वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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न्यायकन्दली
इति चेत् ? यदि हि स्मृतिरपि क्रमभाविनी ? तदा नास्ति वर्णसाहित्यम्, तृतीयवर्ण-
ग्रहणकाले प्रथमवर्णस्मृतिविलोपात्, युगपदुत्पादस्तु स्मृतीनामनाशङ्कनीय एव, ज्ञानयौग-
पद्यप्रतिषेधात् ।
अथ प्रथममाद्यवर्णज्ञानम्, तदनु संस्कारः, तदनु तृतीयवर्णज्ञानम्, तेन प्राक्तनेन संस्का-
रेणान्यो विशिष्टः संस्कारो जन्यत इत्यनेन क्रमेणान्ते निखिलवर्णविषयः संस्कारो जातो
निखिलवर्णविषयामेकामेव स्मृतिं युगपत् करोतीत्याश्रीयते, तदा क्रमो हीयते । क्रमो हि पौर्वाप-
र्यम्, तच्च देशनिबन्धनं कालनिबन्धनं वा स्यात्, उभयमपि तद्वर्णेषु नावकाशं लभते, तेषां सर्व-
प्रत्यक्ष के समय पूर्व के सभी वर्णों का रहना सम्भव नहीं है । (प्र.) वर्ण तो नित्य
हैं, अतः सभी समयों में उनकी सत्ता सम्भावित है सुतरां वर्णों का समुदाय असम्भव
नहीं है । (उ.) फिर भी किसी एक समय में सभी वर्णों का ग्रहण सम्भव नहीं है ।
वर्ण गृहीत होकर ही अर्थप्रत्यय के कारण हैं । यदि वर्ण स्वरूपतः अर्थप्रत्यय के
कारण हों, तो फिर उनसे सर्वदा अर्थ की प्रतीति होनी चाहिए; क्योंकि एक बार
ज्ञात वर्ण के अज्ञान में और वर्णों के सर्वथा अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है ।
अतः इस प्रकार भी वर्णसमूह से सर्वप्रत्यय का उपपादन नहीं किया जा सकता ।
(प्र.) पद या वाक्य के जितने वर्ण पहले ज्ञात हैं, वे सभी पुनः स्मृतिपथ में
आकर अर्थबोध का उत्पादन करते हैं । (उ.) (इस प्रसङ्ग में पूछना है कि पद या
वाक्य के प्रत्येक वर्ण की अलग-अलग स्मृति होती है ? या सभी वर्णों का एक ही
स्मरण होता है ?) इनमें यदि यह प्रथमपक्ष मानें कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण
की स्मृति क्रमशः होती है, तो फिर स्मृति में भी वर्णों का एकत्र होना सम्भव नहीं
है; क्योंकि तीसरे वर्ण की स्मृति के समय प्रथम वर्ण की स्मृति अवश्य ही विनष्ट
हो जाएगी । प्रत्येक वर्णविषयक सभी स्मृतियों का एक ही समय उत्पन्न होना तो
सम्भव ही नहीं है; क्योंकि एक समय अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
यदि इस प्रकार की कल्पना करें कि (प्र.) पहले प्रथम वर्ण का ज्ञान होता है,
उसके बाद उस वर्णविषयक संस्कार की उत्पत्ति होती है, उसके बाद तृतीय वर्ण
का ज्ञान, इसके बाद उसी क्रम से पहले-पहले के संस्कारों से अन्तिम वर्णविषयक
विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । अन्त में सभी वर्णों के इस एक ही
संस्कार से एक ही समय सभी वर्णविषयक एक ही स्मृति की उत्पत्ति होती है ।
(उ.) तो फिर वर्णों में क्रम ही नहीं रह जाएगा; क्योंकि पूर्वापरीभाव (एक के
बाद दूसरा) को ही क्रम कहते हैं । यह क्रम दो प्रकारों से सम्भव है- (१)
देशमूलक और (२) कालमूलक । वर्णों में इन दोनों में से एक भी प्रकार के क्रम
की सम्भावना नहीं है; क्योंकि वर्ण व्यापक हैं, इसलिए दैशिक पूर्वापरीभाव-
रूप क्रम सम्भव नहीं है । वर्ण नित्य (अविनाशी) हैं, इसीलिए कालिक पूर्वापरीभाव
की सम्भावना भी नहीं है । अतः वर्णों में क्रम की उपपत्ति का एक ही मार्ग बच