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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

About this granth

The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.

This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.

The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४५
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यः संयोगेभ्यो
द्व्यणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते, तस्मिंश्च रूपायुत्पत्तिसमकालं कारण-
गुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति ।
स्नेहोऽपां विशेषगुणः । संग्रहम्मृजादिहेतुः । अस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व-
निष्पत्तयः ।
इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और
मन के संयोग से (उन स्वतन्त्र परमाणुओं में) क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
इस क्रिया से (द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक) संयोग की
उत्पत्ति होती है । इस संयोग से द्व्यणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति
होती है । इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है,
उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है ।
केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण 'स्नेह' है । वह संग्रह सत्तू
प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का एवं मर्दन प्रभृति
क्रिया का हेतु है । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व
की तरह जाननी चाहिए ।
न्यायकन्दली
द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्यः, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रतिबन्धात् । तेजः-
संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्धमित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रति-
बन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरकादियत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शना-
दवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेर्भौमाग्निसंयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य, तद्
वह्निसंयोगादवगतम्, यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव ।
तस्मादिहापि दृष्टसामर्थ्यो वह्निसंयोग एव निमित्तमाश्रीयते ।
लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से (सांसिद्धिक) द्रवत्व का प्रतिरोध देखा जाता
है, अतः लवणरूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की
जनकता का अनुमान करते हैं । हिमकरकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण
को पिघलते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि लवण भी जलीय द्रव्य है । वह्नि
संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है । हिम-
करकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है, अतः समझते हैं कि
वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है । तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें
प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है, उसी वह्निसंयोग में हिमकरकादि के पिघलने की भी
कारणता स्वीकार कर लेते हैं ।

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६४६ न्यायन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-
प्रशस्तपादभाष्यम्
संस्कारस्त्रिविधः- वेगो भावना स्थितिस्थापकश्च ।
तत्र वेगो मूर्त्तिमत्सु पञ्चसु द्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात्
१. वेग, २. भावना और ३. स्थितिस्थापक भेद से संस्कार तीन
प्रकार का है । इनमें वेग मूर्त्तद्रव्यों में ही विशेष प्रकार के निमित्तकारणों
की सहायता से क्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है । वह (वेग) किसी
न्यायकन्दली
सांसिद्धिकं द्रवत्वं व्याख्याय नैमित्तिकं व्याचष्टे-नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्नि-
संयोगजमिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टः समुपपादयति-सर्पिरित्यादिना । सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां
पार्थिवानां कारणेषु परमाणुष्वग्निसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यो विभागेभ्यः
सर्पिराद्यारम्भकसंयोगविनाशात् सर्पिरादिद्रव्यनिवृत्तौ सत्यां स्वतन्त्रेषु परमाणुषु वह्नि-
संयोगाद् द्रवत्वमुत्पद्यते । तदनन्तरमुत्पन्नद्रवत्वेषु परमाणुषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्म-
परमाणुसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यः परमाणुनां परस्परसंयोगेभ्यो द्व्यणुकादि-
प्रक्रमेण कार्यद्रव्ये जाते रूपाद्युत्पत्तिकाल एव कारणद्रवत्वेभ्यो द्रवत्वमुत्पद्यते ।
हिमकरकादिविलयनेऽप्येवमेव न्यायः ।
स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । । संग्रहः परस्परमयुक्तानां
सांसिद्धिक द्रवत्व की व्याख्या करने के बाद 'नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्नि-
संयोगजम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब क्रमप्राप्त नैमित्तिक द्रवत्व की व्याख्या
करते हैं । 'कथम्' अर्थात् नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, किसी
अज्ञ के द्वारा यह पूछे जाने पर 'सर्पिः' इत्यादि से उस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
घृत, लाह एवं मोम प्रभृति (नैमित्तिक द्रवत्व वाले पार्थिव अवयवी द्रव्यों के)
कारणीभूत परमाणुओं में अग्नि के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, क्रियाओं से
परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । कर्मजनित इन विभागों से परमाणुओं में
रहनेवाले (द्व्यणुकों के) उत्पादक पूर्वसंयोगों का नाश होता है । इन संयोगों के
विनाश से घृतादि अवयवी द्रव्यों का परमाणुपर्यन्त विनाश हो जाता है । इस
प्रकार उन परमाणुओं के स्वतन्त्र हो जाने पर इन स्वतन्त्र परमाणुओं में वह्नि के
संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । भोगजनक अदृष्ट की सहायता से आत्मा
और परमाणु के संयोग से (द्रवत्वयुक्त) परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
फिर परमाणुओं के कर्मजनित इन संयोगों से द्व्यणुकादि क्रम से कार्य द्रव्यों की
उत्पत्ति होती है, फिर आगे के क्षण में रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी क्षण
में समवायिकारणों में रहनेवाले द्रवत्वों से कार्यद्रव्यों में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ।
हिमकरकादि में द्रवत्वविलय के प्रसङ्ग में भी इसी रीति का अनुसरण करना चाहिए ।
'स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः' । 'संग्रह' उस विशेष प्रकार के संयोग
का नाम है, जिससे परस्पर असंयुक्त सत्तू प्रभृति द्रव्यों का गोला बन जाता है ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मणो जायते नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगविशेषविरोधी क्वचित्
कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते ।
भावनासंज्ञकस्त्वात्मगुणो दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतिप्रत्य-
भिज्ञानहेतुर्भवति ज्ञानमददुःखादिविरोधी । पट्वभ्यासादरप्रत्ययजः ।
नियमित देश में ही क्रियासमूह का कारण है । स्पर्श से युक्त द्रव्यों का
विशेष प्रकार का संयोग उसका विनाशक है । कहीं वह अपने आश्रय
के समवायिकारण में रहनेवाले वेग से भी उत्पन्न होता है ।
पहले देखे हुए, सुने हुए एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की
स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का कारणीभूत संस्कार ही 'भावना' है । ज्ञान,
मद एवं दुःखादि से उसका नाश होता है । पटु, अभ्यास, आदर और
न्यायकन्दली
सक्त्यादीनां पिण्डीभावप्राप्तिहेतुः संयोगविशेषः । मृजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धिः ।
आदिशब्दान्मृदुत्वं च, तेषां हेतुः । स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । गुरुत्वं च
परमाणुषु नित्यम्, कार्ये च कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनाशि, तथा स्नेहोऽपीति ।
संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । तत्र वेगो मूर्ति-
मत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । पञ्चसु द्रव्येषु पृथिव्य-
प्तेजोवायुमनस्सु कर्म वेगं करोति नान्यत्र, स्वयमभावात् । नोदनाभिघातादि-
'मृजा' शब्द से शरीर की वह शुद्धि अभिप्रेत है, जो शरीर में (उबटन प्रभृति के)
मर्दन से प्राप्त होती है । आदि शब्द से मृदुत्वादि को समझना चाहिए । 'स्नेह' इन
सबों का कारण है । 'स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् गुरुत्व जिस
प्रकार परमाणुओं में नित्य है, उसी प्रकार स्नेह भी परमाणुओं में नित्य है । जिस
प्रकार कार्यद्रव्य में 'गुरुत्व' कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश
से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कार्यद्रव्य में स्नेह भी कारणगुणक्रम से
उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है ।
"संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति, तत्र वेगो मूर्त्तिमत्सु
पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते" । पाँच द्रव्यों में अर्थात्
पृथिवी, जल तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में क्रिया से वेग की
उत्पत्ति होती है, और किसी वस्तु में नहीं, क्योंकि इन पाँच द्रव्यों को छोड़-
कर क्रिया स्वयं अन्यत्र कहीं नहीं है । क्रिया को वेग के उत्पादन में नोदन
या अभिघात प्रभृति कारणों का साहाय्य आवश्यक है, वह स्वतन्त्र होकर
केवल अपन ही बल से वेग का उत्पादन नहीं कर सकती; क्योंकि मन्दगति-

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६४८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारातिशयो जायते ।
यथा दाक्षिणात्यस्योष्ट्रदर्शनादिति । विद्याशिल्पव्यायामादिष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्ने-
वार्थे पूर्वपूर्वसंस्कारमपेक्षमाणादुत्तरोत्तरस्मात् प्रत्ययादात्ममनसोः संयोगात्
संस्कारातिशयो जायते ।
ज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है । पटु (अनुपेक्षात्मक) ज्ञान एवं आत्मा
और मन के संयोग से अद्भुत विषयों में 'पटु' नाम के विशेष प्रकार
के संस्कार की उत्पत्ति होती है । जैसे कि दक्षिण देश के रहनेवाले को
ऊँट के देखने से (ऊँट का पटु संस्कार होता है) । विद्या, शिल्प एवं
व्यायाम प्रभृति वस्तुओं का बार-बार अभ्यास करते रहने से उन्हीं
विषयों के पूर्व-पूर्व संस्कारों से उत्पन्न प्रतीतियों (स्मृतियों) के कारण आत्मा
और मन के संयोग से एक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
निमित्तविशेषापेक्षं न केवलम्, मन्दगतौ वेगाभावात् । नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः ।
यदिगाभिमुख्येन क्रियया वेगो जन्यते तद्दिगभिमुखतयैव क्रियासन्तानस्य हेतुरित्यर्थः ।
स्पर्शवदिति । विशिष्टेन स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगेनात्यन्तनिबिडावयववृत्तिना वेगो विनाश्यते,
यः स्वयं विशिष्टः । मन्दस्तु वेगः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगमात्रेण विनश्यति, यथातिदूरं
गतस्येषोस्तत्तमितवायुप्रतिबद्धस्य । क्वचिदिति । बाहुल्येन तावद्वेगः कर्मजः, क्वचिद्
वेगवदवयवारब्धे जलावयविनि कारणवेगेभ्योऽपि जायते ।
भावनेत्यादि । भावनासंज्ञकस्तु संस्कार आत्मगुणः । दृष्टश्रुतानुभूते-
रूप क्रिया के रहने पर भी वेग की उत्पत्ति नहीं होती है । 'नियतदिक्क्रिया-
प्रबन्धहेतुः' वेग नियत दिशा में ही क्रियासमूह का उत्पादक है । अर्थात् जिस दिशा
की तरफ क्रिया से वेग उत्पन्न होता है, उसी दिशा की तरफ क्रियासमूह को वेग
उत्पन्न करता है । 'स्पर्शवदिति' स्पर्श से युक्त द्रव्य के विशेष प्रकार के एवं निविड़
अवयव के द्रव्य में रहनेवाले संयोग से तीव्र वेग का विनाश होता है । मन्द वेग
का विनाश तो स्पर्श से युक्त किसी भी द्रव्य के संयोग से हो जाता है, जैसा कि
अन्यत्र दूर गये हुए बाण के वेग का विनाश मन्द गति के वायु से भी हो जाता
है । 'क्वचिदिति' अर्थात् अधिकांश वेगों की उत्पत्ति तो क्रिया से ही होती है;
किन्तु कुछ वेगों की उत्पत्ति आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले वेग से भी
होती है, जैसे कि जल में कारणगुणक्रम से भी वेग की उत्पत्ति होती है ।
'भावनेत्यादि' अर्थात् भावना नाम का जो संस्कार वह आत्मा का गुण है ।
'दृष्टानुभूतेषु' इस वाक्य के द्वारा इस संस्कार से उत्पन्न होनेवाले कार्यों को दिखलाया

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१
न्यायकन्दली
ष्यिति दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतेः प्रत्यभिज्ञानस्य च हेतुरिति तस्य कार्यकथनम् ।
दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विपर्ययावगतोऽप्यर्थो बोद्धव्यः, तत्रापि स्मृतिदर्शनात् । ज्ञानेति ।
प्रतिपक्षज्ञानेन संस्कारो विनाश्यते । द्यूतादिव्यसनापन्नस्य पूर्वाधीतविस्मरणात्। मदेनापि
संस्कारस्य विनाशः, सुरामत्तस्य पूर्वस्मृतिलोपात् । मरणादिदुःखादपि संस्कारो विनश्यति,
जन्मान्तरानुभूतस्मरणाभावात् । आदिशब्देन सुखादिपरिग्रहः, भोगासक्तस्य कुपितस्य वा
पूर्ववृत्तस्मृत्यभावात् । पट्वभ्यासेति । पटुप्रत्ययादभ्यासप्रत्ययादादरप्रत्ययाच्च संस्कारो
जायते । पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते ।
यथेति । उष्ट्रो दाक्षिणात्यस्यात्यन्ताननुभूतकारतयाश्चर्यभूतोऽर्थः । तद्दर्शनात्
तस्य पटुः संस्कारो जायते, कालान्तरेऽप्युष्ट्रानुभवस्मृतिजननात् । अभ्यास-
प्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - विद्याशिल्पेत्यादि । विद्या शास्त्रागमादिका, शिल्पं
पत्रभङ्गादिक्रिया, व्यायाम आयुधादिश्रमः, तेष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे
गया है कि इससे प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थ की स्मृति और
प्रत्यभिज्ञान नाम का विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है । 'दृष्टानुभूतेषु' इस पद से
(केवल प्रत्यक्षप्रमा और अनुमानप्रमा के द्वारा ज्ञात अर्थ ही नहीं, किन्तु) विपर्यय
के द्वारा ज्ञात अर्थों का भी ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि उनके विषयों की भी
स्मृति होती हैं । 'ज्ञानेति' विरोधी ज्ञान से संस्कार का विनाश होता है; क्योंकि
जूआ प्रभृति (द्यूतादि) व्यसनों में लगे हुए व्यक्ति को पहले के अधीत विषयों का
विस्मरण हो जाता है । मद से भी संस्कार का विनाश होता है; क्योंकि सुरापान
से मत्त व्यक्ति की पूर्वस्मृति का लोप देखा जाता है । मरणादि दुःखों से भी
संस्कार का नाश होता है; क्योंकि दूसरे जन्म की बातों का स्मरण नहीं होता ।
('ज्ञानमददुःखादि' पद में प्रयुक्त) 'आदि' पद से सुखादि का ग्रहण करना चाहिए;
क्योंकि भोग में आसक्त पुरुषों को या अत्यन्त क्रुद्ध पुरुषों को पहले की बातों की
विस्मृति हो जाती है । 'पट्वभ्यासेति' पटुप्रत्यय से, अभ्यासप्रत्यय से एवं आदर-
प्रत्यय से संस्कार की उत्पत्ति होती है। 'पटुप्रत्ययादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे
पटुः संस्कारो जायते यथेति' ।
(दक्षिण देश में ऊँट नहीं होता, अतः) दाक्षिणात्यों को ऊँट का कभी अनुभव
रहता, अतः कभी देखने पर अत्यन्त आश्चर्य होता है, जिससे ऊँट को एक बार
देखने पर भी उसे ऊँटविषयक 'पटुसंस्कार' ही उत्पन्न होता है । अतः बहुत दिनों
के बाद भी ऊँट की उन्हें स्मृति होती है । विद्याशिल्पेत्यादि' इस सन्दर्भ के द्वारा
अभ्यासप्रत्यय से उत्पन्न संस्कार का निरूपण किया गया है । इस सन्दर्भ के 'विद्या'
शब्द से शास्त्र एवं आगम प्रभृति अभिप्रेत हैं । 'शिल्प' शब्द से 'पत्रभङ्गादि'
क्रियाओं को समझना चाहिए । 'व्यायाम' शब्द से अस्त्रशस्त्रादि चलाने का श्रम लेना
चाहिए । इन सबों का अभ्यास करने पर 'तस्मिन्नेवार्थे' अर्थात् पहले अनुभूत उसी
अर्थ में (संस्कार की उत्पत्ति होती है) । 'पूर्वपूर्वत्यादि' यतः वह संस्कार बहुत दिनों

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६५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-
न्यायकन्दली
पूर्वगृहीते । पूर्वैरित्यादि । यतः सुचिरमनुवर्तते, स्फुटतरं च स्मरणं करोति । न ह्याद्यानुभव
एव संस्कारविशेषमाधत्ते, प्रथमं तदर्थस्मरणाभावात् । नायुत्तर एव हेतुः, पूर्वाभ्यास-
वैयर्थ्यात् । तस्मात् पूर्वसंस्कारापेक्षोत्तरोत्तरानुभवाहिताधिकाधिकसंस्कारोत्पत्तिक्रमेणोपान्त्य-
संस्कारापेक्षादन्त्यानुभवात् तदुत्पत्तिः ।
इदं त्विह निरूप्यते । विद्यायामभ्यस्यमानायां किं तदर्थो वाक्येन प्रतिपाद्यते ? किं
वा स्फोटेन ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः । एके वदन्ति स्फोटादर्थं प्रतिपादयतीति ।
अपरे त्याहुर्वाक्यं प्रत्यायकमिति । अतो युक्तः संशयः । किं तावत्प्राप्तम् ?
स्फोटोऽर्थप्रत्यायक इति । यदि हि वर्णानतिरिक्तं पदम्, पदानतिरिक्तं च वाक्यम्,
तदार्थप्रत्यय एव न स्यादिति । तथा हि न वर्णाः प्रत्येकमर्थविषयां धियमाविर्भावयन्ति,
शेषवर्णवैयर्थ्यात् । समुदायश्च तेषां न सम्भवति, अन्त्यवर्णग्रहणसमये पूर्वेषामसम्भवात् ।
नित्यत्वाद् वर्णानामस्ति समुदाय इति चेत् ? तथापि न तेषां प्रतीतिरनुवर्तते,
अप्रतीयमानानां च प्रत्यायकत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । न हि प्रतीत्य अप्रतीयमानानां सर्वथा
अप्रतीयमानानां च कश्चिद् विशेषः । पूर्वावगता वर्णाः स्मृत्यारूढाः प्रतीतिहेतव
तक रहता है एवं अत्यन्त स्पष्ट स्मृति का उत्पादन करता है। पहले बार के ही
अनुभव से विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि उस संस्कार से स्मृति की
उत्पत्ति नहीं होती है । केवल आगे के अनुभव ही संस्कार के उत्पादक नहीं हैं;
क्योंकि (ऐसा मानने पर) पहले के सभी अभ्यास व्यर्थ हो जायेंग । 'तस्मात्' पूर्व
संस्कार से युक्त आत्मा में आगे के अनुभवों से संस्कारों की उत्पत्ति की धारा चलती
है, इस प्रकार उपान्त्य (अर्थात् अन्तिम संस्कार से अव्यवहितपूर्व वृत्ति) संस्कार
की सहायता से अन्तिम अनुभव के द्वारा विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति होती है ।
इस प्रसङ्ग में इस विषय का विचार उठाता हूँ कि शास्त्र या आगमरूप कथित
विद्या के अभ्यास से जो उनके अर्थों का प्रतिपादन होता है, वह वाक्य से उत्पन्न होता
है ? या स्फोट से उत्पन्न होता है ? (प्र) यह संशय ही उपस्थित क्यों हुआ ? (उ.)
परस्पर विरोधी मतों के कारण संशय उपस्थित होता है । किसी सम्प्रदाय के लोग
कहते हैं कि स्फोट से अर्थ की प्रतीति होती है । दूसरे सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि
वाक्य से ही अर्थ का बोध होता है । तो फिर इस प्रसङ्ग में क्या होना उचित है ?
(प्र.) स्फोट से ही अर्थ की प्रतीति उचित है; क्योंकि पदों का समूह ही वाक्य है; एवं
वर्णों का समूह ही पद है, इस वस्तुस्थिति के अनुसार वाक्य के अर्थबोध का होना
सम्भव नहीं है । (विशदार्थ यह है कि वाक्य के ) हर एक वर्ण अर्थविषयक बोध
के उत्पादक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा मानने पर उनमें से किसी एक ही वर्ण से अर्थ-
विषयक बोध का सम्पादन हो जाएगा, फिर अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो
जाएगा । वर्णों का एक समुदाय होना सम्भव ही नहीं है; क्योंकि अन्तिम वर्ण के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५१
न्यायकन्दली
इति चेत् ? यदि हि स्मृतिरपि क्रमभाविनी ? तदा नास्ति वर्णसाहित्यम्, तृतीयवर्ण-
ग्रहणकाले प्रथमवर्णस्मृतिविलोपात्, युगपदुत्पादस्तु स्मृतीनामनाशङ्कनीय एव, ज्ञानयौग-
पद्यप्रतिषेधात् ।
अथ प्रथममाद्यवर्णज्ञानम्, तदनु संस्कारः, तदनु तृतीयवर्णज्ञानम्, तेन प्राक्तनेन संस्का-
रेणान्यो विशिष्टः संस्कारो जन्यत इत्यनेन क्रमेणान्ते निखिलवर्णविषयः संस्कारो जातो
निखिलवर्णविषयामेकामेव स्मृतिं युगपत् करोतीत्याश्रीयते, तदा क्रमो हीयते । क्रमो हि पौर्वाप-
र्यम्, तच्च देशनिबन्धनं कालनिबन्धनं वा स्यात्, उभयमपि तद्वर्णेषु नावकाशं लभते, तेषां सर्व-
प्रत्यक्ष के समय पूर्व के सभी वर्णों का रहना सम्भव नहीं है । (प्र.) वर्ण तो नित्य
हैं, अतः सभी समयों में उनकी सत्ता सम्भावित है सुतरां वर्णों का समुदाय असम्भव
नहीं है । (उ.) फिर भी किसी एक समय में सभी वर्णों का ग्रहण सम्भव नहीं है ।
वर्ण गृहीत होकर ही अर्थप्रत्यय के कारण हैं । यदि वर्ण स्वरूपतः अर्थप्रत्यय के
कारण हों, तो फिर उनसे सर्वदा अर्थ की प्रतीति होनी चाहिए; क्योंकि एक बार
ज्ञात वर्ण के अज्ञान में और वर्णों के सर्वथा अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है ।
अतः इस प्रकार भी वर्णसमूह से सर्वप्रत्यय का उपपादन नहीं किया जा सकता ।
(प्र.) पद या वाक्य के जितने वर्ण पहले ज्ञात हैं, वे सभी पुनः स्मृतिपथ में
आकर अर्थबोध का उत्पादन करते हैं । (उ.) (इस प्रसङ्ग में पूछना है कि पद या
वाक्य के प्रत्येक वर्ण की अलग-अलग स्मृति होती है ? या सभी वर्णों का एक ही
स्मरण होता है ?) इनमें यदि यह प्रथमपक्ष मानें कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण
की स्मृति क्रमशः होती है, तो फिर स्मृति में भी वर्णों का एकत्र होना सम्भव नहीं
है; क्योंकि तीसरे वर्ण की स्मृति के समय प्रथम वर्ण की स्मृति अवश्य ही विनष्ट
हो जाएगी । प्रत्येक वर्णविषयक सभी स्मृतियों का एक ही समय उत्पन्न होना तो
सम्भव ही नहीं है; क्योंकि एक समय अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
यदि इस प्रकार की कल्पना करें कि (प्र.) पहले प्रथम वर्ण का ज्ञान होता है,
उसके बाद उस वर्णविषयक संस्कार की उत्पत्ति होती है, उसके बाद तृतीय वर्ण
का ज्ञान, इसके बाद उसी क्रम से पहले-पहले के संस्कारों से अन्तिम वर्णविषयक
विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । अन्त में सभी वर्णों के इस एक ही
संस्कार से एक ही समय सभी वर्णविषयक एक ही स्मृति की उत्पत्ति होती है ।
(उ.) तो फिर वर्णों में क्रम ही नहीं रह जाएगा; क्योंकि पूर्वापरीभाव (एक के
बाद दूसरा) को ही क्रम कहते हैं । यह क्रम दो प्रकारों से सम्भव है- (१)
देशमूलक और (२) कालमूलक । वर्णों में इन दोनों में से एक भी प्रकार के क्रम
की सम्भावना नहीं है; क्योंकि वर्ण व्यापक हैं, इसलिए दैशिक पूर्वापरीभाव-
रूप क्रम सम्भव नहीं है । वर्ण नित्य (अविनाशी) हैं, इसीलिए कालिक पूर्वापरीभाव
की सम्भावना भी नहीं है । अतः वर्णों में क्रम की उपपत्ति का एक ही मार्ग बच

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६५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट-
न्यायकन्दली
गतत्यान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत्, स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ
परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणांमेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं
नदी दीनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्यात्, वर्णानामभेदात्, क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्याच्च । अस्ति
चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्यमानः ? तर्हातिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः ।
ननु स्फोटोऽपि नानभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति, सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभि-
व्यक्तिश्च न तस्य वर्णैभ्यः सम्भवति, उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां वासा-
मर्थ्यात्, तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः ।
अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णा-
त्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते
स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमितनिखिलवर्णविभागोल्लेखक्रमम-
जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें; किन्तु सभी वर्णों का एक
ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह
आपत्ति आ खड़ी होती है कि 'बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है' ।
जिससे 'सर' शब्द से और 'रस' शब्द से, एवं 'वन' शब्द से और 'नव' शब्द से
अथवा 'नदी' शब्द से और 'दीन' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी;
क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं, क्रम को बोध का करण मान नहीं सकते;
किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता
है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति
स्फोट के बिना नहीं हो सकती, अतः 'स्फोट' का मानना आवश्यक है ।
(प्र.) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थविषयक बोध का उत्पादन कर सकता
है, यदि ऐसा न मानें, स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा
अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी । (अब यह देखना है कि स्फोट की
अभिव्यक्ति किससे होती है ?) वर्णों से स्फोट की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है;
क्योंकि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे, तो
अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जायेंगे । यदि वर्णसमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति
मानें, तो सो भी सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य
सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है ।
इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि
स्फोट पहले से ही रहते हैं; किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं; किन्तु तत्तद्वर्णों के
उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न (कौष्ठ्य) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त
स्फोट को ही पहले तत्तद्वर्ण स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात्
अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अतिस्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती
हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग-अलग स्वरूप नहीं रह जाते
एवं वर्णों का अलग-अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता, इन सबों से अलग

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३
न्यायकन्दली
नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि-
निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति च व्यपदेशो न
घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासइत्यादिषु
पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य
संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्वं वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूपसंवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य
मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति 'नायं वर्णः, किन्तु
स्फोटः' इति । या चेयमेकार्थावमर्शिनी बुद्धिः, सापि नार्थान्तरमवभासयति किन्तु वन-
एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थतत्त्व का बोध होता है । यदि वर्णों का
समुदाय ही पद हो (वर्णों का कोई एक स्फोट न हो) तो फिर पद में एकत्व की
प्रतीति न हो सकेगी, अतः 'एकं पदम्' इत्यादि बुद्धियाँ निर्विषयक हो जायेंगी ।
एवं 'शब्दाद् अर्थं प्रतिपद्यामहे' (एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं)
यह व्यवहार न हो सकेगा (किन्तु 'बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं' इस
प्रकार का व्यवहार होगा) । अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, जिससे अर्थ
'प्रस्फुटित' होता है (उसी की अन्वर्थसंज्ञा 'स्फोट' है ) ।
इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों
का कहना है कि 'गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासः' (अर्थात् पाण्डुदास
कायस्थ कुल के तिलकरूप हैं एवं गुणरूपी रत्न ही उनके भूषण हैं) इन सब
वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती
है; किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी (स्फोट रूप) अर्थ का
भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है,
वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्णरूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का
स्फोटत्वरूप से भान होता है । (उ.) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को
मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णविषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही
मानना पड़ेगा । (किन्तु आगे) यह बाधज्ञान भी नहीं होता कि 'ज्ञात होनेवाला
यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती
है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे
कि 'यह वन है' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र वन नाम की
कोई वस्तु नहीं है । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य
का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मानकर किया जाता है ।
प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव है, उस (स्फोट) का अन्य
प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय

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६५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट-
न्यायकन्दली
प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रमवलम्बते । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति वर्णसमुदायमेवोरी-
कृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते ।
न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपायाभावात् ।
अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटोऽर्थाधिगमे हेतुः
समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः ।
प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति, तेनैषामेव
वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगन-
कुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्तृभेदे व्यवधाने
च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । न हि ते विपरीतक्रमाः कर्तृभेदानुपातिनो देशकालव्यवहितास्त-
दर्थधियः कारणम्, कार्योन्नेया हि शक्तयो भावानाम्, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव
तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपद्दिशन्ति सन्तः -
यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ।
ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में ही उसके अन्वय और व्यतिरेक का
आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूँढ़
निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इसके लिए आकाश-कुसुम की तरह
सर्वथा अप्रतीत होनेवाले किसी (स्फोट रूप) अर्थ की कल्पना की जाय । (वर्णों से
ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि
(प्र.) (वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो) (१) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों
से अर्थात् रस सर, वन नव, नदी दीन प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक
बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण हैं । (२) एवं विभिन्न
कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से (अर्थात् देवदत्त से उच्चरित 'घ' और
यज्ञदत्त से उच्चरित 'ट' शब्द से घटविषयक) बोध की आपत्ति होगी । एवं (३)
व्यवहित वर्णों से (अर्थात् 'घ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण
और उसके बाद उच्चरित 'ट' वर्ण से) घटविषयक बोध की आपत्ति होगी । (उ.)
ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित या विभिन्न कर्त्ताओं
से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण
ही नहीं मानते; क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह
केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के
कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना
जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि "जितने एवं जिन वर्णों के
जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य (कार्य से) निश्चित है,

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५
न्यायकन्दली
सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः । अत एव नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः,
क्रमभेदात् । वर्णेषु क्रमो नास्ति स कथमेषामङ्गं स्यादिति चेत्, न, तेषामुत्पत्तिभाजा-
मव्याप्यवृत्तीनां देशकालकृतस्य पौर्वापर्यस्य सम्भवात् । यच्चेदमूक्तम्- प्रत्येकशः समुदितानां
च न सामर्थ्यमिति, तदपि न परस्य मतमालोचितम् । यद्यपि वर्णा अनवस्थायिनस्त-
थापि तद्विषयाः क्रमभाविनः संस्काराः सम्भूय पदार्थधियमातन्वते । यद्वा पूर्ववर्ण-
वे ही वर्ण उसी विन्यास-क्रम से उस अर्थ के बोधक हैं।"
अत एव इसी क्रमभेद के कारण नदी शब्द से और दीन शब्द से विभिन्न
विषयक बोध होते हैं । (प्र.) वर्ण नित्य और व्यापक हैं, अतः उनका क्रम ही सम्भव
नहीं है, फिर शब्दों का क्रम शब्दबोध का अङ्ग कैसे होगा ? (उ.) 1 नहीं, ऐसी
बात नहीं है; क्योंकि वर्ण उत्पत्तिशील हैं और अव्याप्यवृत्ति हैं (अर्थात् अपने
आश्रयीभूत आकाश में कहीं किसी प्रदेश में रहते हैं और किसी प्रदेश में नहीं)
अतः उनमें कालिक और दैशिक दोनों ही प्रकार के क्रम हो सकते हैं । यह जो
कहा गया था कि (प्र.) पद या वाक्यघटक प्रत्येक वर्ण में अर्थबोध की हेतुता
मानने से अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा एवं वर्णों के समुदाय में
अर्थबोध की जनकता सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों की कहीं एकत्र स्थिति
ही सम्भव नहीं है फिर उनका समुदाय ही कैसा ? इस प्रकार वर्ण न प्रत्येकशः ही
अर्थबोध के कारण हो सकते हैं, न समूहापन्न होकर ही (अतः स्फोट ही अर्थबोध

  1. यहाँ मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक का पाठ कुछ अशुद्ध और व्यस्त मालूम पड़ता है । 'एवं
    प्राप्तेऽभिधीयते' इत्यादि वाक्यों से स्फोट का खण्डन और 'वाक्य से ही अर्थबोध की
    उत्पत्ति का सिद्धान्त' उपपादित हुआ है, जिसका उपसंहार 'यावन्तो यादृशाः' इत्यादि
    श्लोकवार्त्तिक के श्लोक को उद्धृत कर किया गया है । इसके बाद 'सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च
    वर्णानां क्रमभावः' ऐसी पङ्क्ति है । यहीं कुछ त्रुटि मालूम होती है; क्योंकि वर्णों का
    सर्वगतत्व उनके क्रमभाव का बाधक है, जिसका अनुपद ही 'क्रमो हि पौर्वापर्यम्' इत्यादि
    से उपपादन किया गया है । तदनुसार वर्णों का असर्वगतत्व और अनित्यत्व ये ही वर्णों के
    क्रमभाव के ज्ञापक होंगे । अतः उक्त पङ्क्ति को यदि सिद्धान्तपक्षीय मानें तो
    'सर्वगतत्वात्' इत्यादि पाठ के स्थान पर उसके विरुद्ध 'अनित्यत्वादसर्वगतत्वाच्च वर्णानां
    क्रमभावः' ऐसा पाठ मानना पड़ेगा । दूसरा उपाय वह है कि उक्त पङ्क्ति को
    सिद्धान्तपक्षीय न मानकर पूर्वपक्षीय ही मान लें और उस वाक्य के 'क्रमभावः' इस पद
    को 'क्रमाभावः' में परिवर्तित कर दें । तदनुसार "सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमाभावः
    अत एव" इतने अंश को 'वर्णेषु क्रमो नास्ति' इस पूर्वपक्षवाक्य के पहले पाठ करें
    एवं 'यावन्तो यादृशा ये च' इस श्लोक के नीचे सिद्धान्त पक्ष का 'नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः
    क्रमात्' इतना ही रक्खें । इनमें द्वितीय पक्ष के अनुसार ही मैंने अनुवाद किया है ।
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६५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नेन मनश्चक्षुषि स्थापयित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युतस्-
प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने
न्यायकन्दली
संस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः, यथा चानेकसंस्काराः सम्भूय
स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्कारादर्थप्रतीतिरयुक्ता,
संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषयानेव स्मृतिमाधातुमीशते न
कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ-
संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः ।
फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धीर्न कल्प्यते ॥ इति ।
तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभवैराधीय-
माना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कारविलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते,
के कारण हैं, वर्ण नहीं) । (उ.) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण
माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है । यह
ठीक है कि वर्ण चिरस्थायी नहीं हैं (क्षणिक हैं), फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी
संस्कार मिलकर पदार्थविषयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह
सकते हैं कि पहले-पहले वर्ण के संस्कार अथवा पहले-पहले वर्ण की स्मृति इन
दोनों में से किसी एक के साहाय्य से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान
सकते हैं । अनेक संस्कार मिलकर एक ही स्मरण का जिस रीति से सम्पादन
करते हैं, वह रीति द्वित्वनिरूपण के प्रसङ्ग में लिख आये हैं । यदि यह कहना
चाहते हों कि (प्र.) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी, वह
संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, जिससे एक विषयक
संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः
वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोधरूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी ?
(क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्णविषयक स्मृतिरूप कार्य ही उत्पन्न हो
सकता है) । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने 'स्फोटसिद्धि' नामक ग्रन्थ में कहा
है कि 'संस्कार जिन विषयों की 'प्रख्या' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे, उन्हीं विषयों
में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं, अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक
'धी' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । (उ.) किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है;
क्योंकि (अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का
नियम यद्यपि ठीक है; तथापि) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर
एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है, वह संस्कार स्मृति
के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है, जिस संस्कार में
पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है, उस संस्कार के कार्य

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७
प्रशस्तपादभाष्यम्
म्पातदर्शनयदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो
जायते । यथा देवह्रदे रजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति ।
की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष
वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और
मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है ।
जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से
(विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) ।
न्यायकन्दली
तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ-
प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ-
प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र-
कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः -
यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् ।
कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति ।
तदेवं वर्णेभ्य एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति ।
से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनाख्य संस्कार है
(जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है),
तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ
का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई
स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना
और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो
कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में
अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि
वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव
की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि
न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार
स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं
किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा
अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७
प्रशस्तपादभाष्यम्
म्पातदर्शनवदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो
जायते । यथा देवह्रदे राजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति ।
की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष
वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और
मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है ।
जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से
(विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) ।
न्यायकन्दली
तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ-
प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ-
प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र-
कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः -
यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् ।
कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति ।
तदेवं वर्णेष्व एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति ।
से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनारूप संस्कार है
(जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है),
तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ
का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई
स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना
और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो
कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में
अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि
वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव
की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि
न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार
स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं
किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा
अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९
प्रशस्तपादभाष्यम्
भुग्नसंवर्तितेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं संलक्ष्यते । नित्यानित्यत्व-
निष्पत्तयोऽस्यापि गुरुत्ववत् ।
कार्यरूप धनुष, शाखा, शृङ्ग, दाँत, अस्थि, सूत्र एवं वस्त्र प्रभृति वस्तुओं
को सीधा होने पर लक्षित होता है । गुरुत्व के सदृश ही इसके नित्यत्व
और अनित्यत्व के प्रसङ्ग में भी जानना चाहिए ।
न्यायकन्दली
माख्यातुं तुशब्दः । ये घना निविडा अवयवसंनिवेशविशिष्टेषु स्पर्शवत्सु द्रव्येषु
वर्तमानः स्थितिस्यापकः स्वाश्रयमन्यथाकृतमवनमितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुं
करोति । ये प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भात् स्थितिस्यापकस्याभावमिच्छन्ति तान् प्रति तस्य कार्येण
सद्भावं दर्शयन्नाह-स्थावरजङ्गमविकारेष्विति । भुग्नाः कुब्जीकृताः संवर्तिताः पूर्वावस्थां
प्रापिताः, भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्चेति भुग्नसंवर्तिताः, तेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं
लक्ष्यते । किमुक्तं स्यात् ? धनुःशाखादिष्ववनमितविमुक्तेषु यत् पूर्वावस्थाप्राप्तिहेतोराद्यस्य
कर्मण एकार्थसमवेतमसमवायिकारणं स स्थितिस्यापकः संस्कारः, अन्यस्यासम्भवात् ।
अन्ये तु भुग्नसंवर्तितेष्विति सूत्रवस्त्रादिष्विति अस्यैव विशेषणमिति मन्यमाना भुग्नानि
संस्कार स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण है, आश्रयों के (अस्पर्शवत्त्व और स्पर्शवत्त्व)
इन दोनों अन्तर के द्वारा दोनों संस्कारों में अन्तर दिखलाने के लिए प्रकृत
सन्दर्भ में 'तु' शब्द का प्रयोग किया गया है । अवयवों के 'घन' अर्थात् कठिन
संनिवेशयुक्त स्पर्शवाले द्रव्य में विद्यमान 'स्थितिस्यापक' संस्कार 'अन्यथाकृत'
अर्थात् नमाये हुए अपने आश्रयभूत द्रव्य को 'यथावत्स्थापन' अर्थात् पहले की तरह
सीधा कर देता है । जो समुदाय प्रत्यक्ष न होने के कारण 'स्थितिस्यापक' संस्कार
को मानना ही नहीं चाहते, उन्हें कार्यहेतुक अनुमान के द्वारा स्थितिस्यापक
संस्कार की सत्ता को समझाने के लिए ही 'स्थावरजङ्गमविकारेषु' इत्यादि सन्दर्भ
लिखा गया है । 'भुग्न' शब्द का अर्थ है टेढ़ा किया हुआ (तिर्यक्कृत) और
'संवर्तित' शब्द का अर्थ है पहली अवस्था को प्राप्त । प्रकृत सन्दर्भ का 'भुग्न-
संवर्तितेषु' पद 'भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्च भुग्नसंवर्तिताः, तेषु' इस प्रकार के
समास से निष्पन्न है । इस शब्द के द्वारा स्थितिस्यापक संस्कार से उत्पन्न कार्य
दिखलाये गये हैं । इससे फलितार्थ क्या निकला ? यही कि धनुष या वृक्ष की
डाल प्रभृति जब अवनमित होकर फिर जिन क्रियाओं के द्वारा पहली अवस्था
को प्राप्त होते हैं, उन क्रियाओं में से पहली क्रिया का असमवायिकारण एवं उस
क्रिया के साथ (उसके आश्रयरूप) एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला
संस्कार ही 'स्थितिस्यापक संस्कार' है; क्योंकि अवनमित शाखादि की पुनः
पूर्वावस्था की प्राप्ति का कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता । कुछ अन्य लोग इस
सन्दर्भ के 'भुग्नसंवर्तितेषु' इस पद को इसी सन्दर्भ के 'सूत्रवस्त्रादिषु' का विशेषण

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६६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
धर्मः पुरुषगुणः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः, अतीन्द्रियोऽन्त्यसुखसंविज्ञान-
विरोधी पुरुषान्तःकरणसंयोगविशुद्धाभिसन्धिजः, वर्णाश्रमिणां प्रतिनियत-
साधननिमित्तः । तस्य तु साधनानि श्रुतिस्मृतिविहितानि वर्णाश्रमिणां सामान्य-
विशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि ।
धर्म पुरुष (जीवात्मा) का गुण है । वह अपने उत्पादक जीव के
प्रिय, हित और मोक्ष का कारण है एवं अतीन्द्रिय है । अन्तिम सुख
और तत्त्वज्ञान इन दोनों से इसका नाश होता है । पुरुष और
अन्तःकरण (मन) के संयोग और संकल्प इन दोनों से इसकी उत्पत्ति
होती है । वर्णों और आश्रमियों के लिए विहित कर्म (भी) उसके
साधन हैं । वेद एवं धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में वर्णों और आश्रमियों के
साधारण धर्मों और विशेष धर्मों के साधन के लिए कहे गये द्रव्य, गुण
और कर्म भी इसके कारण हैं ।
न्यायकन्दली
यानि सूत्रादीनि संवर्तितानि तेष्विति व्याचक्षते । तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्ववत् ।
यथा गुरुत्वं परमाणुषु नित्यं कार्येष्वनित्यं कारणगुणपूर्वकं च, तथा स्थितिस्थापकोऽ-
पीत्यर्थः ।
धर्मः पुरुषेति । यो धर्मः, स पुरुषस्य गुणो न कर्मसामर्थ्यमित्यर्थः ।
कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः । प्रियं सुखम्, हितं सुखसाधनम्, मोक्षो नवानामात्म-
विशेषगुणानामत्यन्तोच्छेदस्तेषां हेतुः । कर्तुः प्रियादीनामेव यो हेतुः स धर्म
मानते हैं, (तदनुसार इस वाक्य का ऐसा अर्थ करते हैं) कि संवर्तित जो सूत्रादि,
उनमें रहनेवाला संस्कार ही 'स्थितिस्थापक कार' है । 'तस्य नित्यानित्यत्व-
निष्पत्तयो गुरुत्ववत्' अर्थात् जैसे कि परमाणुओं में रहनेवाला गुरुत्व नित्य है एवं
कार्यद्रव्यों में रहनेवाला गुरुत्व अनित्य है, उसी प्रकार 'स्थितिस्थापक संस्कार' को
भी समझना चाहिए । (अर्थात् परमाणुओं में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार नित्य
है एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला अनित्य) ।
'धर्मः पुरुषेति' । अर्थात् धर्म (नाम का) जो गुण है, वह 'पुरुष' का
अर्थात् जीव का ही गुण है, (ज्योतिष्टोमादि) क्रियाओं का शक्तिरूप नहीं है
'कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः' (इस वाक्य में प्रयुक्त) प्रिय शब्द का अर्थ है
सुख, 'हित' शब्द सुख के साधनों को समझने के लिए लिखा गया है एवं
'मोक्ष' शब्द जीव के बुद्धि प्रभृति नौ विशेष गुणों का अत्यन्त
विनाशरूप अर्थ का बोधक है । इन सबों का हेतु (ही 'धर्म' है ) । 'कर्तुः

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१
न्यायकन्दली
इति व्याख्येयम् । न तु कर्तुरेव यः प्रियादिहेतुः स धर्म इति व्याख्या, पुत्रेण कृतस्य
श्राद्धस्य पितृगामित्तिफलश्रवणात् । वृष्टिकामेन कारीर्यां कृतायां तदन्यस्यापि समीप-
देशवर्तिनो वृष्टिफलसम्बन्धदर्शनात् ।
स्वर्गकामो यजेतेत्यादिवाक्ये यागेन स्वर्गं कुर्यादिति कर्मणः श्रेयःसाधनत्वं श्रूयते ।
यश्च निःश्रेयसेन पुरुषं संयुनक्ति स धर्मः, तस्माद् यागादिकमेव धर्मः, न पुरुषगुणः ।
तथा हि, यो यागमनुतिष्ठति तं धार्मिकमित्याचक्षते । एतदयुक्तम् । क्षणिकस्य कर्मणः काला-
न्तरभाविफलसाधनत्वासम्भवात् । अथोच्यते । क्षणिकं कर्म, कालान्तरभावि च स्वर्ग-
फलम्, विनष्टाच्च कारणात् कार्यस्यानुत्पत्तिः, श्रुतं च यागादेः कारणत्वम्, तदेतदन्य-
थानुपपत्त्या फलोत्पत्त्यनुगुणं किमपि कालान्तरावस्थायि कर्मसामर्थ्यं कल्प्यते, यद्द्वारेण
कर्मणां श्रुता फलसाधनता निर्वहति । तच्च प्रमाणान्तरागोचरत्वादपूर्वमिति व्यपदिश्यते ।
प्रियहितमोक्षहेतुः' इस वाक्य की व्याख्या इस रीति से करनी चाहिए कि (धर्मजनक
क्रियाओं के) कर्त्ता के 'प्रियादि' का जो हेतु वही 'धर्म' है । इस प्रकार की
व्याख्या नहीं करनी चाहिए; क्योंकि पुत्र के द्वारा अनुष्ठित श्राद्धरूप क्रिया से पिता
में ही प्रीतिरूप फल का होना शास्त्रों में उपलब्ध होता है । एवं वृष्टि की कामना
से 'कारीरी' नाम के याग के अनुष्ठान से जो वृष्टिरूप फल उत्पन्न होता है, उससे
याग करनेवाले और उनके समीप के और लोग भी प्रीति का लाभ करते हैं ।
(प्र.) 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वाक्यों से 'याग के द्वारा स्वर्ग का सम्पादन
करना चाहिए' इस प्रकार यागादि श्रेय कर्म ही स्वर्गादि इष्टों के साधक के रूप में
सुने जाते हैं । 'धर्म' उसी का नाम है जो पुरुष को श्रेयस् के साथ सम्बद्ध करे ।
तस्मात् यागादि कर्म ही धर्म हैं, धर्म जीव का गुण नहीं है । एवं जो यागादि कर्मों
का अनुष्ठान करता है उसे ही लोग 'धार्मिक' कहते भी हैं ।
(उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म क्षण भर ही रहते हैं, उनसे
बहुत काल बाद होनेवाले स्वर्गादि का सम्पादन सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि
(प्र.) यागादि क्रियायें क्षणिक हैं । उनके स्वर्गादि फल उनसे बहुत समय बाद होते
हैं । यह भी निर्णीत है कि विनाश को प्राप्त हुए कारणों से कार्य की उत्पत्ति नहीं
होती है । फिर भी यागादि क्रियाओं में स्वर्गादि फलों की हेतुता वेदों से श्रुत है; किन्तु
यह हेतुता तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि यागादि के बाद और
स्वर्गादि की उत्पत्ति से पहले तक रहनेवाले किसी व्यापार की कल्पना न कर लें,
जिससे यागादि में वेदों के द्वारा श्रुत स्वर्गादिजनकता का निर्वाह हो सके । वही
व्यापार और किसी प्रमाण के द्वारा गम्य न होने के कारण 'अपूर्व' कहलाता है ।

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६६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने ।
तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥
अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवेति, शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य
सामर्थ्यस्यावस्थानासम्भवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानीमनागतमेव, न शक्तेराश्रयो
भवितुमर्हति । यदि त्यनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गो भवति ? अपूर्वकल्पनावैय्यर्थ्यम्, तदुप-
भोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादिविरहादननुभवश्चेत् ? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात
एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभावत्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनैव ।
तस्मान्न फलाश्रयमपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च
कार्यमनाधारं नोपपद्यते, तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्युपेया । तथा सति न
तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात्, अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यत्राप्यन्यसमवेता शक्ति-
रिष्यते, तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत् ?
जैसा कहा गया है कि 'बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण
मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है, वह विधान तब तक उपपन्न नहीं
हो सकता, जब तक कि 'अपूर्व' की कल्पना न कर ली जाय। अतः 'अपूर्व' की
कल्पना करते हैं ।
(उ.) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्यरूप अपूर्व
(जिसे स्वर्गसाधन पर्यन्त रहना है) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता;
क्योंकि वे क्षणिक हैं । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व
(स्वर्गोत्पादन पर्यन्त) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के
आश्रय नहीं हो सकते; क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ
में ही रहते हैं । यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद ही स्वर्गादि की उत्पत्ति
(आश्रय को उपपन्न करने के लिए) मानें, तो उनका उपयोग भी (उसी समय)
मानना पड़ेगा । यदि ऐसा कहें कि उस समय (यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त
बाद) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं हैं, इसी से स्वर्ग की
उत्पत्ति नहीं होती है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही
नहीं होते, क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं । यह कल्पना अभूतपूर्व
होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है, किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है ।
यह भी सम्भव नहीं है कि (पुरुष से भिन्न) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके
आश्रय हों; क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति
नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना
आश्रय के ही हो; क्योंकि वह भावरूप कार्य है । अतः अपूर्व को यदि मानना है,
तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) हम यह
भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है, जो समवाय
सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे; क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैयोपलभ्यते ।
तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति ।
तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनकत्वानुपलम्भादेव ।
तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके-"तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति"
यागेनाहितत्वादपूर्व्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः, अपूर्वोपकृतात् कर्मणः फलानु-
त्पत्तेः, तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावरस्थादिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलोत्पत्तेर-
पूर्वमेव श्रेयःसाधनम् । कारणत्वश्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति
प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि
यागादौ धर्मव्यपदेशः, सोऽप्यपूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः। स्वर्ग-
साधने हि चोदितस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्द-
नादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात्, तदभावे चाप्रयोगात्, प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः,
लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है। जैसा कहा गया है कि "कार्यरूप हेतु से
अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी, उसी में उसकी सत्ता
माननी पड़ेगी" अतः उस कारण की शक्ति उसी कारण में ही रहेगी, कभी उससे
भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती । (उ.) किन्तु यह भी अयुक्त ही है; क्योंकि शक्ति
के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से
कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से
आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है
कि "उससे (याग से) जिस लिए कि 'उसका' अपूर्व का आधान होता है; अतः
'अपूर्व' याग की शक्ति कहलाता है ।" क्योंकि याग से 'आहित' अर्थात् उत्पन्न
होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है । अपूर्व याग की शक्ति नहीं है,
क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है और इस
उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है (क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के
अव्यवहित पूर्वक्षण में याग की सत्ता ही नहीं है, फिर अपूर्व किसका साहाय्य
करेगा ? ) । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत
पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसे
उपयुक्त देश-कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है । अतः प्रमाण के द्वारा इसी
पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है ।
यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है,वह हेतुता
'अपूर्व' का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं, इसी
अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि 'धर्म पुरुष का
ही गुण है' । यागादि क्रियाओं में जो 'धर्म' शब्द का व्यवहार होता है, उसे अपूर्व या
धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए । जैसे कि प्रीति के चन्दन-

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६६४ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि, तस्मात् प्रीतिसाधन-
प्रतीत्युत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावैयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षण्या
तत्साधने प्रयोगः, एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनानवकाशादिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः। अन्त्यसुख-
संविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी, न च निर्हेतुको
विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं
यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम्, तस्य
यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः, कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य
भागशो नाशः सम्भाव्यते, तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते । ये तु
वनितादि साधनों में 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साधनीभूत
अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित
व्यवहार होता है, वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में
जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है, तभी 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग होता है, जब जिसे
उन साधनों से सुख नहीं मिलता है, तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग
नहीं होता । अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द
लाक्षणिक है और प्रीति में ही उसकी अभिधा शक्ति है; क्योंकि प्रीति और उसके
साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द की अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म
के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है;
क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप
उसके मुख्यार्थ और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थ दोनों के बोध की उत्पत्ति हो
जाएगी । अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टोमादि, दोनों में धर्म शब्द की
अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यही तार्किक लोगों की रीति है ।
'अतीन्द्रियः' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी
इन्द्रिय से नहीं देख सकता, अतः 'धर्म अतीन्द्रिय' है । 'अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी'
धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः वह विनाशशील भी है; किन्तु कोई भी विनाश
बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न
किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि. फलों की उत्पत्ति से पहले तक
उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी । (यदि किसी भी उपभोग से धर्म का विनाश मानें
तो) किसी-किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है, अतः उनमें
पहले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा, आगे उससे उपभोग ही रुक
जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग
का विनाश हो (और अवशिष्ट भाग बचा रहे), तस्मात् अन्तिम सुख ही धर्म का नाशक