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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 610 of 759

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Page 610

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४५
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यः संयोगेभ्यो
द्व्यणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते, तस्मिंश्च रूपायुत्पत्तिसमकालं कारण-
गुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति ।
स्नेहोऽपां विशेषगुणः । संग्रहम्मृजादिहेतुः । अस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व-
निष्पत्तयः ।
इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और
मन के संयोग से (उन स्वतन्त्र परमाणुओं में) क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
इस क्रिया से (द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक) संयोग की
उत्पत्ति होती है । इस संयोग से द्व्यणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति
होती है । इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है,
उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है ।
केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण 'स्नेह' है । वह संग्रह सत्तू
प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का एवं मर्दन प्रभृति
क्रिया का हेतु है । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व
की तरह जाननी चाहिए ।
न्यायकन्दली
द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्यः, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रतिबन्धात् । तेजः-
संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्धमित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रति-
बन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरकादियत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शना-
दवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेर्भौमाग्निसंयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य, तद्
वह्निसंयोगादवगतम्, यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव ।
तस्मादिहापि दृष्टसामर्थ्यो वह्निसंयोग एव निमित्तमाश्रीयते ।
लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से (सांसिद्धिक) द्रवत्व का प्रतिरोध देखा जाता
है, अतः लवणरूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की
जनकता का अनुमान करते हैं । हिमकरकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण
को पिघलते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि लवण भी जलीय द्रव्य है । वह्नि
संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है । हिम-
करकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है, अतः समझते हैं कि
वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है । तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें
प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है, उसी वह्निसंयोग में हिमकरकादि के पिघलने की भी
कारणता स्वीकार कर लेते हैं ।