वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
॥ श्रीः ॥
विज्ञप्तिः
[ प्रथमसंस्करणस्य ]
गङ्गानाथान् गुरून् नत्वा बहुग्रन्थानुवादकान् ।
तन्नाम्ना ग्रन्थमालायाः प्रक्रमं करवाण्यहम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यस्य कन्दलीटीकया सह ।
प्रकाशः क्रियतेऽस्माभिरनूद्य देशभाषया ॥
संशोधनं कृतं यत्नैर्हिन्दीभाषानुवादिना ।
अस्मत्सहायकेनैव श्रीदुर्गाधरशर्मणा ॥
लिखिता भूमिकाय्येका न्यायशास्त्रविदाऽमुना ।
वैशेषिकपदार्थानां सम्यग् बोधो यथा भवेत् ॥
मालायाः सुमनश्चायं सौमनस्यं प्रसारयेत् ।
प्रार्थना काशिकापुर्यां क्षेत्रेशचन्द्रशर्मणः ॥
शास्त्रज्ञ पण्डितों के अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अथवा हिन्दी भाषा के
वेत्ता साधारण बुद्धिमान् जनता में अथवा विद्वानों में प्राचीन भारतीय दर्शनों के
प्रति विशेष रुचि आजकल पाई जाती है; परन्तु संस्कृत-भाषा में पूर्ण ज्ञान न होने
के कारण वे मूल ग्रन्थों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं । इस त्रुटि की पूर्ति के
लिए यह आवश्यक है कि हमारे मुख्य-मुख्य दार्शनिक तथा अन्य शास्त्रों के ग्रन्थों
का प्रामाणिक अनुवाद के साथ प्रकाशन हो, जैसे ग्रीक तथा लातिन भाषा की
लोएब क्लैसिकल लाइब्रेरी (LOEB CLASSICAL LIBRARY) में हुआ है ।
काशी से प्रकाशित 'अच्युतग्रन्थमाला' ने अंशतः यह कार्य किया है; परन्तु इस
ग्रन्थमाला में कुछ ही शास्त्रों का समावेश हुआ । यह ग्रन्थमाला भी इधर बन्द हो
गई ।
सन् १९५८ में काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के "वाराणसेय संस्कृत
विश्वविद्यालय" में परिणत होने पर अनुसन्धान संचालक के पद पर जब
मेरी नियुक्ति हुई, मैंने प्रथम उपकुलपति श्री आदित्यनाथ झा जी से प्रार्थना की
कि ऐसी एक ग्रन्थमाला हम भी प्रकाशित करें और उन्होंने इस प्रस्ताव को
स्वीकृत किया । ग्रन्थमाला का नाम रखा गया 'गङ्गानाथझा-ग्रन्थमाला' । इस
नामकरण के दो कारण थे-(१) हमारे दिवङ्गत गुरु विद्यासागर महामहोपाध्याय
पादाचार्य कृत 'पदार्थधर्मसंग्रह' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन
२ प्रशस्तपादभाष्यम्
डॉ. श्री गङ्गानाथ झा जी ने बहुत संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद किया था और
(२) गुरु जी के अनुवादों के कारण हमारे देश में और विदेशों में भारतीय दर्शन
का ज्ञान पर्याप्त मात्रा में फैला ।
इस ग्रन्थमाला का प्रथम पुष्प है श्रीधरकृत "न्यायकन्दली" टीका सहित प्रशस्त-
पादाचार्य कृत 'पदार्थधर्मसंग्रह' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन
और अनुवाद विश्वविद्यालय के अनुसन्धान सहायक न्यायाचार्य श्री दुर्गाधर झा ने
किया है । "पदार्थधर्मसंग्रह" वैशेषिक शास्त्र में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है, कणादकृत
वैशेषिक सूत्रों की क्रमिक व्याख्या नहीं । यह ग्रन्थ इतना प्रामाणिक समझा गया
कि इसके आगे सूत्र का प्रचार कम हो गया । पदार्थधर्मसंग्रह के ऊपर विद्वानों ने
टीकायें लिखीं । ऐसी तीन टीकायें बहुत प्रसिद्ध हैं-श्रीधरकृत 'न्यायकन्दली',
उदयनकृत 'किरणावली' और व्योमशिवाचार्यकृत 'व्योमवती' । इनमें 'न्याय-
कन्दली', ग्रन्थ लगाने की दृष्टि से सर्वोत्तम है । इस कारण से इस टीका का और
उसके अनुवाद का यहाँ समावेश किया गया है ।
आगे इस ग्रन्थमाला में उदयनकृत 'न्यायकुसुमाञ्जलि' (गद्य और पद्य) और
अन्य ग्रन्थों का प्रकाशन होगा । दर्शन शास्त्र के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों के भी
ग्रन्थ प्रकाशित किये जायेंगे ।
१४-१२-१९६३ क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय
भूमिका
[ प्रथम संस्करण की ]
न्यायकन्दली सहित प्रशस्तपादभाष्य का हिन्दी अनुवाद तथा टिप्पणियों के
साथ पण्डितों के समक्ष उपस्थित करते हुए मुझे विशेष हर्ष हो रहा है। हर्ष दो
कारणों से है- (१) वर्तमानकाल में दुर्लभ इस टीका के साथ प्रशस्तपादभाष्य की
पुस्तक मूल संस्कृत पुस्तकों के चाहनेवालों के लिए सुलभ हो जायगी । (२) एवं
प्रशस्तपादभाष्य और न्यायकन्दली का अर्थ हिन्दी संसार के सामने स्पष्ट हो
जायगा ।
पुस्तक का सम्पादक हो या अनुवादक, सब के लिए यह अलिखित कर्त्तव्य
निर्दिष्ट-सा हो गया है कि पुस्तक के साथ वह कोई भूमिका अवश्य लिखे ।
तदनुसार मैं भी एक भूमिका लिख रहा हूँ ।
शास्त्रों के ज्ञान-लाभ करने के लिए पद और पदार्थों का सम्यक् ज्ञान
आवश्यक है । इनमें पद-ज्ञान के लिए जिस प्रकार व्याकरणशास्त्र की शरण लेना
अनिवार्य है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान के लिए कणादनिर्मित इस दर्शन की भी
आवश्यकता है । वैशेषिकदर्शन की इस आवश्यकता को "काणादं पाणिनीयञ्च
सर्वशास्त्रोपकारकम्" इत्यादि उक्तियाँ भी समर्थन करती हैं। अतएव वैशेषिक-
दर्शन की उपादेयता में तो कोई सन्देह ही नहीं है ।
वैशेषिकदर्शन और इसके सूत्र
इसके तीन नाम अधिक प्रसिद्ध हैं-(१) वैशेषिकदर्शन, (२) औलूक्यदर्शन
और (३) काणाददर्शन ।
इनमें 'वैशेषिक' नाम के प्रसङ्ग में ६ प्रकार की युक्तियाँ प्रचलित हैं-(१)
'अन्यत्र अन्त्येभ्यो विशेषेभ्यः' (१।२।६) इस सूत्र के अनुसार 'अन्त्य' विशेष पदार्थ
के साथ सम्बद्ध जो 'दर्शन' वही 'वैशेषिकदर्शन' है; क्योंकि दूसरे किसी भी दर्शन
में इस प्रकार का 'विशेष' पदार्थ स्वीकृत नहीं है । अतः 'विशेष' रूप स्वतन्त्र
पदार्थ के निरूपण के द्वारा यह अन्य दर्शनों से अलग समझा जा सकता है । अतः
दूसरे दर्शनों से इसको अलग समझानेवाली यह 'वैशेषिकदर्शन' संज्ञा है ।
(२) न्यायदर्शन में दुःखों की पूर्ण निवृत्ति को 'मोक्ष' कहा गया है । इस दर्शन
में आत्मा के सभी विशेष गुणों के पूर्ण विनाश को 'अपवर्ग' माना गया है । अतः
सभी दर्शनों के द्वारा समान प्रतिपाद्य मोक्ष के प्रसङ्ग में यह 'विशेषगुण' का
४ प्रशस्तपादभाष्यम्
अवलम्बन कर उसके मूलतः उच्छेद को 'मुक्ति' माना है, अतः 'विशेष एव
वैशेषिकः' इस स्वार्थिक प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न 'वैशेषिक' शब्द के द्वारा मोक्ष के
प्रसङ्ग में इस का उक्त असाधारण्य ही प्रतिपादित होता है, अतः इसका नाम
'वैशेषिकदर्शन' है । फलतः 'विशेष' से, अर्थात् 'विशेषगुण' से मोक्ष के प्रसङ्ग में
जो शास्त्र सम्बद्ध हो वही 'वैशेषिक-दर्शन' है ।
(३) 'विगतः शेषो यस्य तत् विशेषम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विशेष ही
प्रकृत 'विशेष' शब्द का अर्थ है । 'विशेष एव वैशेषिकम्' इस प्रकार स्वार्थिक
प्रत्यय करके यह 'वैशेषिक' शब्द निष्पन्न है । अर्थात् नैयायिकादि पदार्थों की
षोडशादि संख्याओं को स्वीकार कर प्रमाणादि जिन पदार्थों को स्वीकार किया है,
वे सभी वैशेषिकों से स्वीकृत सात पदार्थों में ही 'निरवशेष' होकर अन्तर्भूत हो
जाते हैं । कोई भी अन्तर्भूत होने से अवशिष्ट नहीं रहते, अतः इस दर्शन का
नाम 'वैशेषिक-दर्शन' है ।
(४) 'विशेषणं विशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार लक्षणपरीक्षादि के क्रम से
पदार्थों का प्रतिपादन ही प्रकृत में 'विशेष' शब्द का अभिप्रेत अर्थ है । उक्त
प्रतिपादन रूप कार्य जिस शास्त्र के द्वारा हो वही 'वैशेषिकदर्शन' है । इस प्रकार
से व्याख्या करनेवालों का अभिप्राय है कि सांख्य, वेदान्तादि दर्शनों में मोक्ष के
लिये साक्षात् उपयोगी आत्मा एवं अन्तःकरणादि पदार्थ और सृष्टितत्त्व प्रभृति ही
विशेष रूप से विवेचित हुए हैं । इससे जगत् के और पदार्थों से तत्त्व यथावत्
परिस्फुट नहीं होते । आत्मतत्त्व को समझने के लिये भी आत्मा के सजातीय और
विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है । अतः आत्मा और उनके
सजातीय और विजातीय सभी पदार्थों की ओर 'विशेष' रूप से मुमुक्षुओं की दृष्टि
आकृष्ट करने के कारण ही इस दर्शन का नाम वैशेषिकदर्शन' है ।
(५) प्रकृत 'विशेष' शब्द के 'भेद' और 'विशेष गुण' दोनों ही अर्थ हैं । इन
दोनों अर्थों के साथ सम्बद्ध जो दर्शन वही 'वैशेषिकदर्शन' है । वेदान्तदर्शन के
अनुसार आत्मा में भेद और विशेष गुण ये दोनों ही नहीं हैं । इस दर्शन में
आत्माओं में परस्पर भेद और ज्ञान, इच्छा प्रभृति विशेष गुण दोनों ही स्वीकृत
हैं । सांख्यदर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद यद्यपि स्वीकृत है, फिर भी वे आत्मा
में विशेष गुण की सत्ता नहीं मानते । तस्मात् आत्मा में उक्त भेद और विशेष गुण
इन दोनों 'विशेषों' का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कणाद ने इस नाम के द्वारा
यह सूचित किया है कि वेदान्त और सांख्यदर्शन से यह दर्शन गतार्थ नहीं है । 1
- टिप्पणी-ये पाँच व्युत्पत्तियाँ म. म. विद्वद्वर श्रीयुत कालीपदतर्काचार्य महोदय के द्वारा
सम्पादित सूक्ति और उनकी टीका के साथ संस्कृतसाहित्यपरिषद् से प्रकाशित
'प्रशस्तपादभाष्य' की भूमिका से ली गयी हैं । अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ ।
सूत्र की संख्याओं के सम्बन्ध में प्रथमोक्त तीन टीकाओं में काफी अन्तर है । शेष
भूमिका ५
(६) 'विशेष' शब्द का प्रयोग परमाणु अर्थ में भी होता है, तदनुसार परमाणु
की सत्ता और तन्मूलक सृष्टि जिस दर्शन में स्वीकृत हो वही 'वैशेषिकदर्शन' है ।
कुछ विद्वानों की ऐसी भी सम्मति है ।
महर्षि कणाद किसी उलूक नाम के महर्षि के वंश में थे, अतः उनका
'औलूक्य' नाम भी था । इसी कारण कणाद-निर्मित दर्शन को 'औलूक्यदर्शन' भी
कहते हैं ।
काणाददर्शन
महर्षि कणाद के द्वारा रचित होने के कारण इसे काणाददर्शन भी कहते हैं ।
वैशेषिकसूत्र और उसकी टीकाओं की परम्परा
वैशेषिकसूत्र के ऊपर प्रशस्तपादकृत भाष्य से पहिले की टीका उपलब्ध नहीं
हैं । रावणकृत भाष्य एवं भारद्वाजकृत वृत्ति की बातें सुनने में आती हैं, किन्तु वे
अपने स्वरूप में उपलब्ध नहीं हैं । ग्रन्थान्तरों में उनकी चर्चा अवश्य मिलती है ।
प्रशस्तपादकृत भाष्य के द्वारा सभी सूत्रों के अर्थ प्रकाशित नहीं होते । अतः शङ्कर
मिश्र कृत 'उपस्कार' टीका के द्वारा ही इतने दिनों तक सूत्रों के प्रसङ्ग में जो कुछ
भी कहा जाता रहा है । इधर दरभङ्गा विद्यापीठ से अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य
विद्वान् की टीका प्रकाशित हुई है । उस ग्रन्थ के सम्पादक उसे उपस्कार से प्राचीन
और किरणावली से अर्वाचीन मानते हैं । गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज से अभी
चन्द्रानन्द नाम के किसी विद्वान् की एक वृत्ति निकली है । पं. श्रीजयनारायण
भट्टाचार्य और पं. श्रीचन्द्रकान्त तर्कालङ्कार की टीकायें प्रायः इसी शताब्दी की हैं ।
सूत्र की संख्याओं के सम्बन्ध में प्रथमोक्त तीन टीकाओं में काफी अन्तर है । शेष
दोनों अर्वाचीन टीकायें इस के सम्बन्ध में श्री शङ्कर मिश्र की अनुयायी हैं ।
उपस्कार के अनुसार सूत्र की संख्या ३७० है और मिथिला विद्यापीठवाली पुस्तक
के अनुसार ९ अ. के पहले आह्निक तक सूत्रों की संख्या ३२४ है । इस पुस्तक
में आगे का अंश नहीं है; क्योंकि टीका उतनी ही उपलब्ध थी । अगर इसके आगे
के उपस्कारानुयायी सूत्रों को जोड़ देते हैं तो उनकी संख्या ३५३ तक ही पहुँचती
है । इस प्रकार सूत्रों के सम्बन्ध में मतान्तर चले आ रहे हैं । स्थिति यह
मालूम होती है कि प्रशस्तपाद की भाष्यरचना के बाद उसके सौष्ठव के कारण
सूत्र की तरफ से सबका ध्यान ही हट गया और वैशेषिकदर्शन के सम्बन्ध में
जितने भी कुछ विचार हुए या ग्रन्थ-रचनायें हुईं, सभी प्रशस्तपादभाष्य की आधार
मानकर ही होने लगीं । मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से प्रकाशित पूर्वोक्त
प्रकरण न रहने के कारण कुछ विद्वानों का कहना है कि कणाद के समय से
६ प्रशस्तपादभाष्यम्
वैशेषिकसूत्र की दोनों पुस्तकों के छपने के बाद एक बात और सामने आयी है ।
उन दोनों ही पुस्तकों में "धर्मविशेषप्रसूतात्" (१/१/३) इत्यादि उपक्रम सूत्र नहीं
है । किन्तु धर्मनिरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण लिखने के बाद हठात्
'पृथिव्यापस्तेजोवायुः' (१/१/५) इस सूत्र के द्वारा पदार्थों के विभाग से जो
असङ्गति की आपत्ति आती है, उसका उन दोनों टीकाकारों ने अपनी अपनी
टीका में जिस युक्ति से समर्थन किया है, वह युक्ति 'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि सूत्र
के द्वारा कही हुई युक्तियों से अधिक भिन्न नहीं है । इस प्रसङ्ग में दो ही बातें
संभव जान पड़ती हैं-(१) जिन लोगों ने 'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि को सूत्र नहीं
माना है, उन लोगों के हाथ में जो सूत्रावली आई उसके मूल लेखक से प्रमादवश
उक्त सूत्र छूट गया हो और उसके बाद से उसी सूत्रावली का प्रचार उस क्षेत्र में
हो गया हो । अथवा (२) धर्मव्याख्या की प्रतिज्ञा और लक्षण कहने के बाद
हठात् पदार्थ-निरूपण करने से जो असंगति आती है, उसकी पूर्ति किसी विद्वान्
ने अपनी सूत्रपाठ की पुस्तक में "धर्मविशेषप्रसूतात्" इत्यादि शब्दों के
द्वारा टिप्पणी रूप में कर दी हो । आगे उस पुस्तक के आधार पर लिखनेवाले
किसी दूसरे लेखक ने भ्रमवश उस टिप्पणी को सूत्र समझकर पृथक् सूत्र के
रूप में लिख दिया हो । भ्रम और प्रमाद इन दोनों की संभावनाओं में से प्रकृत में
किस संभावना की कल्पना में लाघव और स्वारस्य है, इसे पण्डितगण विचार
कर देखें ।
वैशेषिकदर्शन और ईश्वर
सभी जानते हैं कि न्याय और वैशेषिकदर्शन के आचार्यों ने ईश्वर साधन के
प्रसङ्ग में बहुत कुछ लिखा है । किन्तु वैशेषिक दर्शन के कणादरचित सूत्र में ईश्वर
शब्द का स्पष्ट उल्लेख न रहन के कारण एवं स्पष्ट रूप से ईश्वर-साधन का कोई
प्रकरण न रहने के कारण कुछ विद्वानों का कहना है कि कणाद के समय से
लेकर प्रशस्तपाद से पहले तक वैशेषिकदर्शन में ईश्वर स्वीकृत नहीं थे । अतः
मूलतः यह दर्शन ईश्वरपरक नहीं है ।
वैशेषिकदर्शन को ईश्वर-परक माननेवालों की दृष्टि इस प्रसङ्ग में कुछ भिन्न
प्रकार की है । उनका कहना है कि किसी वस्तु का स्पष्ट उल्लेख न करना ही
उस वस्तु के अभाव का साधक नहीं हो सकता, किसी वस्तु को अस्वीकृत करना
है तो फिर उसके लिए उस प्रसङ्ग में केवल मौन साधन से ही काम नहीं चल
सकता । उसके लिए उस वस्तु की सत्ता के विरुद्ध युक्तियों का स्पष्ट रूप से
निर्देश आवश्यक है; क्योंकि किसी वस्तु की अनुक्ति ही उसकी विरुद्धोक्ति नहीं हो
सकती । अनुक्ति और विरुद्धोक्ति में बहुत अन्तर है ।
सूत्र के द्वारा अवसरप्राप्त धर्म का लक्षण कहा गया है और तीसरे सूत्र के द्वारा
भूमिका ७
अतः प्रशस्तपाद प्रभृति आचार्यों ने एवं उनके अनुयायी उदयनादि आचार्यों ने
ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में अपनी चरम प्रतिभा का परिचय दिया है । एवं इस
दर्शन में ईश्वर को सिद्ध मानकर उपपादन किया है । शङ्कर मिश्र प्रभृति सूत्र के
टीकाकारों ने सूत्र के द्वारा ही ईश्वरसिद्धि का भी प्रयास किया है । उन लोगों का
कहना है कि किसी विषय का स्पष्ट उल्लेख न होने पर भी उसके अन्य उपपादनों
से उस विषय में उस व्यक्ति की अनुमति का पता चल जाता है । जैसे
व्याकरणशास्त्र में योगविभागादि के द्वारा सूत्र में अनुद्दिष्ट विधानों का भी आपेक्ष
होता है । इसी प्रकार प्रकृत में 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (१/१/३), 'संज्ञाकर्म-
त्वमस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम्' (२/१/१८) 'प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः' (२/१/१९)
इत्यादि सूत्रों के द्वारा आनुषङ्गिक रूप में ईश्वरसिद्धि का प्रयास शङ्कर मिश्र आदि
टीकाकारों के द्वारा किया गया है ।
धर्म और वैशेषिकदर्शन
वैशेषिकदर्शन का आरम्भ 'धर्मव्याख्या' की प्रतिज्ञा से हुआ है । उसके दूसरे
सूत्र के द्वारा अवसरप्राप्त धर्म का लक्षण कहा गया है और तीसरे सूत्र के द्वारा
धर्म के कारणीभूत यागादि के प्रतिपादक वेदों में प्रामाण्य का प्रतिपादन हुआ है ।
'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि चौथे सूत्र के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि
द्रव्यादि छः पदार्थों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य सहित तत्त्वज्ञान के द्वारा ही निःश्रेयस
का लाभ होता है । उक्त तत्त्वज्ञान निवृत्तिलक्षण विशेष प्रकार के धर्म से उत्पन्न
होता है । फलतः निःश्रेयस के लिये धर्म अत्यन्त आवश्यक है, अतः उसका
निरूपण भी आवश्यक है, जिसके लिए इस शास्त्र का आरम्भ उचित है । फिर
इसके बाद धर्म के सम्बन्ध में विशेष चर्चा नहीं दीख पड़ती है । क्रम के अनुसार
और पदार्थों की तरह धर्म का भी निरूपण किया गया है । पदार्थों के निरूपण से
ग्रन्थ की समाप्ति हो जाती है ।
इस प्रसङ्ग में कुछ लोगों का आक्षेप है कि धर्म निरूपण के लिए प्रवृत्त शास्त्र
में धर्म की इतनी सी चर्चा हो और उससे असम्बद्ध द्रव्यादि पदार्थों का इतना
विस्तृत वर्णन हो, यह कुछ ठीक नहीं जँचता । इसी आक्षेप की प्रतिध्वनि 'धर्मं
व्याख्यातुकामस्य षट्पदार्थोपवर्णनम् । सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम्' ।।
इत्यादि वचनों से होती है ।
इस प्रसङ्ग में वैशेषिक सिद्धान्त के अनुयायियों का यह कहना है कि इस
शास्त्र में जिस धर्म की व्याख्या की प्रतिज्ञा की गयी है वह पूर्वमीमांसा के
प्रतिज्ञासूत्र में कथित धर्म से भिन्न है । मीमांसकों ने धर्म शब्द से यागादि क्रियायों
को लिया है । ये क्रियायें केवल वेदों के द्वारा ही प्रमित हो सकती हैं । फलतः
८ प्रशस्तपादभाष्यम्
केवल वेद ही धर्मरूप क्रिया-कलाप के ज्ञापक हेतु हैं; किन्तु इन क्षणिक
क्रियाकलापों को स्वर्गादि कालपर्यन्त रहने की सम्भावना नहीं है, अतः मध्यवर्ती
एक अतीन्द्रिय अपूर्व की कल्पना मीमांसक भी करते हैं । वैशेषिकगण इस अपूर्व
को ही धर्म करते हैं । यह 'धर्म' केवल अनुमान से ही समझा जा सकता है ।
अतः जिस प्रकार मीमांसकों ने यागादि कर्मकलाप रूप धर्म के ज्ञापक प्रमाण रूप
वेदों के अर्थ के निर्णय में ही अपना सारा श्रम व्यय किया है, उसी प्रकार अगर
वैशेषिकगण आत्मनिष्ठ उक्त अपूर्व रूप गुण के एकमात्र साधक अनुमान और
आवश्यक पदार्थ निरूपण के प्रसङ्ग में अधिक जागरूक हों, तो उनके ऊपर
प्रतिज्ञात अर्थ से असम्बद्ध अर्थ के अभिधान का दोष नहीं मढ़ा जा सकता ।
दूसरी बात यह है कि अगर वैशेषिक दर्शन के उपक्रमस्थ धर्म शब्द से भी
यागादि क्रियाकलापों को ही लें, तथापि द्रव्यादि के निरूपण को यागादि से सर्वथा
असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । हेतु दो प्रकार के होते हैं- एक ज्ञापक और
दूसरा उत्पादक । दण्ड घट का उत्पादक कारण है और धूर्म वह्नि का ज्ञापक
कारण है । इसी कारणत्वसाम्य से दोनों प्रकार के हेतु-बोधक पदों से हेतु में
पञ्चमी विभक्ति होती है, जैसे- 'दण्डाद् घटः, धूमाद् वह्निः' इत्यादि । प्रकृत में
विधिवाक्य रूप वेद धर्म के ज्ञापक कारण हैं और द्रव्यादि पदार्थ उनके उत्पादक
कारण हैं; क्योंकि व्रीहि प्रभृति द्रव्य, आरुण्यादि गुण, उल्लन अवहननादि कर्म,
ब्राह्मणत्वादि सामान्य, इन सबों को मीमांसाशास्त्र में भी यागादि का सम्पादक माना
गया है । इसी प्रकार इनके तत्त्वज्ञान में सहायक विशेष और समवाय का
तत्त्वज्ञान भी परम्परया याग में उपकारक है फिर धर्म-व्याख्या के प्रसङ्ग में द्रव्यादि
पदार्थों के निरूपण करनेवालों को सागर जाने की इच्छा से हिमालय जानेवालों की
उपमा देना कहाँ तक उचित है ?
इस दर्शन के ऊपर सबसे अधिक प्रहार हुये हैं और हो रहे हैं, अपने यूथ के
दार्शनिकों द्वारा और त्रयीबाह्य बौद्धादि के द्वारा भी; किन्तु ये सभी विरोधी इस
शास्त्र के प्रसङ्ग में आचार्य महर्षि प्रशस्तपाद को ही सब से प्रामाणिक व्याख्याता
रूप में मानते चले आ रहे हैं । अतः प्रशस्तपादभाष्य का महत्त्व तो निर्विवाद है ।
तब रही बात यह भाष्य है ? या स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ है ? इस प्रसङ्ग में 'सूत्रार्थों
वर्ण्यते येन' भाष्य का यह लक्षण पूर्व रूप से संघटित न होने के कारण ही
विवाद उपस्थित होता है; किन्तु यह भी ध्याने देने की बात है कि इस दर्शन में
या और दर्शनों में भी स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थों की कमी नहीं है । उन सभी के ऊपर
दृष्टिपात करने पर प्रशस्तपाद भाष्य को स्वतन्त्र निबन्ध मानने में भी कुछ
कठिनाई होती है; क्योंकि इस ग्रन्थ में जिस प्रकार अपने सभी मन्तव्यों को
प्रतिपद सूत्र के द्वारा प्रतिपन्न करने की चेष्टा की गई है, वैसी चेष्टा और स्वतन्त्र
८ प्रशस्तपादभाष्यम्
केवल वेद ही धर्मरूप क्रिया-कलाप के ज्ञापक हेतु हैं; किन्तु इन क्षणिक
क्रियाकलापों को स्वर्गादि कालपर्यन्त रहने की सम्भावना नहीं है, अतः मध्यवर्ती
एक अतीन्द्रिय अपूर्व की कल्पना मीमांसक भी करते हैं। वैशेषिकगण इस अपूर्व
को ही धर्म कहते हैं । यह 'धर्म' केवल अनुमान से ही समझा जा सकता है ।
अतः जिस प्रकार मीमांसकों ने यागादि कर्मकलाप रूप धर्म के ज्ञापक प्रमाण रूप
वेदों के अर्थ के निर्णय में ही अपना सारा श्रम व्यय किया है, उसी प्रकार अगर
वैशेषिकगण आत्मनिष्ठ उक्त अपूर्व रूप गुण के एकमात्र साधक अनुमान और
आवश्यक पदार्थ निरूपण के प्रसङ्ग में अधिक जागरूक हों, तो उनके ऊपर
प्रतिज्ञात अर्थ से असम्बद्ध अर्थ के अभिधान का दोष नहीं मढ़ा जा सकता ।
दूसरी बात यह है कि अगर वैशेषिक दर्शन के उपक्रमस्थ धर्म शब्द से भी
यागादि क्रियाकलापों को ही लें, तथापि द्रव्यादि के निरूपण को यागादि से सर्वथा
असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । हेतु दो प्रकार के होते हैं- एक ज्ञापक और
दूसरा उत्पादक । दण्ड घट का उत्पादक कारण है और धूम वह्नि का ज्ञापक
कारण है । इसी कारणत्वसाम्य से दोनों प्रकार के हेतु-बोधक पदों से हेतु में
पञ्चमी विभक्ति होती है, जैसे- 'दण्डाद् घटः, धूमाद् वह्निः' इत्यादि । प्रकृत में
विधिवाक्य रूप वेद धर्म के ज्ञापक कारण हैं और द्रव्यादि पदार्थ उनके उत्पादक
कारण हैं; क्योंकि व्रीहि प्रभृति द्रव्य, आरुण्यादि गुण, उत्पवन अवहननादि कर्म,
ब्राह्मणत्वादि सामान्य, इन सबों को मीमांसाशास्त्र में भी यागादि का सम्पादक माना
गया है । इसी प्रकार इनके तत्त्वज्ञान में सहायक विशेष और समवाय का
तत्त्वज्ञान भी परम्परया याग में उपकारक है फिर धर्म-व्याख्या के प्रसङ्ग में द्रव्यादि
पदार्थों के निरूपण करनेवालों को सागर जाने की इच्छा से हिमालय जानेवालों की
उपमा देना कहाँ तक उचित है ?
इस दर्शन के ऊपर सबसे अधिक प्रहार हुये हैं और हो रहे हैं, अपने यूथ के
दार्शनिकों द्वारा और त्रयीबाह्य बौद्धादि के द्वारा भी; किन्तु ये सभी विरोधी इस
शास्त्र के प्रसङ्ग में आचार्य महर्षि प्रशस्तपाद को ही सब से प्रामाणिक व्याख्याता
रूप में मानते चले आ रहे हैं । अतः प्रशस्तपादभाष्य का महत्त्व तो निर्विवाद है ।
तब रही बात यह भाष्य है ? या स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ है ? इस प्रसङ्ग में 'सूत्रार्थों
वर्ण्यते येन' भाष्य का यह लक्षण पूर्व रूप से संघटित न होने के कारण ही
विवाद उपस्थित होता है; किन्तु यह भी ध्यान देने की बात है कि इस दर्शन में
या और दर्शनों में भी स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थों की कमी नहीं है । उन सभी के ऊपर
दृष्टिपात करने पर प्रशस्तपाद भाष्य को स्वतन्त्र निबन्ध मानने में भी कुछ
कठिनाई होती है; क्योंकि इस ग्रन्थ में जिस प्रकार अपने सभी मन्तव्यों को
प्रतिपद सूत्र के द्वारा प्रतिपन्न करने की चेष्टा की गई है, वैसी चेष्टा और स्वतन्त्र
भूमिका ९
निबन्ध-ग्रन्थों में नहीं देखी जाती । अतः इसे भाष्य न मानने वालों को भी इसे
और स्वतन्त्र निबन्ध-ग्रन्थों से भिन्न प्रकार का मानना ही होगा । अतः हम
यथास्थितिपालकों का कहना है कि यह वैशेषिकसूत्रों का भाष्य ही है । 'भाष्य के
सभी लक्षण इसमें पूर्णरूप से संघटित नहीं होते' यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं
है; क्योंकि पदों के जितने भी अर्थ होते हैं, वे सभी अविकल रूप से सभी
अभिधेयों में नहीं घटते । यह बात भाष्य पद से निर्विवाद रूप से समझे जाने वाले
ग्रन्थों में भी देखी जा सकती है कि सभी भाष्य कहाने वाले ग्रन्थों में उक्त
सूत्रानुवर्तिता समान नहीं है, थोड़ा-बहुत अन्तर है ही । तस्मात् यह ग्रन्थ भाष्य के
पूर्णलक्षण से युक्त न होने पर भी भाष्य ही है, प्रामाणिकता में तो किसी भाष्य
ग्रन्थ से न्यून है ही नहीं ।
इसके बाद तो फिर वैशेषिक दर्शन के प्रसङ्ग में जो कुछ भी टीकादि ग्रन्थों का
निर्माण हुआ, सब इसी ग्रन्थ को आधार मानकर हुआ । जिनमें (१) मिथिला के
श्री उदयनाचार्य की किरणावली, (२) वङ्गकुलालङ्कार श्री श्रीधरभट्ट की
न्यायकन्दली और (३) विट्ठलकुलालङ्करण श्री व्योमशिवाचार्य की व्योमवती, ये तीन
प्राचीन टीकायें अधिक प्रसिद्ध हुईं । इनमें भी किरणावली टीका सम्पूर्ण न होने
पर भी सबसे अधिक मान्य हुई और इसकी टीका और उपटीकाओं की एक
लम्बी परम्परा बन गयी । न्यायकन्दली पर भी टीका की रचनायें हुईं; किन्तु वे
उतनी प्रसिद्धि न पा सकीं गुजरात प्रान्त में इसका प्रचलन अधिक सुना जाता है ।
न्यायकन्दली टीका की सबसे खूबी यह है कि वह सम्पूर्ण प्रशस्तपाद भाष्य के
ऊपर है और मूल ग्रन्थ के प्रत्येक पद को सादे शब्दों में समझाने में अधिक तत्पर
है । व्योमवती टीका प्रायः दक्षिण में अधिक प्रचलित है । इन तीनों से भिन्न
पद्मनाभ मिश्रकृत सेतु और जगदीश तर्कालङ्कार की सूक्ति टीका भी है; किन्तु
दोनों ही अपूर्ण हैं ।
वैशेषिकदर्शन के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण
वैशेषिकदर्शन का आरम्भ 'धर्म' व्याख्या की प्रतिज्ञा से हुआ है । सभी प्रकार
के ऐहिक और पारलौकिक इष्टों और मोक्ष के साधन को ही इस दर्शन में धर्म
कहते हैं । यह धर्म (१) प्रवृत्तिलक्षण और (२) निवृत्तिलक्षण भेद से दो प्रकार
का है । प्रवृत्तिलक्षण धर्म से ऐहिक तथा पारलौकिक स्वर्गादि सुखों की प्राप्ति
होती है । एवं निवृत्तिलक्षण रूप 'विशेष' धर्म के द्वारा (१) द्रव्य, (२) गुण,
(३) कर्म, (४) सामान्य (५) विशेष (६) समवाय और (७) अभाव इन सात
पदार्थों का साधर्म्य और वैध रूप से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, उसी से मुक्ति होती
है । अर्थात् निवृत्तिलक्षण धर्म के द्वारा मुक्ति के सम्पादन में द्रव्यादि पदार्थों का
और उनके परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का ज्ञान मध्यवर्ती व्यापार हैं । यद्यपि
'आत्मा वारे श्रोतव्यः, तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा
१० प्रशस्तपादभाष्यम्
आत्मतत्त्व ज्ञान को ही मोक्ष का कारण माना गया है; किन्तु आत्मा को अच्छी
तरह समझने के लिये भी संसार के और सभी पदार्थों को समझना आवश्यक है ।
अपने सहधर्मियों से और विरुद्धधर्मियों से विविक्त होकर किसी व्यक्ति को समझे
बिना उसका तत्त्व समझना सम्भव नहीं है । संसारकी प्रत्येक वस्तु अन्य सभी
वस्तुओं के साथ किसी न किसी प्रकार सादृश्य या वैसादृश्य से युक्त हैं, अतः
परस्पर सम्बद्ध हैं । अतः एक वस्तु को समझने के लिये और सभी वस्तुओं को
भी समझना आवश्यक है । सुतराम् आत्मा को समझने के लिये भी संसार की
अन्य सभी वस्तुओं को समझना आवश्यक है; किन्तु संसार की असंख्य वस्तुओं
को अलग-अलग प्रत्येकशः समझना साधारणजनों के लिये सम्भव नहीं है । अतः
महर्षि कणाद ने समझने की सुविधा के लिये जगत् को द्रव्यादि सात भागों में
विभक्त किया है । फलतः इनके मत से संसार की सभी वस्तुयें द्रव्यादि सात
पदार्थों में से ही कोई हो सकती हैं ।
द्रव्य
द्रव्य उसे कहते हैं जिसमें गुण हो या क्रिया हो । इसका यह अर्थ नहीं कि
सभी द्रव्यों में सभी अवस्थाओं में गुण या कर्म रहते ही हैं; क्योंकि उत्पत्ति के
समय उत्पत्तिशील पृथिव्यादि द्रव्यों में भी गुण या कर्म नहीं रहते । गुण और कर्म
का समवायिकारण आश्रयीभूत द्रव्य ही हैं, जो अपनी उत्पत्ति से पहले नहीं रह
सकता । अतः उत्पत्ति के समय द्रव्य बिना गुण या बिना कर्म के ही रहते हैं ।
उत्पत्ति के बाद उनमें गुण या क्रिया की उत्पत्ति होती है । आकाशादि विभु-द्रव्यों
में तो क्रियायें कभी रहती ही नहीं । अतः 'गुण या क्रिया से युक्त जो पदार्थ वही
द्रव्य है' इस लक्षण का अर्थ इतना ही है कि गुण और कर्म द्रव्यों में ही रहते हैं,
द्रव्य से भिन्न गुणादि में नहीं ।
वस्तुतः 'द्रव्यत्व' जाति ही द्रव्य का लक्षण है । यह द्रव्यत्व जाति कहाँ रहती
है ? इसको समझाने के लिए ही कर्म का, विशेषतः गुण का सहारा लिया जाता
है । विभिन्न व्यक्तियों को किसी एक रूप से समझने के लिए उन सभी व्यक्तियों में
किसी सादृश्य की की आवश्यकता होती है । सभी मनुष्य परस्पर भिन्न हैं, किन्तु
ठीक एक ही आकार के दो मनुष्य नहीं मिल सकते; किन्तु सभी मनुष्यों में कुछ
आन्तर और बाह्य सादृश्य भी हैं, जिनके चलते सभी मनुष्यों में 'यह मनुष्य है'
इस एक तरह का व्यवहार होता है । इस प्रकार जिन सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है'
इस प्रकार का व्यवहार होता है, उन सभी द्रव्यों में कोई सादृश्य अवश्य ही होना
चाहिए, इस सादृश्य के लिये संयोग और विभाग नाम के गुण को आचार्यों ने
उपस्थित किया है । संयोग सभी द्रव्यों में समान रूप से रहनेवाला गुण है और
भूमिका ११
विभाग भी । अतः सभी द्रव्य संयोग या विभाग के समवायिकारण हैं । संयोग
और विभाग का समवायिकारण होना या समवायिकारणत्व नाम का धर्म ही
द्रव्यत्व जाति का ज्ञापक है । संयोग और विभाग का यह समवायिकारणत्व
गुणादि पदार्थों में नहीं है, अतः गुणादि पदार्थ संयोग और विभाग के
समवायिकारण नहीं हैं अतः उनमें द्रव्यत्व नहीं है । इसी प्रकार गुणत्वादि सभी
पदार्थविभाजक धर्मों में समझना चाहिए ।
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये द्रव्य के
नौ प्रकार (भेद) हैं । इन सभी द्रव्यों को नित्य और अनित्य भेद से दो भागों में
बाँटा जा सकता है । पृथिवी, जल, तेज, वायु इन चार द्रव्यों के परमाणु और
आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये सभी द्रव्य नित्य हैं । एवं कथित
परमाणुओं से भिन्न पृथिव्यादि चारों द्रव्य के सभी प्रभेद उत्पत्तिशील होने के कारण
अनित्य हैं । अनित्य द्रव्यों में से पृथिव्यादि तीन द्रव्यों को शरीर, इन्द्रिय और
विषय इन तीन भागों में विभक्त किया गया है; किन्तु वायु का इन तीनों से भिन्न
'प्राण' नाम का एक चौथा भेद भी है ।
आत्मा विभु है, अतः सभी मूर्त द्रव्यों के साथ उसका संयोग है; किन्तु सुख-
दुःखों का अनुभव, अर्थात् भोग वह शरीर में ही करता है, अतः शरीर के साथ
उसका और मूर्त द्रव्यों से विलक्षण प्रकार का अवच्छेदकत्व नाम का सम्बन्ध है ।
इस सम्बन्ध के कारण ही शरीर को आत्मा के भोग करने का 'आयतन' कहा
जाता है । फलतः आत्मा के भोग का आयतन ही 'शरीर' है । यह शरीर भी
पार्थिव, जलीय, तैजस और वायवीय भेद से चार प्रकार का है । इनमें मानव
शरीर पार्थिव है; क्योंकि इस शरीर का उपादान पृथिवी रूप द्रव्य ही है । यद्यपि
जलादि और द्रव्यों का भी सम्बन्ध इसमें प्रतीत होता है, फिर भी वे इसके
उपादान या समवायिकारण नहीं हैं, निमित्तकारण हैं । पृथिवी से लेकर
आकाशपर्यन्त सभी भूतद्रव्य शरीर के बनने में हेतु हैं, अतः शरीर पाञ्चभौतिक
भी कहलाता है । अस्मदादि के शरीर का उपादानकारण या समवायिकारण
पृथिवी रूप द्रव्य ही है, अतः उसे पार्थिव कहा जाता है । वैशेषिक सिद्धान्त के
अनुसार शरी रका समवायिकारण पृथिवी, जल, तेज, वायु इन चारों में से कोई
एक ही है, शेष चार उसके निमित्तकारण हैं । अतः पृथिवी रूप उपादान से
उत्पन्न हम लोगों का शरीर पार्थिव है । पार्थिव शरीर के (१) योनिज और (२)
अयोनिज दो भेद हैं । योनिज शरी के भी दो भेद हैं (१) जरायुज और
(२) अण्डज । जरायुज मानुषादि के शरीर हैं और पशु-पक्षी आदि के शरीर
१२ प्रशस्तपादभाष्यम्
अण्डज हैं । स्वेदज और उद्भिज्जादि के शरी अयोनिज हैं । स्वेदज हैं कृमि
प्रभृति और उद्भिज्ज हैं वृक्षादि । नारकीय शरीर भी अयोनिज ही हैं । जल रूप
समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर
जलीय शरीर है, जो 'वरुणलोक' में प्रसिद्ध है । तेज रूप समवायिकारण औरशेष
चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर 'तैजस शरीर' कहलाता है, जो
'सूर्यलोक' में प्रसिद्ध है । वायु रूप समवायिकारण और शेष चारों भूत द्रव्य रूप
निमित्तकारणों से जिस शरीर का निर्माण होता है, वह वायवीय शरीर कहलाता
है । पिशाचादि का शरी वायवीय शरीर है ।
घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रौत्र औरम न ये छः ईन्द्रियाँ हैं । हाथ, पैर प्रभृति
शरीर के अवयव मात्र हैं, इन्द्रिय नहीं । इनमें श्रोत्र आकाश रूप है, अतः नित्य
है । और मन परमाणु रूप है, अतः नित्य है । चक्षुरादि शेष चार इन्द्रियाँ क्रमशः
पृथिवी, जल, तेज और वायु रूप द्रव्य से उत्पन्न होती हैं । इनमें घ्राण पार्थिव हैं,
रसना जलीय है, चक्षु तैजस है और त्वचा वायवीय है । फलतः घ्राण पृथिवी है,
रसना जल है, चक्षु तेज है और त्वचा वायु है । इस प्रकार घ्राण प्रभृति चार
इन्द्रियाँ पृथिवी प्रभृति चार भूतों से उत्पन्न होने के कारण 'भौतिक' हैं ।
श्रवणेन्द्रिय आकाश रूप है आकाश से उत्पन्न नहीं; क्योंकि आकाश नित्य है ।
नित्य द्रव्य किसी द्रव्य का समवायिकारण नहीं हो सकता, अतः 'श्रवणेन्द्रिय' स्वयं
भूत-द्रव्य होने के कारण ही 'भौतिक' कहलाता है । मन भौतिक नहीं है ।
मिट्टी प्रभृति 'विषय' रूप पृथिवी हैं, सरिता, समुद्रादि 'विषय' रूप जल हैं ।
वह्नि एवं सुवर्णादि 'विषय' रूप तेज हैं । जिससे आँधी प्रभृति होती हैं, वे सभी
वायु विषय रूप हैं । शरीरादि तीनों प्रकारों से भिन्न वायु का 'प्राण' नाम का
चौथा प्रकार भी है । शरीर के भीतर चलनेवाली वायु को 'प्राण' कहते हैं; किन्तु
कार्य-भेद से और स्थान-भेद से उसके प्राण, अपान, समान और व्यान ये चार
नाम प्रसिद्ध हैं । शाखादि के कम्प से वायु का केवल अनुमान ही होता है, प्रत्यक्ष
नहीं; क्योंकि रूपी द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है । किसी का मत है कि वायु का भी
स्पार्शनप्रत्यक्ष होता है । द्रव्य के चाक्षुषप्रत्यक्ष के लिए ही द्रव्य में रूप का रहना
आवश्यक है ।
नित्य द्रव्यों में पृथिव्यादि चारों प्रकार के परमाणुओं का उल्लेख कर चुके हैं ।
वैशेषिकों का कहना है कि घटादि कार्यद्रव्यों का नाश प्रत्यक्षसिद्ध है । विनाश की
परम्परा का विश्राम कहीं पर मानना आवश्यक है । ऐसा न मानने पर राई और
पर्वत दोनों को एक परिमाण का मानना पड़ेगा; क्योंकि राई का विनाश भी
अनन्त खण्डों में होगा और पहाड़ का भी विनाश अनन्त खण्डों में होगा । अतः
दोनों अनन्त खण्डों से निर्मित होने कारण समान परिमाण के होंगे; किन्तु यह
भूमिका १३
प्रत्यक्ष-विरुद्ध है, अतः विनाश-परम्परा का कहीं विश्राम मानना आवश्यक है।
जहाँ पर उसका विश्राम होगा उसको ही 'परमाणु' कहते हैं । इसे मान लेने पर
राई और पर्वत के समान परिमाण का प्रसङ्ग उपस्थित नहीं होता है; क्योंकि
दोनों के परमाणुओं में संख्या का तारतम्य ही दोनों के परिमाण में भी न्यूनाधिक
का ज्ञापक होगा । परमाणु को नित्य मानना भी आवश्यक है; क्योंकि परमाणुओं
को अनित्य मानने पर ऐसे द्रव्य रूप कार्यों को भी मानना पड़ेगा, जिनके अवयव
नहीं हैं; किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है । इस प्रकार दो
परमाणुओं से द्वयणुक और तीन द्वयणुक से त्र्यसरेणु वा त्र्यणुक की उत्पत्ति होती
है । त्र्यसरेणु में महत्त्व आ जाता है । फिर आगे की सृष्टि होती है । वैशेषिकमत
के अनुसार अवयवों से जिस अवयवी की उत्पत्ति होती है, वह अवयवों से सर्वथा
भिन्न वस्तु है और उत्पत्ति से पूर्व उसकी और किसी रूप में सत्ता नहीं रहती है ।
इसी को 'असत्कार्यवाद' या 'आरम्भवाद' कहते हैं ।
आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन पाँच द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता
है । अतः इनके विवरण से पहले इनकी सत्ता में अनुमान को प्रमाण रूप में
उपस्थित करने की आवश्यकता होती है; क्योंकि सभी शब्दप्रमाणों में सभी की
आस्था नहीं होती । किसी वस्तु की सत्ता को जहाँ अनुमान के द्वारा स्थापित
करना होता है, वहाँ थोड़ा कौशल का अवलम्बन आवश्यक होता है; क्योंकि सीधे
विवादास्पद वस्तु को पक्ष बनाकर अनुमान को उपस्थित नहीं किया जा सकता;
जैसे कि 'आकाशः अस्ति, शब्दाश्रयत्वात्' यह अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि
पक्ष को अपने स्वरूप (पक्षतावच्छेदक) से युक्त होकर पहले से सिद्ध रहना चाहिए ।
जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इत्यादि स्थलों में पर्वतत्वादि से युक्त पर्वतादि पहले
प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध रहता है । अतः इस प्रकार के स्थलों में परिशेषानुमान का
अवलम्बन करना पड़ता है ।
आकाश नाम के एक स्वतन्त्र द्रव्य के साधक परिशेषानुमानों की परम्परा इस
प्रकार है कि चक्षु से न दीखनेवाले, अथ च रसनादि और बाह्य इन्द्रियों से गृहीत
होनेवाले गुण सामान्य गुण नहीं होते, विशेष गुण ही होते हैं-यह बात स्पर्श को
दृष्टान्त मानकर अच्छी तरह समझी जा सकती है; क्योंकि स्पर्शगुण का चक्षु से
ग्रहण नहीं हो सकता, अथ च वह त्वचा रूप बहिरिन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः
वह विशेष गुण है ।
इसी प्रकार शब्द भी विशेष गुण ही है; क्योंकि उसका ग्रहण चक्षु से नहीं हो
सकता, अथ च श्रोत्र रूप बहिरिन्द्रिय से उसका ग्रहण होता है । अतः शब्द
विशेष गुण ही है, सामान्य गुण नहीं । यह पहले सिद्धवत् समझ लेना चाहिए कि
दिक्, काल और मन इन तीन द्रव्यों में विशेष गुण नहीं रहते, अतः शब्द
१४ प्रशस्तपादभाष्यम्
कालादि के गुण नहीं हो सकते। आकाश अभी विवादास्पद है। अतः आकाश
को न मानने की स्थिति में शब्द अगर विशेष गुण है तो फिर पृथिवी, जल, तेज,
वायु और आत्मा इन्ही में से किसी का वह विशेष गुण होगा। इनमें से पृथिवी,
जल, तेज और वायु ये चार स्पर्श से युक्त हैं। स्पर्श से युक्त द्रव्यों के जितने
प्रत्यक्ष दीखनेवाले विशेष गुण हैं उनका यह स्वभाव है कि या तो वे अग्नि के
संयोग से उत्पन्न हों, जैसे कि पके हुए घट का रक्त रूप या फिर कारण के गुण
से उत्पन्न हों, जैसे कि पट का रक्त रूप तन्तु के रक्त रूप से उत्पन्न होता है।
अगर शब्द को स्पर्श से युक्त द्रव्य का विशेष गुण मानेंगे तो फिर शब्द की उत्पत्ति
भी अग्नि के संयोग से या उपादानकारणों में रहनेवाले गुणों से ही माननी होगी;
किन्तु दोनों में से कोई भी सम्भव नहीं है; क्योंकि संयोग और विभाग से शब्द की
उत्पत्ति प्रत्यक्ष से सिद्ध है। जिस प्रकार सख रूप विशेष गुण कारणगुणपूर्वक
और अग्निसंयोगासमवायिकारणक न होने से स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों
का विशेषगुण नहीं हो सकता, उसी प्रकार शब्द भी स्पर्श से, युक्त पृथिव्यादि चार
द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता; क्योंकि आत्मा के विशेष गुण गृहीत नहीं
होते, शब्द का ग्रहण श्रोत्र रूप बाह्य इन्द्रिय से होता है, अतः वह आत्मा का
विशेष गुण नहीं हो सकता। तस्मात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, काल, दिक, आत्मा
और मन इन आठ द्रव्यों से भिन्न कोई द्रव्य मानना होगा, जो शब्द का उपादान
या समवायिकारण हो। इसी द्रव्य का नाम 'आकाश' है। आकाश स्वरूप
श्रोत्रेन्द्रिय की चर्चा कर चुके हैं। यह (श्रोत्रेन्द्रिय) नित्य, विभु, आकाश
स्वरूप होने के कारण एक ही है; किन्तु प्राणियों के अङ्गविशेष (कर्णशष्कुली)
के उपाधि के कारण भिन्न-भिन्न हैं। अतः उनके भेद से श्रोत्रेन्द्रिय परस्पर
भिन्न प्रतीत होते हैं और एक के श्रवणेन्द्रिय से दूसरे की आत्मा में शब्द का
प्रत्यक्ष नहीं होता।
'इदानीं घटः,' 'तदानीं घटः' इत्यादि प्रतीतियों की उपपत्ति के लिए 'काल'
नाम के एक द्रव्य की सत्ता माननी पड़ती है; क्योंकि 'इदानीम्, तदानीम्' इत्यादि
प्रतीतियों का विषय यद्यपि सूर्य नक्षत्रादि की क्रियायें प्रतीत होती हैं; किन्तु
सूर्यादि नक्षत्रों का साक्षात् सम्बन्ध घटादि विषयों के साथ नहीं है, अतः एक काल
रूप अतिरिक्त द्रव्य मानकर उसके द्वारा नक्षत्रों की क्रिया द्वारा उक्त प्रतीतियों
की उपपत्ति होती है। अतः काल नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य अवश्य है। उत्पन्न
होनेवाले सभी पदार्थों के साथ इसका सम्बन्ध एवं अन्वय है, अतः वह सभी जन्यों
का कारण भी हैं और आश्रय भी। यद्यपि क्षण-मुहूर्तादि से लेकर मन्वन्तरादि
अनेक रूपों में इसका व्यवहार होता है, फिर भी वे विभिन्न प्रतीतियाँ औपाधिक
ही हैं। काल वस्तुतः एक ही है। काल के द्वारा ही नये और पुराने का व्यवहार
या ज्येष्ठत्व-कनिष्ठत्व का व्यवहार, अर्थात् कालिक परत्व और कालिक अपरत्व
का व्यवहार भी होता है।
भूमिका १५
पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं प्रयाग की अपेक्षा पाटलिपुत्र
से काशी समीप है-इस दूरत्व और समीपत्व की प्रतीति के लिए 'दिक्' नाम का
एक द्रव्य माना जाता है । इसी कारण उक्त प्रतीतियाँ होती हैं । यह भी एक ही
है और नित्य भी है । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर प्रभृति के जो विभिन्न व्यवहार
होते हैं वे सभी उपाधिमूलक हैं । अगर दिशा के प्राच्यादि भेद वास्तविक होते, तो
पूर्व में सदा पूर्वत्व का ही व्यवहार होता और पश्चिम में सदा पश्चिमत्व का ही ।
किन्तु सो नहीं होता, क्योंकि जिसमें एक की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है,
उसी में उससे भी पूर्व में रहनेवाले की अपेक्षा पश्चिमत्व का व्यवहार होता है ।
इसी प्रकार पश्चिम में भी किसी पश्चिमेतर की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता
है, अतः दिशा के पूर्व-पश्चिमादि भेद औपाधिक हैं, वास्तविक नहीं । अतः दिक्
भी एक ही है ।
'अहं सुखी, अहं दुःखी, अहं जानामि' इत्यादि प्रत्यक्षात्मक प्रतीति सार्वजनीन
है । इन प्रत्यक्षों के द्वारा ही सुखदुःखादि के आश्रय रूप आत्मा की सिद्धि होती
है, फिर भी सुखदुःखादि के आश्रय शरीर या इन्द्रिय अथवा मन क्यों नहीं हैं ?
ये प्रश्न रह जाते हैं । इन प्रश्नों के उत्तर के बिना आत्मा तत्त्वतः ज्ञात नहीं हो
सकता । अतः 'शरीरादि आत्मा नहीं हैं' यह समझना आवश्यक है ।
शरीर को ही आत्मा माननेवालो का कहना है कि आत्मा कोई प्रत्यक्षदृष्ट
वस्तु नहीं है । जो सम्प्रदाय आत्मा को स्वीकार करते हैं वे भी सुखादि प्रत्यक्ष के
लिए आत्मा में शरीर का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को
आत्मा में शरी का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को आत्मा के
भोग का 'आयतन' कहते हैं । ऐसी स्थिति में शरीर के साथ जब सुखादि का
अन्वय और व्यतिरेक सर्वसिद्ध है, अतएव शरीर को सुखादि का कारण सभी को
मानना आवश्यक है । अतः शरीर का ही समवायिकारण क्यों न स्वीकार कर लें ?
सुतराम् 'अहं सुखी' इत्यादि वाक्य का 'अहम्' शब्द का अर्थ शरीर ही है, फलतः
शरीर ही आत्मा है । आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त स्वतन्त्र द्रव्य नहीं है । यह
पक्ष सांसारिक साधारण जनों से स्वीकृत होने के कारण अधिक सरल है ।
वस्तुतः हम सभी सांसारिक प्राणी शरीरात्मवादी ही हैं । इस पक्ष के अनुसार
हमारे सभी व्यवहार चलते हैं । अतः इसकी विशेष रूप से समीक्षा आवश्यक है ।
ज्ञान ही वस्तुतः चैतन्य है । चैतन्य से युक्त वस्तु ही चेतन कहलाती है ।
शरीर पाञ्चभौतिक है, पाँच भूतों में से कोई भी चेतन नहीं है । फिर भी उनकी
समष्टि में चैतन्य की उत्पत्ति शरीरात्मवादी इस प्रकार करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति
में जो धर्म नहीं भी रहता है, समूह में वह धर्म रह सकता है । जैसे कि मदिरा के
१६ प्रशस्तपादभाष्यम्
उपादानों में से किसी एक में मादक शक्ति न रहने पर भी उस समूह से निर्मित
मदिरा में मादक शक्ति रहती है, उसी प्रकार पृथिवी प्रभृति पाँच भूतों में से
प्रत्येक में चैतन्य के न रहने पर भी उन पाँचों से निर्मित शरीर में चैतन्य रह
सकती है ।
शरीर को आत्मा न माननेवालों या शरीर में चैतन्य न माननेवालों का कहना
है कि शरीर को अगर चैतन्यत्वभाव का माना जाय तो फिर मृत शरीर में भी
चैतन्य मानना पड़ेगा; क्योंकि मृत शरीर भी तो शरीर ही है । अतः शरीर में
चैतन्य नहीं माना जा सकता । शरीर को चेतन मानने के पक्ष में दूसरी बाधा यह
उपस्थित होती है कि इस पक्ष में शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य मानना पड़ेगा ?
या फिर सम्पूर्ण शरीर में ? इन दोनों में से पहला पक्ष इसलिए नहीं मान सकते
कि शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभूत विषय का उसके कट जाने पर
स्मरण नहीं हो सकेगा; क्योंकि स्मरण के प्रति जो पूर्वानुभव कारण है उसमें
समानकर्त्तृत्व भी आवश्यक है । अर्थात् जिस पुरुष को जिस विषय का पूर्व में
अनुभव रहेगा उसी पुरुष को उस अनुभवजनित उपयुक्त संस्कार के द्वारा समय
आने पर उस विषय का स्मरण होगा, किसी अन्य पुरुष को नहीं, जैसा कि
देवदत्त के पूर्वानुभव से यज्ञदत्त को स्मरण नहीं हो सकता । इस कार्यकारणभाव
के अनुसार शरीर के हाथ रूप अवयव केर द्वारा अनुभव के बाद उस हाथ रूप
अनुभविता के नष्ट हो जाने पर उस विषय का अगर स्मरण मानेंगे तो एक के
द्वारा अनुभूत विषय का स्मरण दूसरे से मानना पड़ेगा, अतः शरीर के प्रत्येक
अवयव में चैतन्य या ज्ञान नहीं माना जा सकता ।
एवं शरीर रूप अवयवी में भी चैतन्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि प्रत्येक
अवयवी एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे क्षण में रहकर तीसरे क्षण में नष्ट हो
जाता है । आगे फिर इसी प्रकार उत्पत्ति और विनाश का क्रम चलता है । (बौद्धों
के क्षणिकत्व सिद्धान्त में और वैशेषिकों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में यही अन्तर है
कि वैशेषिक लोग कुछ पदार्थों को नित्य भी मानते हैं । और एक क्षण में उत्पत्ति,
दूसरे क्षण में स्थिति और तीसरे क्षण में नष्ट हो जाने को क्षणिकत्व कहते हैं ।
बौद्ध लोग सभी पदार्थों को क्षणिक ही मानते हैं किसी पदार्थ को नित्य नहीं मानते
और क्षणिक उस उत्पत्ति-विनाश की परम्परा को कहते हैं, जिसमें पदार्थ एक क्षण
में उत्पन्न होकर दूसरे ही क्षण में विनाश को प्राप्त होता है) वैशेषिक लोग
अवयवियों को क्षणिक इसलिए मानते हैं कि उत्पन्न होने के बाद उसमें हास और
वृद्धि देखी जाती है । एक ही मनुष्यशरीर कभी दुबला और कभी मोटा, कभी
छोटा और कभी बड़ा देखा जाता है; किन्तु एक ही आदमी छोटे और बड़े
भूमिका १७
परिमाण का आश्रय नहीं हो सकता; क्योंकि अवयव के परिणाम और अवयवों
की संख्या ही अवयवी में रहने वाले परिमाण के कारण हैं । कुछ नियमित संख्या
के अवयवों से निर्मित होनेवाले अवयवियों में अवयवों की एक प्रकार की संख्या
और एक परिमाण से अवयवी में विभिन्न प्रकार के परिमाणों की उत्पत्ति नहीं हो
सकती । अतः यही मानना पड़ेगा कि विभिन्न प्रकार के परिमाणवाले अवयवियों
की उत्पत्ति एक प्रकार की संख्यावाले और एक समान परिमाणवाले अवयवों से
नहीं हो सकती, अतः देवदत्तादि एक ही नाम से प्रत्यभिज्ञात होने पर भी विभिन्न
परिमाण के देवदत्तादि के शरीर विभिन्न संख्यक और विभिन्न परिमाणवाले
अवयवों से ही उत्पन्न होते हैं । विभिन्न संख्यक अवयवों से निर्मित अवयवी कभी
एक नहीं हो सकते । अतः देवदत्तादि के मोटे और पतले शरीर रूप अवयवी भी
विभिन्न ही हैं; क्योंकि विभिन्न परिमाणों के होने के कारण विभिन्न संख्यकों और
विभिन्न परिमाण के अवयवों से उत्पन्न हैं । उत्पत्ति और विनाश का या शरीर के
छोटे-बड़े होने का या मोटा और दुबला होने का यह क्रम इतना सूक्ष्म है कि उसे
परख नहीं सकते । यह तो प्रत्यक्ष है कि एक पाँच साल का लड़का जिस ऊँचाई
की वस्तु को छू नहीं सकता था, वही दश वर्ष का होने पर उसे आसानी से छू
सकता है; किन्तु उसकी ऊँचाई में यह वृद्धि कब हुई ? यह कोई देख नहीं सकता ।
ऐसा तो होता नहीं कि एक रात पहले जिस ऊँचाई की वस्तु को छूने में पाँच
अङ्गुल की कमी थी, वह प्रातः होते ही छूट जाती है और वह उस वस्तु को छू
लेता है । तस्मात् यह वृद्धि और नाश प्रतिक्षण होता है, अतः प्रत्येक वृद्धि को या
प्रत्येक विनाश को देखा नहीं जा सकता; क्योंकि क्षण अत्यन्त सूक्ष्म है ।
अतः 'अहं गौरः' इत्यादि प्रतीतियों के वाचक 'अहम्' शब्द से शरीर का
बोध लाक्षणिक ही है । शरीर आत्मशब्द का मुख्यार्थ नहीं है । उसका मुख्यार्थ
कोई अतिरिक्त द्रव्य ही है, जिसके सम्बन्ध के कारण आत्मा शब्द से शरीर का
भी गौणव्यवहार होता है । तस्मात् शरीर आत्मा नहीं है ।
किसी सम्प्रदाय का कहना है कि जिस प्रकार 'अहं गौरः' इस प्रकार की
प्रतीति होती है, उसी प्रकार 'अहं काणः' 'अहं बधिरः' इत्यादि प्रतीतियाँ भी
होती हैं, काणत्व, बधिरत्वादि चक्षुरादि इन्द्रियों के ही धर्म हैं, अतः उन प्रतीतियों
में अहं शब्द से चक्षुरादि इन्द्रियों का ही भान उचित है । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा
हैं । सभी ज्ञानों में इन्द्रियाँ किसी न किसी प्रकार अपेक्षित हैं ही । उन्हें आत्मा
मान लेने में केवल इतना अधिक होता है कि उन्हें ज्ञानों का निमित्तकारण न
मानकर समवायिकारण मानते हैं । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । वे ही अपने-
अपने से उत्पन्न ज्ञानों के आश्रय हैं । अतः इन्द्रियों से अतिरिक्त आत्मा नाम का
कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है ।
१८ प्रशस्तपादभाष्यम्
आत्मा को इन्द्रियों से भिन्न अतिरिक्त पदार्थ माननेवाले सिद्धान्तियों का कहना
है कि शरीर को आत्मा मानने में जो स्मरणानुपपत्ति प्रभृति दोष दिखला आये हैं,
वे सभी अनित्य इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में भी हैं। उसकी रीति यह
है कि आँखों के रहते जिसने जिन वस्तुओं को देखा है, अन्धा हो जाने पर भी
उस व्यक्ति को उन वस्तुओं का स्मरण होता है; किन्तु इन्द्रियों को आत्मा मान
लेने के पक्ष में यह स्मरण सम्भव नहीं है; क्योंकि इस स्मरण का आश्रय
(समवायिकारण) चक्षु रूप इन्द्रिय सर्वदा के लिए नष्ट हो चुका है। अतः यह
मानना पड़ता है कि इन्द्रियों से होनेवाले ज्ञानों का आश्रय कोई और ही द्रव्य है,
जो इन्द्रियों के नष्ट होने पर भी विद्यमान रहता है। वही आत्मा है।
इन्द्रियात्मवाद के पक्ष में कोई कहते हैं कि ये सभी आपत्तियाँ इन्द्रियों के
अनित्य होने के कारण उठती हैं। श्रोत्रेन्द्रिय आकाश रूप होने पर भी पूर्ण नित्य
नहीं है; क्योंकि निरुपाधिक आकाश इन्द्रिय नहीं है। कर्णशष्कुली प्रभृति उपाधि
से युक्त आकाश ही इन्द्रिय है, अतः उपाधि में दोष आ जाने से स्वरूपतः आकाश
रूप श्रोत्र का नाश न होने पर भी उसका इन्द्रियत्व नष्ट हो जाता है। अतः
श्रोत्रेन्द्रिय भी फलतः अनित्य ही है। ऐसी स्थिति में मन रूप इन्द्रिय को आत्मा
मान लेने से उक्त सभी आपत्तियाँ हट जाती हैं; क्योंकि मन नित्य है एवं सभी
ज्ञानों में मन की अपेक्षा भी है ही। तस्मात् सभी ज्ञानों के प्रति मन को ही
समवायिकारण मान लें। तद्भिन्न आत्मा नाम के किसी द्रव्य को मानने की
आवश्यकता नहीं है। इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का कहना है कि मन की सिद्धि
जिस हेतु से की जाती है, वही उसको अतीन्द्रिय भी सिद्ध करता है। मन को
अगर विभु मान लिया जाय तो फिर उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता;
क्योंकि एक समय एक आश्रय में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है; किन्तु
चक्षु-घ्राणादि इन्द्रियों के अपने विषयों के साथ एक ही समय सम्बन्ध हो सकते
हैं। ज्ञान के समवायिकारण को जो लोग विभु मानते हैं उनके मत में एक ही
साथ अनेक विषयों के साथ उसका सम्बन्ध होना कोई बड़ी बात नहीं है। अतः
मध्यवर्ती एक ऐसे इन्द्रिय की कल्पना करनी पड़ती है जो अपनी सूक्ष्मता के
कारण एक समय एक ही बहिरिन्द्रिय के साथ सम्बद्ध हो सके, वही इन्द्रिय 'मन'
है। फलतः जिस बहिरिन्द्रिय के साथ जिस समय मन रूप इन्द्रिय का सम्बन्ध
रहेगा, उस समय उसी बहिरिन्द्रिय के विषय का ग्रहण होगा और इन्द्रियों के
विषयों का नहीं। अगर मन को विभु मान लें तो फिर एक ही समय अनेक
बहिरिन्द्रियों के साथ वह सम्बद्ध हो सकता है। अतः एक ही क्षण में अनेक
ज्ञानों की (ज्ञानयौगपद्य की) आपत्ति जैसी की तैसी रहेगी। अतः मन की सत्ता के
साधक प्रमाण (धर्मिग्राहक प्रमाण) के द्वारा ही मन का अणुत्व भी सिद्ध है। मन
के इस अणुत्व के कारण ही ज्ञान का आश्रय मन नहीं हो सकता; क्योंकि ऐसा
भूमिका १९
मान लेने पर ज्ञान-सुखादि का प्रत्यक्ष न हो सकेगा; क्योंकि गुणप्रत्यक्ष के प्रति
आश्रय का महत्त्व भी कारण है, चूँकि मन अणु है, अतः उसमें रहनेवाले
ज्ञानसुखादि का प्रत्यक्ष संभव नहीं होगा। तस्मात् मन भी आत्मा नहीं है। अतः
पृथिव्यादि आठों द्रव्यों से अतिरिक्त आत्मा नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य मानना
आवश्यक है।
यह आत्मा ईश्वर और जीव भेद से दो प्रकार का है। ईश्वर एक ही
है और सर्वज्ञत्वादि गुणों से विभूषित है। जीव अदृष्टादि गुणों के द्वारा बद्ध
है और प्रत्येक शरीर में अलग-अलग होने के कारण अनन्त है। मन रूप नवम
द्रव्य के प्रसङ्ग में जानने योग्य सभी बातें आत्मनिरूपण के प्रसङ्ग में अधिकतर कह
दी गयी हैं।
गुण
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यल, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,
अधर्म और शब्द ये चौबीस गुण हैं।
रूप
केवल आँखों से ही दीखने वाला गुण 'रूप' है। द्रव्य भी वही आँखों से देखा
जाता है जिसमें कि रूप हो। आकाशादि में रूप नहीं है, अतः वे नहीं देखे
जाते। सुतरां द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में भी रूप सहायककारण है। केवल
द्रव्य ही नहीं जिस किसी का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो-रूप किसी न किसी प्रकार
अपेक्षित होगा ही। फलतः चक्षु से सभी ज्ञानकार्यों के सम्पादन में रूप
सहायककारण है। यह शुक्ल, नील, पीत, हरित, रक्त, कपिश और चित्र भेद
से सात प्रकार का है।
चित्र रूप के प्रसङ्ग में कुछ विवाद है। कुछ लोग कथित नीलादि रूपों से भिन्न
चित्र नाम का कोई अतिरिक्त रूप नहीं मानते। सिद्धान्तियों का कहना है कि
संयोग की तरह रूप अपने किसी आश्रय के एक अंश में रहे और दूसरे अंश में
नहीं-ऐसा नहीं होता (रूप अव्याप्यवृत्ति नहीं है); किन्तु रूप अपने आश्रय के
सभी अंशों में रहता है (अतः वह व्याप्यवृत्ति है)। इस नियम के अनुसार जो
छींट प्रभृति अनेक रङ्गों के कपड़े हैं, उनमें कोई रूप सभी अंशों में नहीं है; किन्तु
वे सभी रूपवाले द्रव्य हैं; क्योंकि उनका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है। तस्मात् उनमें
नीलादि से भिन्न कोई रूप मानना पड़ेगा। वही चित्र रूप है।
पृथिवी में ये सभी रूप रहते हैं। जल और तेज इन दोनों में केवल शुक्ल
रूप ही है। शुक्ल रूप को छोड़कर और किसी रूप का अवान्तर वास्तविक भेद