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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 19 of 759

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१४ प्रशस्तपादभाष्यम्
कालादि के गुण नहीं हो सकते। आकाश अभी विवादास्पद है। अतः आकाश
को न मानने की स्थिति में शब्द अगर विशेष गुण है तो फिर पृथिवी, जल, तेज,
वायु और आत्मा इन्ही में से किसी का वह विशेष गुण होगा। इनमें से पृथिवी,
जल, तेज और वायु ये चार स्पर्श से युक्त हैं। स्पर्श से युक्त द्रव्यों के जितने
प्रत्यक्ष दीखनेवाले विशेष गुण हैं उनका यह स्वभाव है कि या तो वे अग्नि के
संयोग से उत्पन्न हों, जैसे कि पके हुए घट का रक्त रूप या फिर कारण के गुण
से उत्पन्न हों, जैसे कि पट का रक्त रूप तन्तु के रक्त रूप से उत्पन्न होता है।
अगर शब्द को स्पर्श से युक्त द्रव्य का विशेष गुण मानेंगे तो फिर शब्द की उत्पत्ति
भी अग्नि के संयोग से या उपादानकारणों में रहनेवाले गुणों से ही माननी होगी;
किन्तु दोनों में से कोई भी सम्भव नहीं है; क्योंकि संयोग और विभाग से शब्द की
उत्पत्ति प्रत्यक्ष से सिद्ध है। जिस प्रकार सख रूप विशेष गुण कारणगुणपूर्वक
और अग्निसंयोगासमवायिकारणक न होने से स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों
का विशेषगुण नहीं हो सकता, उसी प्रकार शब्द भी स्पर्श से, युक्त पृथिव्यादि चार
द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता; क्योंकि आत्मा के विशेष गुण गृहीत नहीं
होते, शब्द का ग्रहण श्रोत्र रूप बाह्य इन्द्रिय से होता है, अतः वह आत्मा का
विशेष गुण नहीं हो सकता। तस्मात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, काल, दिक, आत्मा
और मन इन आठ द्रव्यों से भिन्न कोई द्रव्य मानना होगा, जो शब्द का उपादान
या समवायिकारण हो। इसी द्रव्य का नाम 'आकाश' है। आकाश स्वरूप
श्रोत्रेन्द्रिय की चर्चा कर चुके हैं। यह (श्रोत्रेन्द्रिय) नित्य, विभु, आकाश
स्वरूप होने के कारण एक ही है; किन्तु प्राणियों के अङ्गविशेष (कर्णशष्कुली)
के उपाधि के कारण भिन्न-भिन्न हैं। अतः उनके भेद से श्रोत्रेन्द्रिय परस्पर
भिन्न प्रतीत होते हैं और एक के श्रवणेन्द्रिय से दूसरे की आत्मा में शब्द का
प्रत्यक्ष नहीं होता।
'इदानीं घटः,' 'तदानीं घटः' इत्यादि प्रतीतियों की उपपत्ति के लिए 'काल'
नाम के एक द्रव्य की सत्ता माननी पड़ती है; क्योंकि 'इदानीम्, तदानीम्' इत्यादि
प्रतीतियों का विषय यद्यपि सूर्य नक्षत्रादि की क्रियायें प्रतीत होती हैं; किन्तु
सूर्यादि नक्षत्रों का साक्षात् सम्बन्ध घटादि विषयों के साथ नहीं है, अतः एक काल
रूप अतिरिक्त द्रव्य मानकर उसके द्वारा नक्षत्रों की क्रिया द्वारा उक्त प्रतीतियों
की उपपत्ति होती है। अतः काल नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य अवश्य है। उत्पन्न
होनेवाले सभी पदार्थों के साथ इसका सम्बन्ध एवं अन्वय है, अतः वह सभी जन्यों
का कारण भी हैं और आश्रय भी। यद्यपि क्षण-मुहूर्तादि से लेकर मन्वन्तरादि
अनेक रूपों में इसका व्यवहार होता है, फिर भी वे विभिन्न प्रतीतियाँ औपाधिक
ही हैं। काल वस्तुतः एक ही है। काल के द्वारा ही नये और पुराने का व्यवहार
या ज्येष्ठत्व-कनिष्ठत्व का व्यवहार, अर्थात् कालिक परत्व और कालिक अपरत्व
का व्यवहार भी होता है।