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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 617 of 759

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Page 617

६५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट-
न्यायकन्दली
गतत्यान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत्, स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ
परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणांमेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं
नदी दीनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्यात्, वर्णानामभेदात्, क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्याच्च । अस्ति
चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्यमानः ? तर्हातिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः ।
ननु स्फोटोऽपि नानभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति, सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभि-
व्यक्तिश्च न तस्य वर्णैभ्यः सम्भवति, उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां वासा-
मर्थ्यात्, तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः ।
अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णा-
त्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते
स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमितनिखिलवर्णविभागोल्लेखक्रमम-
जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें; किन्तु सभी वर्णों का एक
ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह
आपत्ति आ खड़ी होती है कि 'बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है' ।
जिससे 'सर' शब्द से और 'रस' शब्द से, एवं 'वन' शब्द से और 'नव' शब्द से
अथवा 'नदी' शब्द से और 'दीन' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी;
क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं, क्रम को बोध का करण मान नहीं सकते;
किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता
है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति
स्फोट के बिना नहीं हो सकती, अतः 'स्फोट' का मानना आवश्यक है ।
(प्र.) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थविषयक बोध का उत्पादन कर सकता
है, यदि ऐसा न मानें, स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा
अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी । (अब यह देखना है कि स्फोट की
अभिव्यक्ति किससे होती है ?) वर्णों से स्फोट की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है;
क्योंकि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे, तो
अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जायेंगे । यदि वर्णसमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति
मानें, तो सो भी सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य
सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है ।
इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि
स्फोट पहले से ही रहते हैं; किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं; किन्तु तत्तद्वर्णों के
उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न (कौष्ठ्य) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त
स्फोट को ही पहले तत्तद्वर्ण स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात्
अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अतिस्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती
हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग-अलग स्वरूप नहीं रह जाते
एवं वर्णों का अलग-अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता, इन सबों से अलग