वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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न्यायकन्दली
नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि-
निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति च व्यपदेशो न
घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासइत्यादिषु
पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य
संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्वं वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूपसंवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य
मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति 'नायं वर्णः, किन्तु
स्फोटः' इति । या चेयमेकार्थावमर्शिनी बुद्धिः, सापि नार्थान्तरमवभासयति किन्तु वन-
एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थतत्त्व का बोध होता है । यदि वर्णों का
समुदाय ही पद हो (वर्णों का कोई एक स्फोट न हो) तो फिर पद में एकत्व की
प्रतीति न हो सकेगी, अतः 'एकं पदम्' इत्यादि बुद्धियाँ निर्विषयक हो जायेंगी ।
एवं 'शब्दाद् अर्थं प्रतिपद्यामहे' (एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं)
यह व्यवहार न हो सकेगा (किन्तु 'बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं' इस
प्रकार का व्यवहार होगा) । अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, जिससे अर्थ
'प्रस्फुटित' होता है (उसी की अन्वर्थसंज्ञा 'स्फोट' है ) ।
इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों
का कहना है कि 'गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासः' (अर्थात् पाण्डुदास
कायस्थ कुल के तिलकरूप हैं एवं गुणरूपी रत्न ही उनके भूषण हैं) इन सब
वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती
है; किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी (स्फोट रूप) अर्थ का
भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है,
वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्णरूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का
स्फोटत्वरूप से भान होता है । (उ.) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को
मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णविषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही
मानना पड़ेगा । (किन्तु आगे) यह बाधज्ञान भी नहीं होता कि 'ज्ञात होनेवाला
यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती
है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे
कि 'यह वन है' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र वन नाम की
कोई वस्तु नहीं है । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य
का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मानकर किया जाता है ।
प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव है, उस (स्फोट) का अन्य
प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय