत्रयावधिकमेतद् व्रतं रजस्वलायाऽवश्यमनुष्ठेयमिति ॥ अयमर्थो वासिष्ठेऽपि धर्मसूत्रे यथावत् स्पृष्टः ( cf वसिष्ठ. ध. अ. ५. ) तत्राऽपि द्रष्टव्यः ।

९२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ व्रणप्रायश्चित्तम्

ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूयशोणितसम्भवे ।
क्रिमिरुत्पद्यते तत्र प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥३५॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च क्रिमिदष्टः शुचिर्भवेत् ॥३६॥

यदि ब्राह्मण के मवाद और रक्त से भरे चोट या फोड़े पर क्रिमि उत्पन्न हो जाय तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से किया जायगा ? क्रिमि उत्पन्न होने पर गाय का मूत्र, गाय का गोबर, दूध, दधि, घृत, कुश के साथ ( उबाले गये ) जल तीन दिन स्नान कर पीने पर शुद्ध होता है ।

टि०— सूत्र में 'क्रिमिदष्टः' है । गोविन्द स्वामी के अनुसार यह नियम केवल क्रिमि के काटने पर ही नहीं, अपितु अपने शरीर में उत्पन्न क्रिमि के काटने पर है । अथवा यह प्रायश्चित्त फोड़े या चोट पर क्रिमि उत्पन्न होने की स्थिति में विहित है ।

नैतत्क्रिमिदंशनमात्रे चोद्यते । क्व तर्हि ? स्वशरीरोत्पन्नक्रिमिदंशे । इत-
-रथा प्रश्नोत्तरानुपपत्तेः । यद्वा—व्रणद्वारे क्रिमीणामुत्पत्तिमात्रे एतत्प्रायश्चित्तम्,
न दंशने ॥ ३५-३६ ॥

शुनोपहतस्सचेलोऽवगाहेत ३७ ॥

**अनु०—**कुत्ते के छू देने पर वस्त्रों को पहने हुए स्नान करे ॥ ३७ ॥
शुनोपहतः शुना स्पृष्टः नाभेरूर्ध्वमिति शेषः ॥ ३७ ॥

अथ वाऽऽह—
प्रक्षाल्य वा तं देशमग्निना संस्पृश्य पुनः प्रक्षाल्य पादौ चाऽऽ-
चम्य प्रयतो भवति ॥ ३८ ॥

अथवा जिस अंग का कुत्ते ने स्पर्श किया हो उसे धोकर फिर उसे अग्नि से स्पर्श कराये, पैरों को धोकर आचमन करने पर शुद्ध होता है ॥ ३८ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी ने उपर्युक्त वस्त्र सहित स्नान का नियम उस अवस्था के लिए बताया है जब कुत्ते ने नाभि से ऊपर स्पर्श किया हो । गौतम ने भी कुत्ते के स्पर्श पर वस्त्र सहित स्नान का प्रायश्चित्त बताया है, २. ५. ३०, पृ० १५३ ।
किन्तु अन्य आचार्यों का मत भी उद्धृत किया है जिनके अनुसार जिस अंग को छुए हों उसे धोने से ही शुद्धि हो जाती है यदुपहन्यादित्येके २. ५. ३१.
संभवतः गोविन्द स्वामी ने नाभि से ऊपर स्पर्श पर वस्त्रसहित स्नान का नियम जातूकर्ण्य की इस व्यवस्था के आधार पर निर्दिष्ट किया हो—